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हवाई भवन… कहानी का अंश… एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल को एक अजीब किस्म का भवन तैयार करने की आज्ञा दी। बादशाह का हुक्म था कि भवन की नींव पृथ्वी में कहीं नहीं होनी चाहिए। यहाँ तो केवल हुक्म का इंतजार था। हुक्म पाते ही बीरबल ने भवन निर्माण के खर्च का विवरण बताया। बादशाह की आज्ञा से सरकारी खजाने से खर्च के लिए रुपया दे दिया गया। रुपया मिलते ही बीरबल ने बादशाह से कहा कि हवाई भवन को तैयार करने के लिए कारीगरों की तलाश करने में दो-तीन मास का समय चाहिए। कारीगरों के मिल जाने पर तो भवन आनन-फानन में बनकर तैयार हो जाएगा। बादशाह ने उन्हें तीन मास की छुट्‌टी दे दी। बीरबल रुपए और छुट्‌टी लेकर घर आ गए और उन्होंने चिड़ीमारों को तोते पकड़ कर लाने का हुक्म दिया। चिड़ीमारों ने सैंकड़ों तोते बीरबल को लाकर दिए। उनमें से बीरबल ने अपनी पसंद के चालीस पचास तोते रख लिए तथा बाकी वापस कर दिए। साथ ही चिड़ीमारों को पारिश्रमिक देकर विदा किया। अब उन तोतों को कुछ सीखाने का काम उन्होंने अपनी बेटी सुशीला को सौंप दिया। इस तरह दो मास बीत गए। बीरबल के बिना बादशाह बहुत बड़ी कमी महसूस करते थे। वैसे बीरबल उनके यहाँ गुप्त वेश में रहते थे। अत: बादशाह को उनके बारे मे कुछ भी जानकारी नहीं मिल पाती थी। जब तोते बहुत कुछ सीख गए तो एक दिन बीरबल ने उन्हें पिंजरे में बंद कर दिया और फिर… आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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