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कविता का अंश... तिरस्कृत स्त्री की आँखों में, नहीं होते आँसू। भस्म हो चुके होते हैं उसके सारे स्वप्न, हृदय में खौलता है गरम लावा, और वह फट जाना चाहती है, किसी ज्वालमुखी की तरह ! किसी अदृश्य चौराहे पर खड़ी है अम्बा, जहाँ से कोई रास्ता नहीं जाता, भविष्य और जीवन की ओर; पर वह नहीं कर सकती मृत्यु का वरण, क्योंकि वह समय के हाथों छली गई है, हारी नहीं है ! वह जानती है, शाल्व की तरह ही अब उसे स्वीकार नहीं करेंगे, उसके बन्धु-बान्धव, और राजा विचित्रवीर्य भी, सत्य है, ओस की एक बून्द, फूल से टपकते ही, बन जाती है कीचड़ का हिस्सा ! ढलती साँझ में, अम्बा शरण लेती है, तपस्वियों के आश्रम में, जिनका सुझाव है -- स्त्री के दो ही आश्रय होते हैं, पिता या पति ! अम्बा नहीं लौटना चाहती काशी, और अब उसे प्रतीत होता है, पति तो उसके भाग्य में, है ही नहीं, पर वह क्षमा नहीं कर सकती, अपने अपहर्ता भीष्म को ! आश्रम में अम्बा मिलती है, अपने नाना ऋषि होत्रवाहन से, जो उसे मिलवाते हैं, जमद्ग्निनंदन परशुराम से, सम्भव है भीष्म के गुरु परशुराम, कर सकें भीष्म को विवश, किसी सम्मानजनक व्यवस्था के लिए ! अम्बा की व्यथा से, द्रवित होते हैं परशुराम। करते हैं घोषणा –- मैं भीष्म को आज्ञा दूँगा, कि वह तुम्हें स्वीकारे कुरुवंश में। अन्यथा उसे भस्म कर दूँगा मन्त्रियों सहित ! परशुराम, अम्बा और अनेक ब्रह्मज्ञानी ऋषि, भीष्म से मिलने सरस्वती के किनारे, पहुँचे हैं कुरुक्षेत्र ! भीष्म आदर के साथ करते हैं, गुरुदेव का स्वागत और चरण-वन्दना। आशीष देते हैं परशुराम और बताते हैं अपने आगमन का निमित्त ! भीष्म, ब्रह्मचारी होकर भी तुमने स्पर्श किया है, काशी नरेश की पुत्री अम्बा को; अतः नष्ट हो गया इसका स्त्री-धर्म। इसी आधार पर शाल्व ने किया है इसका तिरस्कार, अब अग्नि की साक्षी में, तुम करो इसे ग्रहण या करे तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य ! गुरुदेव, मैं तो आजन्म ब्रह्मचारी ही रहूँगा। आप जानते हैं मैंने लिया है यह व्रत। और अब विवाह तो विचित्रवीर्य से भी, सम्भव नहीं अम्बा का, क्योंकि इसका रहा है राजा शाल्व से प्रेम... इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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