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कविता का अंश.. अपनी साँसों के, अपनी धड़कन के गीत लिखूँ मैं, जब-जब तुमसे मुलाकात हो, मन के गीत लिखूँ मैं। कितना प्यार दिया है तुमने, कितना प्यार दिया है। मैंने जो भी चाहा, तुमने वो अधिकार दिया है। यूँ ही मुझसे बँधे रहो, बंधन के गीत लिखूँ मैं। पतझर के मौसम में भी सावन के गीत लिखूँ मैं। जब भी कभी सामने बैठो, मैं बस तुम्हें निहारूँ। पल-पल खुद को देखूँ, पल-पल अपना रूप सँवारूँ। ऐसे मुझे सँवारों तो दरपन के गीत लिखूँ मैं। मेरे और तुम्हारे अपनेपन के गीत लिखूँ मैं। इस अधूरी कविता के साथ-साथ ऐसी ही मधुर रस बरसाती कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

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