अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

12:45 pm
माँ… कविता का अंश… सबसे बचा कर, छुपाकर, रखती है संदूक में, पुरानी, बीती हुई, सुलगती, महकती कही-अनकही बातें मन की। मसालों से सने हाथों में। अक्सर छुपाकर ले जाती हैं, अपने गीले आंसू और ख्वाबों की गठरियाँ। देखते हुए आईना, अक्सर भूल जाती हैं, अपना चेहरा। और खालीपन ओढ़े समेटती हैं घर भर की नाराजगी। चूल्हे का धुआं, उनकी बांह पकड़, पूछता है, उनके पंखों की कहानी। बनाकर कोई बहाना, टाल जाती हैं। धूप की देह पर, अपनी अँगुलियों से , लिखती है कुछ ... रोक कर देर तक सांझ को, टटोलती है, अपनी परछाइयाँ। रात की मेड़ पर, देखती है उगते हुए सपने, और…. इस अधूरी कविता के साथ-साथ अन्य कविताओं का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.