शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

शिखण्डिनी का प्रतिशोध - 6 - राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश... कुरुक्षेत्र के मैदान में, अब सिर्फ़ धूल ही बची है, जैसे अम्बा के हृदय में बस गया है, दुःख और विषाद ! परशुराम गर्दन झुका कर चले गए हैं, महेन्द्र पर्वत की ओर। और भीष्म दल-बल सहित, वापस लौट रहे हैं हस्तिनापुर ! अम्बा जान गई, स्त्री के लिए न्याय, समानता और सम्मान, आचार्यों के प्रवचनों का ही विषय हैं। अम्बा इन्हें खोज नहीं पाई, पुरुषों की दुनिया में, इसलिए अब उसे चाहिए, केवल भीष्म की मृत्यु ! अम्बा ने कुरुक्षेत्र से निकल कर, राह ली श्यामवर्णा यमुना की। जिसके तट पर, उसने आरम्भ किया अलौकिक तप ! बारह वर्ष तक, केवल वायु और पत्रादि का भक्षण करते हुए, सूख कर काँटा हो चली थी अम्बा। पर भरी थी उसके भीतर बदले की आग, जैसे काष्ठ में रहती है अग्नि ! तप के प्रभाव से, उसका आधा शरीर बन गया, अम्बा नाम की एक नदी। और आधे शरीर से वह बनी वत्सराज की कन्या, आश्चर्य, उसे अब भी याद था, अपना अभीष्ट ! इस जन्म में भी, अम्बा करती ही रही तपस्या। हार कर प्रकट हुए भोलेनाथ ! प्रसन्न होकर शिव ने पूछा –- क्या चाहिए तुझे, पुत्री ? भीष्म का नाश, इसके सिवाय मुझे कुछ नहीं चाहिए, त्रिपुरारी ! इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

शिखण्डिनी का प्रतिशोध - 5 - राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश... तिरस्कृत स्त्री की आँखों में, नहीं होते आँसू। भस्म हो चुके होते हैं उसके सारे स्वप्न, हृदय में खौलता है गरम लावा, और वह फट जाना चाहती है, किसी ज्वालमुखी की तरह ! किसी अदृश्य चौराहे पर खड़ी है अम्बा, जहाँ से कोई रास्ता नहीं जाता, भविष्य और जीवन की ओर; पर वह नहीं कर सकती मृत्यु का वरण, क्योंकि वह समय के हाथों छली गई है, हारी नहीं है ! वह जानती है, शाल्व की तरह ही अब उसे स्वीकार नहीं करेंगे, उसके बन्धु-बान्धव, और राजा विचित्रवीर्य भी, सत्य है, ओस की एक बून्द, फूल से टपकते ही, बन जाती है कीचड़ का हिस्सा ! ढलती साँझ में, अम्बा शरण लेती है, तपस्वियों के आश्रम में, जिनका सुझाव है -- स्त्री के दो ही आश्रय होते हैं, पिता या पति ! अम्बा नहीं लौटना चाहती काशी, और अब उसे प्रतीत होता है, पति तो उसके भाग्य में, है ही नहीं, पर वह क्षमा नहीं कर सकती, अपने अपहर्ता भीष्म को ! आश्रम में अम्बा मिलती है, अपने नाना ऋषि होत्रवाहन से, जो उसे मिलवाते हैं, जमद्ग्निनंदन परशुराम से, सम्भव है भीष्म के गुरु परशुराम, कर सकें भीष्म को विवश, किसी सम्मानजनक व्यवस्था के लिए ! अम्बा की व्यथा से, द्रवित होते हैं परशुराम। करते हैं घोषणा –- मैं भीष्म को आज्ञा दूँगा, कि वह तुम्हें स्वीकारे कुरुवंश में। अन्यथा उसे भस्म कर दूँगा मन्त्रियों सहित ! परशुराम, अम्बा और अनेक ब्रह्मज्ञानी ऋषि, भीष्म से मिलने सरस्वती के किनारे, पहुँचे हैं कुरुक्षेत्र ! भीष्म आदर के साथ करते हैं, गुरुदेव का स्वागत और चरण-वन्दना। आशीष देते हैं परशुराम और बताते हैं अपने आगमन का निमित्त ! भीष्म, ब्रह्मचारी होकर भी तुमने स्पर्श किया है, काशी नरेश की पुत्री अम्बा को; अतः नष्ट हो गया इसका स्त्री-धर्म। इसी आधार पर शाल्व ने किया है इसका तिरस्कार, अब अग्नि की साक्षी में, तुम करो इसे ग्रहण या करे तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य ! गुरुदेव, मैं तो आजन्म ब्रह्मचारी ही रहूँगा। आप जानते हैं मैंने लिया है यह व्रत। और अब विवाह तो विचित्रवीर्य से भी, सम्भव नहीं अम्बा का, क्योंकि इसका रहा है राजा शाल्व से प्रेम... इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-4 / राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश... इतिहास का सबसे निष्ठुर प्रकरण है, स्त्री का प्रेम माँगने जाना किसी पुरुष के पास। उसे याद दिलाना कि वह समर्पण कर चुकी है उसके पौरुष के समक्ष। और उसका संसार सीमित होकर रह गया है, मात्र उस पुरुष तक ही; अम्बा भी गुज़र रही है इस निर्दय क्षण से, वह पहुँच गई है, राजा शाल्व के द्वार पर ! शाल्व बैठे हैं अपने मंत्रणाकक्ष में, भीष्म से मिली करारी हार, और शरीर पर लगे घावों का, उपचार कराने के लिए, चिकित्सकों और मन्त्रियों के बीच; वहाँ उपस्थित होकर कहती है अम्बा - महाबाहो ! मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ ! कुटिल मुस्कुराहट आती है शाल्व के चेहरे पर, अम्बा की आँखों में देखकर कहता है शाल्व - सुन्दरी, अब मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। तुम्हें छू चुका है भीष्म, बलात् ले जा चुका है हस्तिनापुर के महलों में। मैं तुम्हें नहीं स्वीकार कर सकता पत्नी के रूप में ! कातर स्वर में बोलती है अम्बा – राजन, मैं पवित्र हूँ किसी कन्या की तरह। मेरे मन में बस आप ही आए थे, पति रूप में, आपकी छवि सहेज कर मैं नहीं कर सकती थी भीष्म के भ्राता से विवाह। मैं नहीं करना चाहती थी अपने प्रेम का अपमान, इसलिए लौट कर आई हूँ अपने प्रियतम के निमित्त ! मैं भले ही पराजित और अपमानित क्षत्रिय हूँ, पर राजधर्म से बंधा हूँ। मेरी प्रजा मेरे मूल्यों का अनुकरण करती है। मैं तुम्हें त्याज्य मानता हूँ, अम्बा, जाकर उस भीष्म से विवाह करो, जो किसी वर की तरह तुम्हें उठा ले गया था, स्वयंवर से बाँह पकड़ कर ! शाल्व हाथ जोड़ कर उठ खड़े हुए हैं, किसी अपरिचित की तरह, अम्बा को विदा देने के लिए ! इस अधूरी कविता काे पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

शिखण्डिनी का प्रतिशोध - 3 - राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश... स्त्री का भाग्य हर युग में, लिखते ही रहे हैं पुरुष। चाहे वह राजपुत्री हो या ग़रीब भिखारिन, आख़िर है तो चल-सम्पत्ति ही ! हम गढ़ते हैं उन्हें प्यालों की तरह, जिनमें पी सकें जीवन का अमृत। जब चाहे तोड़ कर उठा लें, फिर नया। और वे रंगीन चमकते प्याले, रह जाएँ सदा के लिए प्यासे और अतृप्त ! जिसे हम मानव सभ्यता कहते हैं, उसमें इससे अधिक असभ्य, और क्या होगा भला? कि आप जिसे माँ कहते हैं, वह आपके वंश की क्रूरता सह कर ही, पहुँचती है इस सम्मान तक ? और आपने ही बताया है उन्हें, कि हमारी क्रूरता भी सम्मान ही है। चूँकि समाज के विधान का नियमन, हम ही करते हैं ! सत्यवती के चरणों में बैठी हैं, तीनों अपहृत कन्याएँ। जिनका विवाह किया जाना है, हस्तिनापुर के राजा विचित्रवीर्य से ! पुरोहित कर रहे हैं, विवाह कर्म की तैयारियाँ। सत्यवती प्रसन्न है भीष्म के बाहुबल पर। गंगा-पुत्र यदि अपहरण न करते, काशीराज की कन्याओं का, तो क्या होता बेचारे विचित्रवीर्य का ? पुरुष जैसा भी हो छल या बल से, पा ही लेता है सुन्दर-सुशील स्त्रियाँ। ऐसे ही बनाया है हमने अपना समाज ! अम्बा धैर्य जुटा कर कहती हैं भीष्म से, मैं प्रेम करती हूँ राजा शाल्व से। और मन से उसे मान चुकी हूँ अपना वर। कुरुवंश में आकर भी, मैं मन से नहीं हो पाऊँगी इस वंश की। आपके भाई से मेरा विवाह, धर्म-सम्मत नहीं होगा देवव्रत ! तत्काल पुरोहितों और न्यायविदों से, परामर्श लेते हैं भीष्म और सत्यवती। निर्णय लिया जाता है, कि वृद्ध ब्राह्मणों और धात्रियों के साथ, अम्बा को विदा किया जाए, राजा शाल्व के नगर के लिए ! प्रेम की यात्रा पर, हस्तिनापुर छोड़ कर, बढ़ चली है अम्बा। उसके मन में है, आशाओं और आकाँक्षाओं का डोलता समुद्र। तेज़ी से धड़क रहा है हृदय, जिसमें धीमे-धीमे बज रहा है जलतरंग, आगे बढ़ते घोड़ों की टापों के साथ ! इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

शिखण्डिनी का प्रतिशोध- 2 - राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश... आसमान में छाए हैं घने बादल, कहीं ऐरावत के शीश पर सिर रख कर, रो रहा होगा चाँद। स्मृतियाँ तैर रहीं हैं भीष्म के मन में, जैसे समुद्र में तैरता है, कोई तूफ़ान में नष्ट हुआ जहाज़। बहुत लम्बी होगी, जीवन की यह अन्तिम-यात्रा ! भीष्म के कान सुनते हैं, अपने आसपास हंसों की चहल-कदमी, ये ऋषिगण हैं जिन्हें भेजा है माँ गंगा ने, इस रूप में। अपने धर्म स्वरूप पुत्र की, प्रदक्षिणा करने के लिए। हिमालय पुत्री गंगा, अब धरती पर लौट नहीं सकती, अपने पुत्र का सिर स्पर्श करने के लिए ! भीष्म की बन्द पलकों में, झाँकती है माँ गंगे। अब भी वे उसी तरह पकड़े हैं माँ का आँचल, जैसे कभी उन्हें सौंपा था, स्वर्ग लौटती गंगा ने महाराज शान्तनु को ! वह सोचते हैं- काश, इन क्षणों में, माँ, तुम होती मेरे पास। मैं खोलता हृदय की एक-एक गाँठ, मृत्यु का क्या है, पिता के वरदान से, वह तो सदा ही मेरे अधीन है। मुझे तो उसकी प्रतीक्षा करनी ही होगी, सूर्य के उत्तरायण में आने तक ! माँ, धर्म स्वरूप भीष्म ने भी, कई बार किया धर्म का तिरस्कार। उसे देनी चाही नई परिभाषा, पर माँ, वह तो मेरा अहम् था, उससे कैसे पारिभाषित होता धर्म ? माँ सत्यवती की प्रसन्नता के लिए, भाई विचित्रवीर्य के गृहस्थ के लिए, मैंने किया काशी नरेश की तीन पुत्रियों का, स्वयंवर से अपहरण। अपने राजमद में चूर होकर, क्या यह न्यायोचित था ? इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-1 - राजेश्वर वशिष्ठ

कविता का अंश... शर-शैया पर लेटे हैं देवव्रत भीष्म, हारे हुए जुआरी की तरह शिथिल होकर। दक्षिणायन हो रहे हैं सूर्य ! रुक गया है दसवें दिन का युद्ध, सभी योद्धा भूल कर अपने घाव, पंक्तिबद्ध खड़े हैं पितामह के चारों ओर ! भीष्म मृत्यु का वरण नहीं करेंगे, बूढ़े सूरज की साक्षी में, उन्हें जीवित रहना होगा। जब तक सूर्य नहीं आएगा उत्तरायण में। अभी तो धर्म किसी झुकी पताका पर लटका हुआ, खोज रहा है अपनी नई परिभाषाएँ ! बाणों से बिन्धा शरीर दे रहा है, अथाह दर्द की अनुभूति। क्षत्रिय हो कर भी कराह रहे हैं भीष्म, क्या मृत्यु से पूर्व बदल जाता है मनुष्य का वर्ण और स्वभाव ? वह देखते हैं अर्जुन की ओर, कहते हैं –- लटक रहा है मेरा शीश धनंजय, इसे सहारा दो ! जानते हैं अर्जुन मृत्यु से पूर्व इस अवस्था में, धरती नहीं सह पाएगी उनके शीश का बोझ। फिर से कैसे चलाएँ पितामह पर तीर ? गरजती है पितामह की वाणी, अब सीधी नहीं टिक पा रही मेरी गर्दन, मुझे कष्ट मुक्त करो अर्जुन ! अर्जुन उनके चरणों में प्रणाम कर, शीश को बेध, लगा देते हैं तीरों का तकिया। आशीष दे पुलकित हो जाते हैं देवव्रत, अब वह रात्रि से संवाद करना चाहते हैं ! इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कागा के बहाने बुजुर्गों की बात

आज सन स्टार में प्रकाशित आलेख

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

कुछ ग़ज़लें – 1 – विमल कुमार शर्मा

दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में मुलाकात करते हैं विमल कुमार शर्मा की ग़ज़लों से। विमल कुमार शर्मा को शायरी का माहौल विरासत में मिला। पिताजी के दिलो-दिमाग में रची-बसी शायरी, गीत, ग़ज़ल उनकी रग-रग में बचपन से ही बस गई। भले ही नादान बचपन उनके अर्थ से अनजान था मगर शायरी सुनना और गुनगुनाना अच्छा लगता था। धीरे-धीरे समय के साथ समझ बढ़ी और खुद की शायरी बनने लगी। स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सफर आगरा में ही हुआ। ऐतिहासिक शहर में रहने का फायदा यह हुआ कि मुशायरों का लुत्फ भी उठाया गया और बचपन की शायरी वर्तमान की दहलीज पर आकर उन्हें एक नई पहचान दे गई। गीत, ग़ज़ल, शायरी, व्यंग्य, कविता, कहानी, मुक्तक सारी विधाओं में हस्तक्षेप रखने वाले विमल कुमार शर्मा पेशे से फोरेन्सिक विशेषज्ञ हैं, इस बात पर यकीन करने को मन नहीं करता। किंतु समय का हर क्षण साक्षी है कि पर्याय इंसान को जितनी पहचान देते हैं, उससे कहीं अधिक पहचान उसे विलोम देते हैँ अत: इस बात पर भी यकीन करना ही है कि अपनी कर्मभूमि में कँटीली राह के राही श्री विमल जी रचनात्मक माटी में सृजन संसार के कई कोमल अंकुर बोने में पूर्णत: समर्थ हैं। ग़ज़ल… कहते हैं लोग मुझसे मैं हूँ आइना तेरा, मुझमें तू कैसी दिखती है, इतना तो बता दे। तू भी तो जानती है कि तू जान है मेरी, फिर जिस्म से जुदा है क्यों, इतना तो बता दे। चंचल मन के पास तू रहती है दिन-रात प्रिये, कब दिल के पास आएगी, इतना तो बता दे। मुद्दत से तेरा इंतजार मुझको है सनम, ये खत्म भी होगा कभी, इतना तो बता दे। जितने थे स्वप्न तूने सब मुझको दे दिये, दिल कब मुझे तू देगी, इतना तो बता दे। ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए… संपर्क - ई-मेल : vimalsharma31@gmail.com

सोमवार, 26 सितंबर 2016

ग़ज़लें - 2 - अनिरुद्ध सिंह सेंगर

ग़ज़ल... हम क्या बताएं कैसे गुज़रती है जिन्दगी.... हम क्या बताएॅं कैसे गुज़रती है ज़िन्दगी, खा-खा के ठोकरों को सँवरती है ज़िन्दगी। पहरे बिठा रखे हैं ये मौसम ने हर तरफ, उसको पता कहाँ कि बहकती है ज़िन्दगी। दिल में तेरे छुपा है जो उसकी तलाशकर, क्यों दर-व-दर सुकूॅं को भटकती है ज़िन्दगी। जब से चलन दहेज का दुनिया में हो गया, पीड़ा,घुटन के साथ सुलगती है ज़िन्दगी। वो एक तितली फूल की गोदी में सो गई, तब जाना उसने कैसे महकती है ज़िन्दगी। उड़ते हैं जो ‘अनिरुद्ध’ ये आज़ाद परिन्दे, मस्ती में रोज इनकी गुजरती है ज़िन्दगी। ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... सम्पर्क - aniruddhsengar03@gmail.com, sengar.anirudha@yahoo.com

ग़ज़लें - 1 - अनिरुद्ध सिंह सेंगर

ग़ज़ल... जीवन सुखी बनाने को सब ताने-बाने रखता हूँ... जीवन सुखी बनाने को सब ताने-बाने रखता हूँ, अपनी ऑंखां में सदैव मैं स्वप्न सुहाने रखता हूँ। तुमको भाते हैं तो गाओ घिसे-पिटे सब गीतों को, अपने होठों पर मैं लेकिन नये तराने रखता हूँ। माता-पिता, बहन-भाई सब मेरे मन की दौलत हैं, मैं तो अपनी इन ऑंखों में कई ख़जाने रखता हूँ। हर संकट साहस को मेरे देख बहुत घबराता है, सोता हूं टूटी खटिया पर लट्ठ सिरहाने रखता हूँ। मेरे मन के रहस्यवाद को नहीं समझ पाएंगे आप, तहख़ाने के अन्दर भी मैं कई तहख़ाने रखता हूँ। मेरी काव्य कला पर कर दें जो निज प्राण निछावर तक, ऐसे भी ‘अनिरुद्ध’ साथ में, मैं दीवाने रखता हूँ। ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए... सम्पर्क - aniruddhsengar03@gmail.com, sengar.anirudha@yahoo.com

रविवार, 25 सितंबर 2016

शनिवार, 24 सितंबर 2016

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 11 (अंतिम भाग) – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश…. भगवन! दें आशीष हमें कुछ, गुरु दक्षिणा करने भेंट। ज्ञान यज्ञ पूर्णाहुति देवे, सारे संशय उर के भेंट। सुनते गुरु गंभीर हो बोले, जो देने को प्रबल विचार। तो पांचाल नरेश द्रुपद को, बंदी बला, दो हमें अबार। यह सुनकर आवाक से रह गए, हाँ, कह चले तैयारी में। लेकर बड़ी अक्षोहिणी सेना, प्रस्थित हुए सवारी में। दुर्योधन संग कर्ण दु:शासन, विकर्णादि बांधव गण। अपने अस्त्र-शस्त्र संजोये, बेगि सिधावे करने रण। पांडव अनी थी पीछे चलती, सीम पहुँच विश्राम किया। उधर कुरुदल नगरी घेरा, और विकट संग्राम किया। अनायास रणभेदी सुनकर, जनता थर-थर काँप उठी। कुरुदल सेना सागर जैसी, पग-पग नगरी ढाँप उठी। सत्वर युद्ध की तैयारी हुई, द्रुपद क्रोध से लाल हुआ। रण को धाया गर्जन करता, कुरुदल का ज्यों काल हुआ। धरा गगन पट गया बाण से, अपने पराये बुझे न। कहीं आर्तनाद, कहीं सिंहनाद, संग्राम घोर कछु सूझे न। महाभटों के छक्के छूट गए, कुरु सेना भागी रण छोड़। महारथी कुरुदल के जेते, दिए द्रुपद-शर माथे फोड़। दुर्योधन और कर्णवीर के, मारे शर तीखे अष्टबीस। तुरंग सारथी मार गिराए, भागे दोनों बचाकर शीश। पांडु सुअन की देत दुहाई, कुरुसेनेा भगती आई। देख दुर्दशा रणवीरों की, चले पांडु सुत हरषाई। द्रोणाचार्य युधिष्ठिर दोनों, ठहरे रहे ठिकाने में। शीश नाई दोऊ के सादर, चले बंधु जंग खाने में। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 10 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश…. दुर्योधन और भीम बली की, गदायुद्ध कह सकता कौन। भय भी ज्यों भय खा जाता था, थाम कलेजा रखता मौन। विधि से सीखकर आया जैसे, सहदेव ज्योतिषज्ञानी है। तीक्ष्ण भयंकर खंग युद्ध में, नकुल पिलावे पानी है। चर्चा ऐसी हो ही रही थी, कि मच गया अचानक शोर। दौड़ पड़े थे लोग झपटते, सुनकर शंख भेरी जय जोर। सन्मुख संग आए शिष्यन के, द्रोणाचार्य दमकते से। पीत वसन चंदन मालादिक, दिव्य ललाट चमकते से। कुरुकुल दीपक कौरव सारे, पहने थे पट माला लाल। कवच ढाल तूणिर कसे कटि, खड़े हुए थे उन्नत भाल। पीत वर्ण सुंदर शुचि शोभित, दमक रहे पांडु नंदन। कृपाचार्य और गुरु द्रोण के, किए सभी ने पद वंदन। पुनि निज आसन आइ बिराजे, कर तल ध्वनि जयकार हुए। धरती से अंबर तक गूँजी, प्रदर्शन क्रमवार हुए। गज, तुरंग, रथ, वाहन चालन, गदा, खंग, शक्ति, धनुबाण। मल्लयुद्ध की कलाबाजियाँ, अस्त्र शस्त्र के बहुत विधान। भिरे भीम दुर्योधन दोनों, गदायुद्ध में कर हुँकार। मानो लड़त ऐरावत गज दो, धरणी धसकत कठिन प्रहार। जंघा ठोक ठोंककर दोऊ, गदा गगन में लहराते। घूम कूद पुनि बदल पेंतरे, दाँव घातकर टकराते। कभी शीश, भुजदंड प्रहारे, कभी वक्ष पर करते घात। अंगद जैसे कभी अटल से, पीठ, जांघ में चोटें खात ज्यों लुहार घन पे घन पटकै, उठ उठ बुझती चिंगारी। ऐसी ज्वाल गदा से फूटती, मची हुई थी मारा मारी। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 9 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश…. एकलव्य मुदित कर जोड़ कहा, आज्ञा दें, क्या लाऊँ भेंट। कहा द्रोण दो दक्ष अंगूठा, मन की सारी दुविधा भेंट। था बीरब्रती, वह सत्य व्रती, तत्काल काट उत बढ़ा दिया। शिष्यों की भक्ति परीक्षा में, गुरुकुल को टीका चढ़ा दिया। हर आत्मा से चीत्कार उठी, दिनकर डूबा मुख लाल किए। सब लौट गए निज नगरी को, हर्ष ग्लानि उर भाल लिए। एक दिवस कुटिया में बैठे, गुरु करते फिर सोच विचार। शिष्यों से बोले मुस्काते, आज परीक्षा घड़ी तुम्हार। देखो उत्तर दिशा वृक्ष के, शीर्ष भाग पर पंछी एक। साध निशाना बाण चलाओ, मस्तक काट दूर दो फेंक। इतना कह वे चुप हो गए, बोले सब तैयार हैं हम। आज्ञा की बस देरी समझें, नहीं किसी से कोई काम। पैनी दृष्टि डाल सभी पर, बोले प्रथम युधिष्ठिर आओ। आसन ले निज लक्ष्य संभालो, जो पूछे सब सांच बताओ। बोले, क्या तुम देख रहे हो? मेरे संग तब अनुज सारे। पक्षी,पेड़, लता, पत्रादिक, पुष्प, फलादि जे न्यारे। कहा युधिष्ठिर ने नतमस्तक, हाँ, गुरुवर सब देख रहा। रूष्ट द्रोण बोले हट जाओ, तब दुर्योधन आगे बढ़ा। प्रश्न यही दुहराए गुरु ने, वैसा ही उत्तर पाया। कहा भीम ने हँसकर आगे, अंधज की अंधी काया। बाण चढ़ा नित लक्ष्य बाँधकर, बोला दें आज्ञा भगवन। पूछा द्रोण तुम्हें क्या दिखता, कहो लक्ष्य? दृष्टि बंधन। प्रभो, आप सब बांधव दिखते, तरु, शाखाएँ,पत्ते –फूल। चलती ढेर चिटिंयों के दल, साफ-साफ दिखता मग मूल। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 8 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश… रे अबोध! चंचल मृदुभाषी, चुनि-चुनि कितने बोले बोल। नन्हा पिंड ज्ञान की गठरी, भाष लिया तू रतन अमोल। समवयस्क हैं तेरे सारे, एक एक से हैं न्यारे। श्याम गौर सुंदर नय नागर, हृदय हार हैं मतवारे। सब सुकुमार नम्र मनमोहक, बड़े-छोटे मन उजियारे। सेवा, स्नेह, शूरता में भी, बढ़े-चढ़े से शुठि बारे। ज्यों सुमेरु माला में शोभित, ऐसी शोभा पाओगे। कहने को अब समय रहा न, जगत ख्यात हो जाओगे। बस एक मंत्र पिता का सुन लो, सदा-सदा यह ज्ञान रहे। ब्राह्मण हो, ब्रह्मणत्व न जाए, निज धर्मों का ध्यान रहे। बस इतना कह पाए कि, मुनिगण आ पहुँचे द्वार। दौड़ पड़े करने अगुआनी, भुज भरि भेंटें हृदय उदार। अर्घ्य पाद आसन दे सबको, विविध भेंट दिन्हें करिचाव। उर अंतर के जानन हारे, जान गए सारे शुचि भाव। अथ से इति तक कथा बखानी, देखे सुने जे सिरजे ज्ञान। परम प्रसन्न शांत तनु पुलकित, सुनते ऋषि गण सौम्य सुजान। निर्विकार मनमानस पावन, कथा सुहावन मधुवाणी। आनंद का था लहरता, धन्य हुए सारे प्राणी। बोले द्रोण न मम पुरुषारथ, पुण्य प्रताप आपके हैं। भगवन ही की आशीषें हैँ, हम कृपापात्र आपके हैं। चर्चा होते संध्या हो गई, रवि उतरा पश्चिम की छोर। उठे सकल मुनि संध्या करने, लेते विदाई हर्ष हिलोर। ज्यों साधक को सिद्धि मिल गई, प्रतिभा पाई हो पद नाम। वीरता ने पाई ज्यों जयश्री, पाया गुरु ने सुख अभिराम। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 7 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश.... कूंजत बिहंग मनोहर बानी, भांति-भांति स्वर भरि तानें। गुटूर गूँ कहीं करत कबूतर, झुंड –झुंड चुनि-चुनि दानें। कल-कल करते झरते झरने, हरे-भरे पेड़ों की छाँह। श्रम बिहाइ पुनि चलत बटोही, पुलकित तन-मन नव उत्साह। कहीं-कहीं मग में आ जाते, मरकट शावक रीछ मयूर। कहीं शिला, गड्ढे बड़ झाड़ी, रोक-टोक करते भरपूर। पर हय थे अपने मनमाते, तनिक नहीं करते उर शोच। विघ्न बाधाएँ उनके होते, जो होते मन ही के पोच। दुर्गम पथ अरु लंबी दूरी, शून्य शांत अनबूझे ठौर। दौड़ रहे घोड़े सब देखत, आगे-पीछे गरदन मोर। जंगल छोर मिले बनवासी, हृष्ट-पुष्ट वे परम प्रसन्न। तन के काले मन के उजले, प्रकृति गोद में पले विपन्न। धूल धूसरित बदन गठीले, श्रम सीकर युत खुले खुल। गिरि गहूर बन सरिता दुर्गम, कण-कण से वे मिलेघुले। भौतिकता से दूर बहुत ये, स्वाभिमानी जीवन स्वच्छंद। सरल-तरल उर माखन जैसे, सदा संतोषी परमानंद। इतने में आ गया दौड़ रथ, तजि के बन मैदानी छोर। सहज चाल से घोड़े दौड़े, मानो निकट पहुँचते ठोर। अरहर और बाजरे के संग, झूम रही थी हरियाली। कहीं झूमती धान की फसलें, पहनी सोने की बाली। गागर में सागर भरने को, गन्ने की थी खड़ी कतार। पोर-पोर थे पुष्ट रसीले, श्रम सेवा फल देने हार। कहीं झूमती गाती जाती, ग्राम वधू सुंदर संगीत। घूरे में सोने उपजाते, पृथ्वी पूतों की यह रीत। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 6 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश…. अति विनीत सादर सुन वाणी, द्रोण हुए लाचार सही। नजर एक डाली शिष्यन पर, पुनि उर के उद्गार कही। बरबस मुख से स्वस्ति बोले, आँखों में तैर गया पानी। दिग-दिगंत जयजय से गूँजे, धन्य धरा यह रणधानी। अमरावति-सी भरी संपदा, भुक्ति-मुक्ति के सब साधन। गंगा सुत की पावन नगरी, जहां जन्मे जग आराधन। किया आचमन और हरि पूजा, संयुत सब संकल्प विधान। अति उदार उर से भूपति ने, द्विज को देन लगे यूँ दान। शताधिक कपिला गौ दीन्हीं, परम पयस्विनी एक से एक। अलंकार मय प्रथम प्रसूता, सीधी-सादी सुंदर नेक। सोना-चाँदी, कास्य-ताम्र के, विविध पात्र दीन्हे अनुकूल। आसन, चामर, छत्र, पादुका, कौशेय ऊनी वसन दुकूल। भूमि, रत्न और अन्न रसादिक, सौंपे सेवक सुशील सुजान। गद्गद भूप देत सब गिन-गिन, गुरु चरण कमल में आन। बोले द्रोण सुनो जग पालक, श्रेष्ठ ब्रती गुरु बंधु महान। क्या करिहैं इनके हम दाता, योगी को क्या भोग सामान? दोउ कर जोरि राऊ सिर नाये, भाषू विनय न औरे भाव। क्षत्रिय धर्म नाथ पद सेवा, सो सब कीन्हीं संकोच समाव। पुनि संकेत सचिवन्ह कीन्हीं, रूचिर भवन दीजौ पहुँचाय। सेवा सफल होहिं सब केरे, जे द्विज सेवत दृदय जुड़ाय। इन्द्रप्रस्थ तो इन्द्रप्रस्थ था, सुर भी शोभा लखै चुपाय। कछुक दिवस बीते मन मोदत, सुधि आवत एक दिन द्विजराय। भरद्वाज सुत नृपसन बोले, राऊर सुनिए बात हमार। जस कीन्हें सब सेवा हमरी, कहि न सकैं जिव्हा अगार। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 5 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश…. था समीप उद्यान बड़ा, सब खेल रहे थे सुंदर गेंद। उछल गई वह दूर बहुत, बालक घेरे में दे सेंध। गिरी गेंद जा कूप के भीतर, जनु भवसागर में आत्मा। गेंद विहीन खिन्न थे सारे, तब ही पहुँचे महात्मा। कर कर युक्ति सभी थे हारे, गला दाल न किसी का था। बिकल ताकते इत उत सारे, ज्यों इंतजार ऋषि का था। जाकर निकट मुनि ने देखा, परख आए सब हाल-हवाल। हँस कर वे तृण शर ले फूँके, बाहर हुई गेंद तत्काल। लपक पड़े कुछ कंदुक लेने, पर गुरु बोले थम जाओ। कहो कौन कुल के दीपक हो, नाम गोत्र तो बतलाओ? खिसक गए पीछे नत सिर से, सैन बड़े भ्राता की पा। बढ़ा युधिष्ठिर इत दाँए से, बाँए बढ़ा सुयोधन आ। मुनि ने कर संकेत हाथ से, ठट के ठट सब बैठाए। साक्षात्कार हुआ क्षण भर में, हँसी ठिठोली मन भाए। कर प्रणाम आशीषें लेकर, विदा हुए सारे शिष गण। दौड़ पड़े सब आतुर गृह को, मची राह पे फिर भगदड़। लग गई दौड़ की थी बाजी, सबके मन था नव उल्लास। कितने गिरे, भिरे पुनि दौड़े, पहुँचे सभी पितामह पास। काहू की थी ठुकी कोहनी, काहू के घुटने में चोट। बिखरे केश वसन काहू के, कोऊ फफक रहा करि ओट। पोतों से घिरे थे पितामह, अस्त-व्यस्त हो गए सामान। ठेलम ठेल कि धक्के-मुक्के, चीख-चाख भर डाले कान। स्नेह सिक्त कर उठा-उठा, शांत-शांत कहते हँसते। पूछ रहे क्या बात हुई, पुचकार डाँट कसते-कसते। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 4 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश... दूत धर्म और कर्म कठिन है, रखना होता तौल सही। खंग धार पर चलना होता, जीवन का कुछ मोल नहीं। सोच रहा था दूत मनहि मन, कैसे अर्ज सुनाऊँ में। उधर द्वार पर ब्राह़्मण कोपे, कैसे शीश बचाऊँ मैँ। लौट पड़ा कोरा मुख लेकर, पक्षाघात का मारा सा। दशा देखकर द्रोण समझ गए, दहका मुख अंगारा-सा। शब्द बेधि के शब्द बेधते, बोल में बज्रपात किया। अरे क्षुद्र, दंभी, खल, पापी, अधम द्रुपद तू समझा क्या? दहता मन कहता कि अभी ही, राजपाट तब रव्वार करूँ। पर दिए वचन का सोच मुझे हैं, इससे कुछ करने में डरूँ। निर्दोष प्रजा है दया पात्र, इससे नहीं हाथ उठाता हूँ। पर दूँगा दंड अवश्य तुझको, हो सावधान! मैं जाता हूँ। विकल विप्र की आह अनल से, तपी धरा ज्यों पातक ताप। ग्रहण ग्रसित सा राज भासता, निस्तेज लगा डूबा संताप। सुध-बुध खोये से सेवक थे, पराधीन चिंतित असहाय। कठिन काल था, हा! आ पहुँचा, ईश कोप ते कौन बचाय। तपसी का तन तप्त प्राय था, अपमानी अंगारों से। गृषम लू सी श्वांसे झलती, फूँकारत फणियारों से। कहते धिक-धिक मृत्यु लोक यह, धिक-धिक अरे! मनुजता। धिक जीवन ! क्या ऐसा जीना, कोई उच्च कोई यूँ हीन? अरी पापिनी निर्धनते तू? कितने की कर चुकी विनाश। री तृष्णे ! युग-युग तू पीकर, बुझा सकी न अपनी प्यास। अच्छा हुआ न माँगा कुछ भी, देता कृपण नहीं कुछ आज। भरी सभा में लुटिया लुटती, फिरा द्वार से बच गई लाज। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 3 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश... श्रम से थके-थके से द्विजवर, ललक उठे सुस्ताने को। उज्जवल भाल छलकते मोती, छहर रहे छवि छाने को। वृक्ष विशाल खड़ा था सम्मुख, जटाजूट युत बट का पेड़। क्षितिज छत्र सा तना हुआ था, करने शीतल छाया भेंट। दीर्घ श्वास-प्रश्वास छोड़ते, बैठ गए तब गुरु ज्ञानी। स्वागत गान किया खग कुल ने, मधुर-मधुर कलरव बानी। संध्या समय आन था पहुँचा, घूम माल क्षिति छहराये। गो वृंदों की घंट-घंटियाँ बजी, धूलि नभ में छाए। कलियाँ झुका रहीं थीं शीशें, पाकर मंद मरूत को संग। बाग बिहंसता कुसुम वारता, गाए मधुपों ने मधु छंद। धन्य प्रभाव महात्माओं के, जड़ भी हो जाते चैतन्य। सत्संगति में वे भी मानो, मान रहे थे निज को धन्य। मुनि ने देखा संध्या होते, करने चले पुण्य स्नान। पहुँच गए सरिता के तट पर, नित्य नैमित्तिक क्रिया सिरान। कटि पर्यंत गए जलि भीतर, लगे करन अघमर्षण जाप। महामंत्र प्रणवाक्षर जपते, भस्मी भूत हुए सब पाप। सूर्योप्रस्थान लगे जब करने, हुए दृष्टिगत बटुसमुदाय। करते थे समवेत स्वरों में, सस्वर पाठ मंत्र हरषाय। इधर दिवाकर देव अर्घ्य लें, लोप हुए शुचि अंबर तर। उड़गन लगे झाँकने लुक छिप, उधर निशा प्यारी लखकर। बलवानों के इति श्री होते, ज्यों सिर पोच उठाते हैं। ऐसे इत उत जुगनू सारे, उडि-उडि चमक दिखाते हैं। लौट पड़े थे द्विजगण सारे, अपने-अपने आश्रम ओर। गुरु भी लौट शिला आ राजे, ध्यानावस्थित भाव विभोर। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 2 – श्री रामशरण शर्मा

‘ रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश... पावन सूर्य, चंद्र कुल वंशी, छोड़ बिसारे हैं कुलकानि। कैसा कठिन काल आ पहुँचा, द्विज कुल के करने अपमान। बीरब्रती, गंगासुत तेरी, अद्भुत सुनी कहानी है। क्या वंशों की आन न तुझको, या भूला निज पानी है। जापर विपत्ति पड़े सोइ जाने, तुमको क्या अपने पर के। आरत बोल ब्राह्मणि बोलत, आए तभी द्रोण घर पे। पावन कुटिया में क्यों कल्मष, शून्य ठौर में क्यों आवाज? कैसी घटी कौन-सी घटना, हतप्रभ खड़े न समझे राज। संयत हो मुनिवर तब बोले, विषय बिचारि बचन सरसात। तप्त ताम्र सा क्यों मुख मंजुल, सत्ये! सत्य कहो सब बात। उलझे केश वेश पट बिखरे, अश्रु सिक्त क्यों अरुण नयन। बोलो क्या कुछ हुआ अचानक, बोली तब वह रुद्ध बयन। नाथ! अनर्थ हुआ कुछ ऐसा, कहते अंतस फटता है। सहा न जाता बिना कहे भी, कहने को नहीं जँचता है। नित्य दिनों की भाँति आज भी, खेलने को था गया कुमार। बाल सखन बीच जाने कैसे, पलक झपकते हो गए रार। लगे चिढ़ाने इनको मिलकर, एक-एक से कर-कर व्यंग्य। कुछ से हो गई हाथापाई, भगदड़ मचा निराले ढंग। एक ने हाथ पकड़ कर पूछा, बड़े बली तुम लगते हो। बड़े-बड़े से लेते टक्कर, दूधपायी बन ठगते हो? हमें बताओ साथी सच्चे, दूध पीया कि देखा है? कडुआ, तीता, मीठा, सीठा, कहो स्वाद क्या लेखा है? गोरस क्या, है भूतल अमृत, शुचि सर्वोत्तम मधुर आहार। देखो, कामधेनु रस पीकर, किए स्वर्ग पर सुर अधिकार। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

खंडकाव्य – रस द्रोणिका – 1 – श्री रामशरण शर्मा

‘रस द्रोणिका’ खंडकाव्य एक ऐसी कृति है, जिसमें एक ऐसा पात्र के संघर्षमयी जीवन का शाश्वत एवं जीवंत वर्णन किया गया है, जो आगे चलकर समाज, देश, काल एवं इतिहास में अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। जो भावी पीढ़ी के लिए एक सबक है कि जब जब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति ने कर्म एवं समाज के पथ-प्रदर्शक गुरु का अपमान किया है, तब-तब आचार्य द्रोण और चाणक्य जैसे महामानव का प्रादुर्भाव हुआ है। जिसने ऐसे उद्दंड, स्वार्थी व्यक्ति से समाज और देश को मुक्ति दिलाई है। आचार्य श्री रामशरण शर्मा द्वारा रचित यह एक अनुपम कृति है। काव्य का अंश…. श्री गणेश पद कमल मनोहर, हरषित हिये प्रथम धरि ध्यान। बंदि शारदे पुनि-पुनि ध्याऊँ, मातु-पिता, गुरु, इष्ट, महान। जे वर विज्ञ, कवित्त गुण ग्राही, ललित कला साहित्य सुजान। दोउ कर जोरि अशिषे मांगत, सादर करूं द्रोण गुण गान। भरद्वाज सुत द्रोण ऋषि थे, तपोपूत ब्रह्मर्षि एक। सकल शास्त्र निष्णात मुनि वे, अस्त्र-शस्त्र युत निपुण विवेक। तपोभूमि में तप्त हेम से, द्विजवर थे ईश्वर रसलीन। ब्रह्मतेज से तप्त तपी वे, जीवन था बस तप आधीन। सहज शांत शीतल बन बसते, जितेन्द्रियी वर व्रती जयी। भार्या जिनकी सरल सुशीला, सती साध्वी मोदमयी। एक लाल था अश्वत्थामा, जुग प्राणों के प्राण अधार। गौर पुष्ट स्निग्ध बदन था, पूरा गया पिता पर वार। जगत ख्यात बालक हठ जैसा, ऐसा वह हठ का भरपूर। हुआ पूज्य जग में अश्वत्थ सा, अश्वत्थामा शूरम-शूर। रत्नसार सा वह कुटिया में, दमक रहा था चारों ओर। खिला-खिला सा बदन मनोहर, बाल बयस सुंदर दृग चोर। सुध-बुध खोया सा चिल्लाता, रोता आया था भूखा। दुई घूँट दूध की खातिर, तरस रहा था मुँह सूखा। पूरे काव्य का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

जवान कब तक होते रहेंगे शहीद




आज हरिभूमि में प्रकाशित आलेख

लेख – बिल्ली पुराण – प्रो. एस. सिवादास

प्रो. एस सिवादास केरल शास्त्र साहित्य परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते हैं और लंबे समय से खासतौर पर बच्चों के साहित्य से जुड़े हैं। आपने केरल शास्त्र साहित्य परिषद की मशहूर बाल विज्ञान मासिक पत्रिका यूरेका का दस सालों तक कुशल सम्पादन किया और उसे भारत की आदर्श बाल विज्ञान पत्रिका बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूरेका एक मलयालम मासिक पत्रिका है। प्रो. एस. सिवादास ने बच्चों के साथ प्रभावी संपर्क कायम करने के लिए वर्षों शोध करके लेख, कहानियाँ, नाटक, कठपुतली, पहेली, चित्रकथाएँ, कार्टून आदि के माध्यमों को अपनाया। यहाँ हम उनके विज्ञान से जुड़े हुए बाल लेख का हिंदी भावानुवाद ऑडियो के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। भावानुवाद का कार्य किया है, डॉ. राणा प्रताप सिंह और राकेश अन्दानियाँ ने। लेख का अंश… बिल्ली का अपना एक अलग व्यक्तित्व होता है। उसको अपने आप पर बहुत गर्व है। वह अपने आपको एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति मानती है। वह अपने आप को किसी का गुलाम नहीं समझती है। एक पालतू कुत्ता अपने मालिक के प्रति बहुत वफादार और विनम्र होगा। वह बहुत आज्ञाकारी और स्वामीभक्त होगा किंतु क्या बिल्ली के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है? बिल्ली के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि कोई उसे प्यार करता है या सहलाता है, तब भी उसके अंदर गुलामी की भावना नहीं आती। थोड़ी-सी भी नहीं। बल्कि वह तो यही सोचती है कि वह इसी के काबिल है। कुत्ता जमीन पर सोता है। उसे रात में सोने के लिए ज्यादा समय भी नहीं मिलता। लेकिन बिल्ली को सोने के लिए घर मं सबसे आरामदेह जगह मिल जाती है। अगर संभव हुआ तो वह बिस्तर पर भी सो जाएगी। अगर उसे बिस्तर या कुर्सी नहीं मिल पाए तब भी वह बारिश और ठंड से बचने के लिए कोई अच्छी-सी जगह खोज ही लेती है। उसे सहलाया जाना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा शायद इसलिए है कि वह अपने आपको शाही परिवार से यानी कि शेर और चीते के परिवार से जुड़ा हुआ मानती है। आदमी आदिकाल से बिल्ली पालता आया है। भारत, मिस्र, चीन आदि देशों में बिल्ली पालन हुआ करता था और आज भी होता है। प्राचीन मिस्र में तो बिल्ली की पूजा भी की जाती थी। उसकी मूर्ति मंदिरों में स्थापित की जाती थी। जब बिल्ली मर जाती थी, तो उसकी ममी बनाई जाती थी। बिल्ली का मकबरा या समाधि बनाई जाती थी। बिल्ली के बारे में ऐसी ही रोचक जानकारी ऑडियो की मदद से प्राप्त कीजिए…

लेख – अण्डा और डण्डा – प्रो. एस. सिवादास

प्रो. एस सिवादास केरल शास्त्र साहित्य परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते हैं और लंबे समय से खासतौर पर बच्चों के साहित्य से जुड़े हैं। आपने केरल शास्त्र साहित्य परिषद की मशहूर बाल विज्ञान मासिक पत्रिका यूरेका का दस सालों तक कुशल सम्पादन किया और उसे भारत की आदर्श बाल विज्ञान पत्रिका बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूरेका एक मलयालम मासिक पत्रिका है। प्रो. एस. सिवादास ने बच्चों के साथ प्रभावी संपर्क कायम करने के लिए वर्षों शोध करके लेख, कहानियाँ, नाटक, कठपुतली, पहेली, चित्रकथाएँ, कार्टून आदि के माध्यमों को अपनाया। यहाँ हम उनके विज्ञान से जुड़े हुए बाल लेख का हिंदी भावानुवाद ऑडियो के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। भावानुवाद का कार्य किया है, डॉ. राणा प्रताप सिंह और राकेश अन्दानियाँ ने। लेख का अंश… किसी जमाने में कहीं पर एक ज़ीरो रहता था। जब वह छोटा था, तो हमेशा लुढ़ककर खेलते हुए इधर-उधर चक्कर काटता रहता था। वह जन्म से ही गोल-मटोल था और इसलिए उसके लिए लुढ़कते रहना बहुत आसान था। एक दिन वह सड़क के किनारे लुढ़कता हुआ जा रहा था। तभी सड़क के किनारे खड़े ‘एक’ ने उसे देखा। ‘एक’ ने मुस्कराते हुए उसे छेड़ा, देखो, देखो… एक ज़ीरो लुढ़कता हुआ चला जा रहा है। एक मामूली-सा गोल-मटोल ज़ीरो। ज़ीरो ने ऐसा दिखाया जैसे उसने उसकी बातों को सुना ही न हो। वह उसी बेपरवाही से लुढ़कता रहा। तब ‘एक’ ने फिर उसे छेड़ा, एक शून्य जिसकी कोई कीमत नहीं। अगर किसी को यह परीक्षा में मिल जाए, तो वह शर्म से पानी-पानी हो जाए। सारे दोस्त उसका मजाक उडाए कि देखो, यह है, बहुत बड़े अण्डे का शानदार विजेता। उसे चिढ़ाने के बाद ‘एक’ ने घमंड से अपनी छाती फुलाई और लम्बा दिखने के लिए और अधिक तनकर खड़ा हो गया। ‘एक’ ने मुँह चिढ़ाते हुए कनखियों से उसे देखा और कहा – इस बे औकात के बंदे की बेवकूफी की कोई कीमत नहीं। क्या ज़ीरो ने ‘एक’ की इन बातों का जवाब दिया? क्या ‘एक’ का घमंड दूर हुआ? किसे सबक मिला और किस तरह मिला? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

लेख – हाथ की करामात – प्रो. एस. सिवादास

प्रो. एस सिवादास केरल शास्त्र साहित्य परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते हैं और लंबे समय से खासतौर पर बच्चों के साहित्य से जुड़े हैं। आपने केरल शास्त्र साहित्य परिषद की मशहूर बाल विज्ञान मासिक पत्रिका यूरेका का दस सालों तक कुशल सम्पादन किया और उसे भारत की आदर्श बाल विज्ञान पत्रिका बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूरेका एक मलयालम मासिक पत्रिका है। प्रो. एस. सिवादास ने बच्चों के साथ प्रभावी संपर्क कायम करने के लिए वर्षों शोध करके लेख, कहानियाँ, नाटक, कठपुतली, पहेली, चित्रकथाएँ, कार्टून आदि के माध्यमों को अपनाया। यहाँ हम उनके विज्ञान से जुड़े हुए बाल लेख का हिंदी भावानुवाद ऑडियो के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। भावानुवाद का कार्य किया है, डॉ. राणा प्रताप सिंह और राकेश अन्दानियाँ ने। लेख का अंश… अपने छोटे सुंदर हाथों को देखो। कितने खूबसूरत हैं। हर हाथ में पाँच उँगलियाँ। पहली उँगली अंगूठा और उसके बाद तर्जनी। अगली मध्यमा है। उसके बाद अनामिका और आखरी में कनिष्ठा है। हमें हाथ के रूप में कितना अनमोल उपहार मिला है। ये हाथ इतने लचीले होते हैं कि इसकी सहायता से कितने ही काम किए जा सकते हैं। हाथों की अनोखी क्षमता और विशेषता होती है। इनके माध्यम से औजार बनते हैं और उनमें सुधार भी किया जा सकता है। हाथों का यह उपहार आदमी को अन्य जानवरों से बेहतर बनाता है। इन्हीं हाथों की सहायता से विज्ञान और तकनीकी का विस्तार और विकास संभव हो पाया है। महान गुरु द्रोणाचार्य हाथों की उपयोगिता जानते थे इसलिए उन्होंने एकलव्य से अंगूठे की माँग की। अंगूठा जाते ही एकलव्य की प्रतिभा भी चली गई। वह श्रेष्ठ धर्नुधर नहीं बन पाया और यह श्रेय अर्जुन को प्राप्त हुआ। आज के कंप्यूटर के युग में हमने मशीनी मानव यानी कि रोबोट बनाए हैं। उसके भी हाथ होते हैं लेकिन उन हाथों की तुलना मानव हाथों से नहीं की जा सकती। रोबोट की उँगलियाँ उतनी कारगर नहीं होती जितनी कि आदमी की उँगलियाँ। हाथों के बारे में ऐसी ही अनोखी जानकारी प्राप्त कीजिए ऑडियो के माध्यम से….

बुधवार, 21 सितंबर 2016

कुछ कविताएँ – 1 - डॉ. रेणु शर्मा

प्रकृति.... कविता का अंश... प्रकृति सावन की फुहारों में, माँ के आँचल-सी नहा रही है। ऊँची अट्‌टालिकाएँ तर-ब-तर हो रही हैं। घने बीहड़ जंगल, नदी-सागर-झीलें, वृद्ध सल्तनत के स्मृति चिह्न, मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च, मस्जिद सब उबटन कर नहाए-से चमक रहे हैं। सूख गए कुँए, तालाब-बावड़ी, शेष को बहा रहे हैं। प्रकृति, कर्मठ हो रही है। गर्भवती-सी मदमस्त हो रही है। माँ के सूखे दूध-सी, अब रिचार्ज हो रही है। संतति को सींच रही है, बादलों से बरसता अमृत, देव मदिरालय-सा महक रहा है। भूमि रंग बदल रही है, लहराती फसलें, नन्हें बच्चों-सी, किलकारी मार रही है। वसुन्धरा, वत्सला-सी चहक रही है... ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

अकबर-बीरबल की कहानी – 20

काजी की धूर्तता.... कहानी का अंश... दिल्ली में फातिमा बीबी नाम की एक स्त्री रहती थी। उसका पति मर गया था। उसकी कोई संतान भी नहीं थी। एक दिन उसने अपने बाकी दिन काटने के लिए हज करने का इरादा किया और इसी इरादे के साथ उसने मक्का-मदीना जाने की तैयारी की। उसने अपने कुछ आभूषणों को बेच कर सोने की मोहरें खरीदी और उन मोहरों में से कुछ खर्च के लिए अपने पास रख ली। बाकी की आठ सौ मोहरें एक मजबूत थैली में बंद करके उसके ऊपर लाख की मोहर लगाकर उसे बंद कर दिया। फातिमा बीबी के पड़ोस में एक काजी रहता था। जिसको लोग बड़ा त्यागी और पवित्र मानते थे। फातिमा बीबी उस थैली को लेकर उसके पास पहुँची और उसे अपनी थैली रखने के लिए कहा। उसने कहा कि इस संसार में आप ही सच्चे और पवित्र मनुष्य हैं। इसलिए आप इस थैली को अपने पास रख लें। मैं हज करने जाना चाहती हूँ। इस में आठ सौ मोहरें हैं। यदि मैं जीती जागती वापस आ गई तो इस थैली को आपसे ले लूँगी और यदि वहीं पर मर गई तो आप इसके मालिक हैं। जो आपकी इच्छा हो, वो कीजिएगा। यह सुनकर काजी ने वह थैली अपने पास रख ली। फातिमा बीबी हज करने के लिए चली गई। जब वह पाँच वर्ष तक वापस नहीं आई तो काजी की नीयत बिगड़ गई। उसने उन मोहरों को हथियाने का सोचा। कुछ दिन तक सोच-विचार कर उसने एक तरकीब खोज निकाली और उस थैली में से आठ सौ मोहरें ले ली। पाँच वर्ष बाद जब फातिमा बीबी वापस आई तो उसे उसकी थैली लौटा दी। जब फातिमा ने अपनी थैली वैसी की वैसी ही सिली हुई देखी तो बड़ी खुश हुई। लेकिन जब घर जाकर उसे खोला तो उसमें से मोहरें गायब थीं। आखिर मोहरें कहाँ गई? क्या उसे काजी ने ले लिया? किस तरह? थैली में मोहरों के बदले में क्या था? इस अन्याय के बाद क्या हुआ? न्याय किसने किया और किस तरह किया? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

अकबर-बीरबल की कहानी – 19

चतुर और मूर्ख....एक दिन बादशाह अकबर ने पूछा – संसारी बातों में किस जाति के लोग चतुर और किस जाति के लोग मूर्ख होते हैं? बीरबल ने उसी वक्त जवाब दिया – आजीजहाँ, संसारी बातों में सबसे चतुर व्यापारी होते हैं और सबसे मूर्ख होते हैं, मुल्ला। बादशाह को इस बात पर यकीन नहीं हुआ। मन ही मन उन्होंने सोचा कि पढ़े-लिखे मुल्ला कदापि मूर्ख नहीं हो सकते। अपने इस आंतरिक भाव को उन्होंने बीरबल से कह दिया। बीरबल ने कहा- हुजूर, यदि कुछ रकम खर्च करें तो मैं यह साबित कर सकता हूँ कि मुल्ला वास्तव में मूर्ख होते हैं। बादशाह ने मान लिया। बीरबल की आज्ञा से प्रधान मुल्ला को दरबार में हाजिर होने का हुक्म दिया गया। मुल्ला के आ जाने पर बीरबल ने बादशाह से अर्ज किया – हुजूर, मेरी बातों में आप हस्तक्षेप नहीं करेंगे। जो कुछ हम करते हैं, चुपचाप शांत होकर सुनेंगे। बादशाह ने बीरबल की बात मान ली। मुल्ला दरबार में आकर एक जगह बैठ गया। बीरबल ने उसे अपने पास बुलाया और बड़ी नम्रतापूर्वक अपने पास बैठाते हुए कहा – मुल्लाजी, बादशाह सलामत को आपकी दाढ़ी की आवश्यकता है। आपको इसके बदले में जो इनाम आप माँगेंगे, वह दिया जाएगा। अचानक दरबार में अपना बुलावा सुनकर मुल्ला तो वैसे भी पहले से घबराए हुए थे। अब यह सुनकर तो उनका रहा-सहा होशहवास भी काफूर हो गया। वे अपनी काँपती आवाज में बोले – दीवान जी, यह कैसे संभव है? दाढ़ी तो खुदा का दिया हुआ उपहार है। सबसे प्यारी वस्तु है। उसे कैसे दिया जा सकता है? तब बीरबल ने उसे डपटते हुए कहा – मुल्ला जी, इतने दिनों से जिनका नमक खाया है, आज उन्हें केवल आपकी दाढ़ी की जरूरत है, जिस के देने में आप आनाकानी कर रहे हैं? आप से और किसी महत्व की चीज को पाने की तो आशा भी नहीं की जा सकती। यह तो उनकी मेहरबानी है कि वे इसके लिए आपको मुँहमाँगा इनाम भी दे रहे हैं। बीरबल की बातों को सुनकर मुल्ला घबरा गया और बोला – तो ऐसा कीजिए... दस रूपए दिलवा दीजिए। और फिर मुल्ला की दाढ़ी काट दी गई और उसे सरकारी खजाने से दस रूपए दिलवा दिए गए। फिर व्यापारी को बुलवाया गया। क्या उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया गया? क्यो? व्यापारी ने कितने रूपयों की माँग की? या फिर व्यापारी ने और कुछ माँग की? बादशाह बीरबल की इस प्रयोग से संतुष्ट हुए या नहीं? यह सारी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

अकबर-बीरबल की कहानी – 18

चार मूर्ख... कहानी का अंश... एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल को आज्ञा दी – बीरबल, चार ऐसे मूर्ख खोजकर लाओ जो एक से बढ़कर एक हो। बादशाह की आज्ञानुसार बीरबल नगर में ढूँढ़ने निकल पड़े। उन्होंने रास्ते में एक मनुष्य देखा, जो एक थाल में जोड़े, बीड़े और मिठाई लिए बड़ी शीघ्रता से जा रहा था। बीरबल ने बड़ी कठिनाई से उसे रोककर कहा, भाई, यह सामान कहाँ ले जा रहे हो? उसने कहा – मेरी स्त्री ने दूसरा पति किया है, जिससे उसके पुत्र उत्पन्न हुआ है, मैं उसी के लिए बधावा लेकर जा रहा हूँ। बीरबल ने उसे अपन साथ ले लिया। और आगे चल कर थोड़ी दूर जाने पर उसे एक और मनुष्य मिला, जो घोड़ी पर सवार था और सिर पर घास का बोझ रखे हुए था। बीरबल ने उससे इसका कारण पूछा कि भाई तुम ये घास का बोझ अपने सिर पर क्यों रखे हुए हो? वह मनुष्य बोला – मेरी घोड़ी गर्भिणी है। इसलिए अपने सिर पर घास का बोझ रख कर इस पर बैठा हूँ। दोनों का बोझ उठाने पर यह थक जाएगी। बीरबल ने उसको भी अपने साथ ले लिया और फिर दोनों के साथ बादशाह के सामने दरबार में हाजिर हुआ और बोला – हुजूर, चारों मूर्ख हाजिर है। बादशाह ने देखा और कहा – मुझे तो केवल दो ही दिखाई दे रहे हैं। दो और कहाँ है? तब बीरबल ने क्या जवाब दिया होगा? क्या बादशाह अकबर, बीरबल के जवाब से प्रसन्न हुए होंगे? आपके अनुसार चार मूर्ख कौन हो सकते हैं? इन जिज्ञासाओं के समाधान के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

अकबर-बीरबल की कहानी – 17

चोरी का पता.... कहानी का अंश...एक बार शहर के किसी मशहूर व्यापारी के यहाँ चोरी हो गई। उनका बहुत-सा धन चोरी चला गया। व्यापारी ने इसकी शिकायत काजी से की। जाँच-पड़ताल शुरू हुई लेकिन चोर पकड़ा न जा सका। बात बादशाह तक पहुँची और उन्होंने बीरबल से चोर को पकड़कर माल बरामद करने का हुक्म दिया। बीरबल ने उस व्यापारी को बुलवाया और उससे पूछा – क्या तुम्हें किसी पर संदेह है? यदि हो तो साफ-साफ बता दो। देखो, घबराओ नहीं। तुम्हें सारा धन वापस मिल जाएगा। व्यापारी ने उत्तर दिया – हुजूर, मेरा यह अंदाजा है कि चोरी मेरे नौकरों में से ही किसी ने की होगी क्योंकि बाहर का आदमी तो घर की इतनी जानकारी नहीं रख सकता। लेकिन मैंने किसी को चोरी करते हुए देखा नहीं है, इसलिए मैं किसी के बारे में दावे के साथ नहीं कह सकता कि फलाँ शख्स ने चोरी की है। बीरबल ने सिपाही को भेजकर उस व्यापारी के घर से नौकरों को दरबार में बुलवाया। नौकरों के आने के बाद बीरबल ने असली चोर का पता कैसे लगाया होगा? क्या व्यापारी का सारा धन वापस मिल गया होगा? क्या नौकरों ने ही चोरी की होगी? इन जिज्ञासाओं के समाधान के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

अकबर-बीरबल की कहानी – 16

शराब के छह रूप.... कहानी का अंश... अकबर बादशाह को वृद्धावस्था में शराब का शौक कुछ ज्यादा ही हो गया था। रात में जब वे अपने नवरत्नों के साथ बातें करते तो उस वक्त थोड़ी-सी पी लिया करते थे। वे ऐसा छिपकर करते थे, फिर भी उनकी बातचीत के ढंग से बीरबल को एक दिन इसका पता चल ही गया। इसके बाद बीरबल ने एक दिन उन्हें शराब पीते हुए भी देख लिया। तभी उन्होंने बादशाह की इस बुरी लत को छुड़ाने का प्रण ले लिया। जिस कमरे में बादशाह शराब रखते थे, एक दिन बीरबल वहाँ गए और वहाँ की प्रत्येक वस्तु को ध्यान से देखा। इसके बाद वहाँ की सब चीजें तितरबितर कर के शराब की बोतल को बगल में दुशाले से ढँक कर तेजी से बाहर निकल आए। बीरबल को कुछ ले जाते हुए बादशाह ने दिख लिया मगर उन्होंने समझा कि बीरबल कुछ आवश्यक कागज़ात ले जा रहे होंगे, यही सोचकर वे चुप रहे। उनके जाने के बाद कुछ आवश्यक बातें बादशाह को जानने की जरूरत महसूस हुई। उन्होंने बीरबल को बुलवाया। बगल में वही वस्तु दबाए हुए बीरबल बादशाह के पास आए। बातचीत करते समय बादशाह का ध्यान फिर उनकी बगल की तरफ गया और उन्होंने बीरबल से पूछा – बीरबल, तुम्हारी बगल में क्या है? बीरबल ने उत्तर दिया – कुछ भी तो नहीं है, जहाँपनाह। बीरबल के उत्तर से बादशाह की उत्सुकता और बढ़ गई। उन्होंने फिर पूछा तो बीरबल बोले – तोता है। क्या वजह थी कि बीरबल बादशाह को इस तरह का जवाब दे रहे थे? बीरबल के इस जवाब से बादशाह की क्या प्रतिक्रिया हुई? क्या बीरबल बादशाह की शराब पीने की बुरी लत छुड़ा पाए? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कहानी – कुर्बानी – बलविन्द्र ‘बालम’

कहानी का अंश... सुरजीत एक करोड़पति बाप का लड़की है। बहुत सुशील, चंचल तथा खूबसूरती की प्रतिमा। भुपिन्दर एक निर्धन घर का लड़का है। उसका बाप विकलांग है। उसकी माँ लोगों के घर के बर्तन साफ करके घर का गुजारा चलाती है। भुपिन्दर अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा है। बेशक उसकी माँ बर्तन साफ करके घर का गुजारा चलाती है परंतु वह भुपिन्दर को शहर के एक अच्छे स्कूल में पढ़ा रही है। भुपिन्दर पढ़ाई में बहुत होशियार है। प्रत्येक कक्षा में प्रथम आता है। भुपिन्दर तथा सुरजीत दसवीं तक एक ही कक्षा में पढ़ते आ रहे हैं। दोनों ही एक-दूसरे की ओर आकर्षित है। कक्षा में किसी न किसी बहाने सुरजीत उससे सवाल आदि समझने के बहाने बहुत समय तक बैठी बातें भी करती रहती है। दसवीं कक्षा का परिणाम निकलता है तो भुपिन्दर मैरिट में आता है परंतु सुरजीत द्वितीय दर्जे में पास होती है। सुरजीत भुपिन्दर को एक ही कक्षा में पढ़ने के लिए कहती है परंतु भुपिन्दर अपनी मजबूरी बताता हुआ कहता है कि सुरजीत मैं दसवीं से आगे नहीं पढ़ सकता क्योंकि मेरी माँ कहती है कि अब मैं कॉलेज का खर्च नहीं उठा सकती। तुम कोई नौकरी ढूँढ़ लो। परंतु सुरजीत उसे तसल्ली देते हुए कहती है कि भुपिन्दर, देख मैं तुझे सारा खर्चा दूँगी। पुस्तकें, वस्त्र और आर्थिक जरूरतें भी पूरी करूँगी। भुपिन्दर तू कॉलेज में दाखिला ले ले। तुम अपनी माँ को इस बात के लिए सहमत कर लो। यद्यपि भुपिन्दर, सुरजीत से इतने बड़े उपकार के नीचे अपने अस्तित्व को दबाना नहीं चाहता, लेकिन फिर भी सुरजीत के मोह में फँसा वह अपनी माँ को इसके लिए सहमत कर ही लेता है। अब सुरजीत तथा भुपिन्दर एक ही कॉलेज में दाखिला ले लेते हैं। दाखिला तथा पुस्तकों का सारा खर्च सुरजीत ही उठाती है। वह उसके लिए एक सुंदर घड़ी भी खरीद देती है। भुपिन्दर उससे सारी वस्तुएँ लेता तो है पर मन ही मन शर्मिंदगी भी महसूस करता है जैसे कि उसकी गुरबत खरीदी जा रही हो। परंतु सुरजीत के प्यार के कारण वह सब कुछ खुशी से स्वीकार कर लेता है। वह सुरजीत के प्यार के टुकड़े-टुकड़े नहीं करना चाहता। उसको पता है कि उसके इनकार के पत्थर उसके जज़्बात को किरचियों में बदल सकते हैं। अब दोनों प्री-मेडिकल में दाखिला ले लेते हैं। दोनों की पढ़ाई साथ-साथ चलती रहती है। साथ ही दोस्ती भी परवान चढ़ती है। आगे क्या होता है, यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

कहानी – मुर्दों का गाँव –धर्मवीर भारती

कहानी का अंश.... उस गाँव के बारे में अजीब अफवाहें फैली थीं। लोग कहते थे कि वहाँ दिन में भी मौत का एक काला साया रोशनी पर पड़ा रहता है। शाम होते ही कब्रें जम्हाइयाँ लेने लगती हैं और भूखे कंकाल अँधेरे का लबादा ओढ़कर सड़कों, पगडंडियों और खेतों की मेड़ों पर खाने की तलाश में घूमा करते हैं। उनके ढीले पंजरों की खड़खड़ाहट सुनकर लाशों के चारों ओर चिल्लाने वाले घिनौने सियार सहमकर चुप हो जाते हैं और गोश्तखो गिद्धों के बच्चे डैनों में सिर ढाँपकर सूखे ठूँठों की कोटरों में छिप जाते हैं। और इसी से जब अखिल ने कहा कि चलो उस गाँव के आँकड़े भी तैयार कर लें, तो मैं एक बार काँप गया। बहुत मुश्किल से पास के गाँव का एक लड़का साथ जाने को तैयार हुआ। सामने दो मील की दूरी पर पेड़ों की झुरमुटों में उस गाँव की झलक दिखाई दी। मील भर पहले से ही खेतों में लाशें मिलने लगीं। गाँव के नजदीक पहुँचते-पहुँचते तो यह हाल हो गया कि मालूम पड़ता था भूख ने इस गाँव के चारों ओर मौत के बीज बोए थे और आज सड़ी लाशों की फसल लहलहा रही है। कुत्ते, गिद्ध, सियार और कौवे उस फसल का पूरा फायदा उठा रहे हैं। इतने में हवा का एक तेज झौंका आया और बदबू से हमारा सिर घूम गया। मगर फिर जैसे उस दुर्गंध से लदकर हवा के भारी और अधमरे झौंके सूखे बाँसों के झुरमुटों में अटककर रूक गए। और सामने मुर्दो के गाँव का पहला झोंपड़ा दिख पड़ा। तीन और दीवारें गिर गई थीं और एक ओर की दीवार के सहारे आधा छप्पर लटक रहा था। दीवार की आड़ में एक कंकाल पड़ा था... आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

शनिवार, 17 सितंबर 2016

बाल कहानी – चतुर लोमड़ी

कहानी का अंश… एक था रीछ। उसे शहद खाने का बड़ा शौक था। उसने बहुत-सा शहद हाँडियों में भरकर रखा था। एक दिन उधर से गुजरते हुए एक लोमड़ी की नजर शहद की हाँडी पर पड़ गई और वह शहद खाने का उपाय सोचने लगी। कुछ दिनों बाद ही उसे अवसर मिल गया। उस दिन झमाझम बारिश हो रही थी। वह दौड़ी-दौड़ी रीछ के घर आई और बोली – रीछ भाई, रीछ भाई, क्या तुम मुझे अपने घर में थोड़ी सी जगह सोने के लिए दोगी? रीछ ने कहा – मैं तुम्हें यदि जगह देता हूँ तो तुम मेरा क्या काम करोगी? लोमड़ी बोली – मैं तुम्हारे घर की सफाई कर दूँगी। रीछ ने कहा – तो आ जाओ। वैसे भी रीछ बहुत आलसी था। वह दिन भर शहद इकट़्ठा करने में लगा रहता था। उसका घर बहुत गंदा था। इसलिए उसने सोचा कि थोड़ी –सी सफाई हो जाएगी। उसने लोमड़ी को हाँ कह दिया। लोमड़ी उसके घर में आ गई। रात को दोनों सो गए। रीछ को गहरी नींद आ गई। उसके सोने के बाद लोमड़ी धीरे से उठी और हाँडी में से शहद खाने लगी। क्या उसकी यह चोरी पकड़ी गई? रीछ को पता चला कि नहीं? रीछ ने लोमड़ी के साथ क्या किया? लोमड़ी तो बहुत चतुर थी, तो उसने क्या बहाना बनाया होगा? आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

बाल कहानी – हम साथ साथ हैं !

कहानी का अंश... एक था चिड़ा और एक थी चिड़िया। चिड़ा लाता था चावल का दाना और चिड़िया लाती थी दाल का दाना। फिर दोनों मिलकर खिचड़ी पकाते और मजे ले-लेकर खाते। दोनों जंगल में आनंद से रहते थे। मगर जंगल में और भी जानवर थे। उन्हें चिड़े और चिड़िया का यह प्रेम भरा जीवन बिलकुल पसंद नहीं था। एक थी घूस। उनके पेड़ के नीचे बिल में रहती थी। एक दिन उसने चिड़े और चिड़िया को देख लिया कि वे दोनों खिचड़ी पकाकर मजे से खा रहे हैं। चिड़ा खिचड़ी खाकर सैर को चला गया, तब घूस निकलकर बाहर आई और वह चिड़िया से बोली – तूने इस चिड़े को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है। मुआ एक चावल का दाना ही तो लाता है वह भी बिलकुल सफेद। और तू कितनी मेहनत से दाल का दाना लाती है। फिर पकाने में भी मेहनत तू ही सबसे ज्यादा करती है। फिर भी वह मुआ आधी से ज्यादा खिचड़ी खा जाता है। चिड़िया उस समय तो चुप रही। मगर यह बात उसके दिल में रह गई। फिर जब चिड़िया बाहर गई और चिड़ा घोंसले में ही रह गया तो घूस उससे बोली, चिड़े, तू भी निरा मूरख है। इतनी जरा-सी चिड़िया से दबता है। कितनी मेहनत करता है तू। चावल के दानों को अपने पंजे में लाता है। चावल जो एकदम सफेद होता है। और वह कलमुँही चिड़िया तो दाल का एक छोटा-सा दाना लाती है। अपने दाल के दानों की तरह काली भी है। जबकि तू तो एकदम गोरा है। भला काले और गोरे का भी क्या मुकाबला? थोड़ा रूककर बोली, और... सच तो यह है कि काले-गोरे की जोड़ी हमें फूटी आँखों नहीं सुहाती। यह भी कोई जोड़ी हुई? अगर दुनिया में ऐसा ही होने लगे तो सारी दुनिया का खाना खराब हो जाएगा। चिड़ा भी यह सुनकर उस वक्त तो चुप रहा लेकिन उसके दिल में भी घूस की बात पूरी तरह से बैठ गई। आगे क्या हुआ? क्या चिड़े और चिड़िया का प्रेम आपस में नफरत में बदल गया? या फिर और गाढ़ा हो गया? उन दोनों की मेहनत में प्यार का कितना भाग रहा? आगे चलकर वे दोनों किस तरह से एक-दूसरे के साथ रहे? घूस उन दोनों के बीच नफरत के बीज क्यों बो रही थी? उसके पीछे उसका क्या लाभ था? इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

बाल कविता – चीं चीं चिड़िया

कविता का अंश... धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे, पत्ते में घोंसले थे। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे, पत्ते में घोंसले थे, घोंसले में अंडे थे। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे, पत्ते में घोंसले थे, घोंसले में अंडे थे, चींचीं चिड़िया उसको सेती थी। सेती थी और खुश वो होती थी। एक दिन सुबह-सुबह, चली हवा सर-सर,सर, चींचीं काँपी थर-थर,थर। इस कविता का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

बाल कहानी – बुद्धि कहाँ रहती है? – गुरुनारायण पांडे

कहानी का अंश... राजा भोज दरबार में विराजमान थे। द्वारपाल ने अभिवादन किया और बोला – महाराज, एक बालक आपसे मिलने का हठ कर रहा है। राजा ने बालक को राजसभा में लाने की आज्ञा दी। दस-बारह वर्ष का एक सुंदर बालक हँसते हुए राजसभा में प्रवेश करता है। महाराज ने मुस्कराते हुए पूछा – क्या चाहते हो कुमार? बालक ने गंभीर होकर कहा – मेरे कुछ प्रश्न हैं महाराज। कोई उनका उत्तर ठीक से नहीं देता है। लोग बालक समझकर मुझे डाँट देते हैं। मैंने सोचा, महाराज भोज का दरबार विद्वानों का दरबार है। वहाँ मेरे प्रश्नों का उत्तर अवश्य मिलेगा। इसी आशा में मैं यहाँ आया हूँ। राजा ने बालक को प्रोत्साहित करते हुए कहा – हाँ, हाँ, पूछो, तुम्हारे प्रश्नों का सही-सही उत्तर दिया जाएगा। बालक ने पूछा – बुद्धि कहाँ रहती है महाराज? वह दिल में, दिमाग या सारे शरीर में रहती है? या फिर कहीं और रहती है? प्रश्न कुछ अजीब-सा था। राजा ने महामंत्री की ओर देखते हुए कहा – आप इस प्रश्न का उत्तर दीजिए महामंत्री जी। महामंत्री जी घबरा गए। राजदरबार का मामला ठहरा। उन्होंने प्रश्न के उत्तर के लिए एक दिन का समय माँगा। बालक को अतिथि गृह में ठहराया गया। महामंत्री जी विचार में पड़ गए – पता नहीं, बालक क्या उत्तर चाहता है? क्यों न उसी से पूछ लिया जाए? रात में चुपके से वह बालक के पास पहुँचे। इधर-उधर की बातें करने के बाद उन्होंने बालक से प्रश्न का उत्तर पूछा। क्या बालक ने महामंत्री को प्रश्न का उत्तर बताया? क्या भरी सभा में महामंत्री उस बालक के प्रश्न का उत्तर दे पाए? क्या वह अपने उत्तर से बालक को खुश कर पाए? बालक ने ऐसा प्रश्न ही क्यों किया? वह बालक कौन था? इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

बाल कहानी – सिंह और सियार – राधाकृष्ण

कहानी का अंश... गिर के जंगल में एक सियार रहता था। एक दिन वह टहलने के लिए निकला तो क्या देखता है कि एक सिंह उसके सामने खड़ा है। बाप रे ! एक झपट्‌टा मारे तो हड्डियाँ कड़कड़ा जाएँ। मेरे खून की नदी बह जाए और सारा माँस इसका भोजन बन जाए ! यहाँ से किसी तरह रफूचक्कर हो जाना चाहिए। सियार दुम दबाकर भागने लगा। मगर भागे भी तो कैसे? सिंह ने उसे देख जो लिया था। सिंह ने उसे पुकारा – ओ सियार.... और सियार भागने का रास्ता भूल गया। वह खड़ा-खड़ा थरथराने लगा। सिंह उसके पास आया और बोला – मैं तुमसे मित्रता करना चाहता हूँ। बोलो, क्या तुम्हें मँजूर है? सियार ने सिर झुकाकर कहा – नहीं, महाराज। मैं गरीब और कमजोर हूँ। मुझे आप माफ कर दीजिए। सिंह ने अचरज से पूछा – तुम मुझसे मित्रता क्यों नहीं करना चाहते? मेरी माँ ने मना किया है। क्या? तुम्हारी माँ ने क्यों मना किया है? सियार ने जवाब दिया – महोदय, मेरी माँ ने कहा है कि देखो बेटे, मित्रता, शत्रुता और संबंध बराबर वालों से करना चाहिए। आप से मेरी बराबरी नहीं। आपके साथ मेरी मित्रता शोभा नहीं देगी। सहसा सिंह गरज उठा – तुम्हारे साथ मेरी मित्रता क्यों शोभा नहीं देगी? सिंह का गर्जन जंगल में चारों तरफ गूँज उठा। तमाम पशु-पक्षी सहमकर दुबक गए। सियार की हड्डी-पसली काँपने लगी। उसकी समझ में नहीं आया कि वह सिंह से मित्रता करे या वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो जाए? सिंह ने कहा, आओ हम लोग अपना पंजा मिला लें और मित्र बन जाएँ। क्या सिंह के कहने पर सियार ने उसके साथ पंजा मिलाया? उससे मित्रता की? सारा जंगल सिंह से क्यो डरता था? सारे जानवर दुबक क्यों गए थे? सिंह उस डरपोक सियार से मित्रता क्यों करना चाहता था? इन सभी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

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