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प्रकृति.... कविता का अंश... प्रकृति सावन की फुहारों में, माँ के आँचल-सी नहा रही है। ऊँची अट्‌टालिकाएँ तर-ब-तर हो रही हैं। घने बीहड़ जंगल, नदी-सागर-झीलें, वृद्ध सल्तनत के स्मृति चिह्न, मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च, मस्जिद सब उबटन कर नहाए-से चमक रहे हैं। सूख गए कुँए, तालाब-बावड़ी, शेष को बहा रहे हैं। प्रकृति, कर्मठ हो रही है। गर्भवती-सी मदमस्त हो रही है। माँ के सूखे दूध-सी, अब रिचार्ज हो रही है। संतति को सींच रही है, बादलों से बरसता अमृत, देव मदिरालय-सा महक रहा है। भूमि रंग बदल रही है, लहराती फसलें, नन्हें बच्चों-सी, किलकारी मार रही है। वसुन्धरा, वत्सला-सी चहक रही है... ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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