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11:12 am
कविता का अंश...चित्रकार सुनसान जगह में, बना रहा था चित्र, इतने ही में वहाँ आ गया, यम राजा का मित्र। उसे देखकर चित्रकार के तुरत उड़ गए होश, नदी, पहाड़, पेड़, पत्तों का, रह न गया कुछ जोश। फिर उसको कुछ हिम्मत आई, देख उसे चुपचाप, बोला-सुंदर चित्र बना दूँ, बैठ जाइए आप। डकरू-मुकरू बैठ गया वह, सारे अंग बटोर, बड़े ध्यान से लगा देखने, चित्रकार की ओर। चित्रकार ने कहा-हो गया, आगे का तैयार, अब मुँह आप उधर तो करिए, जंगल के सरदार। बैठ गया पीठ फिराकर, चित्रकार की ओर, चित्रकार चुपके से खिसका, जैसे कोई चोर। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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