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लेख का अंश… बारिश की टप-टप बूँदें हों या मूसलाधार बारिश, भला किसे ये अच्छी नहीं लगती? बारिश के पानी में नाव दौड़ाने, छप-छपाक खेलने में बच्चों को एक अनोखा आनंद आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बरसातें भी अलग-अलग किस्म की होती हैं? ऐसे ही बरसात के मौसम में एक दिन प्रात:काल वर्षा की भीनी फुहारों से उत्तरी असम के लोग उल्लसित नींद की खुमारी छोड़कर सड़कों पर आए, तो देखकर दंग रह गए कि वर्षा के तेज होने के साथ ही आकाश से मछलियों की बरसात होने लगी। तरह-तरह की छोटी-बड़ी मछलियाँ बच्चे-बूढ़े लूटने लगे। यह बरसात करीब एक घंटे तक चली। ऐसी विचित्र बरसात हर गाँव-मोहल्ले में नहीं होती। यह तो कभी-कभी, कहीं-कहीं होती है और प्रकृति की विचित्रताओं का अहसास छोड़ जाती है। मलाया के मर्सिंग शहर में काली बरसात हुई। वहां के झरने, छोटे-बड़े गड़ढे सब काले जल से भर गए। सन 1950 में मध्य लंका के कैंडी शहर में पीली वर्षा हुई। जिन पर वर्षा का पानी पड़ा था, पीले रंग के धब्बे पड़ गए। यद्यपि यह पीली वर्षा कुछ ही मिनट हुई लेकिन सारे शहर में पीला-पीला पानी सड़कों पर जमा हो गया। वैज्ञानिकों के अनुसार हवा द्वारा उठाए गए पराग कणों के कारण यह वर्षा हुई थी। सन 1951 में तामलुक शहर में भी इसी प्रकार की पीली वर्षा हुई। घरों की छतों, दीवारों पर पीली धारियाँ बन गईं। यह पीली वर्षा शहर के थोड़े भाग में ही हुई। जुलाई 1957 में केरल के अम्लालयुवेयिल शहर में वर्षा के पानी का रंग लाल पाया गया। उसमें काफी रेडियोधर्मिता थी। अगस्त में उसी शहर में फिर से लाल वर्षा हुई, जिसकी बूँदे बाद में पीली हो गई। इसी प्रकार मेंढ़कों, मछलियों की बरसात सन 1794 की गर्मियों में फ्रांस के लाले नामक गाँव में हुई। उन दिनों आस्ट्रिया और फ्रांस में युद्ध चल रहा था। 150 फ्रांसीसी सैनिक खंदकों में छिपे दुश्मनों से लोहा ले रहे थे कि अचानक तेज बारिश शुरू हो गई और साथ ही मछलियाँ और मेंढ़क भी टपकने शुरू हुए, जो सैनिकों की टोपियों में घुसकर उन्हें परेशान करने लगे। ऐसी ही विचित्र बरसातों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए, इस ऑडियो के माध्यम से….

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