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कविता का अंश… कभी-कभी छोटी सी घटना, बन जाती है कारण। कभी रोज की बातें करती, खोजों का निर्धारण। सन् पंद्रह सौ तिरासी और बात है ये इटली की। घंटे से लटकी रस्सी की, नहीं किसी सूतली की। चर्च की बैंच में बैठे-बैठे, एक दिन एक युवक ने देखा, झूल रही थी रस्सी, जिसकी लय में था एक टेका। रस्सी के दोलन संग, उसने अपनी नब्ज़ टटोली, दोनों में एकरसता थी, ये बात उजाबर हो ली। उसने पाया हर दोलन में, समय बराबर लगता। जहन में उसके कुछ करने का, कीड़ा क्यों न जगता। दोलन को आधार बनाकर, उसने की एक रचना। समय का भी इस नई खोज से, मुश्किल हो गया बचना। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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