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11:41 am
कविता का अंश... धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे, पत्ते में घोंसले थे। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे, पत्ते में घोंसले थे, घोंसले में अंडे थे। धरती पर पहाड़ था, पहाड़ पर पेड़ था, पेड़ पर तना था, तने में डाली थी, डाली में पत्ते थे, पत्ते में घोंसले थे, घोंसले में अंडे थे, चींचीं चिड़िया उसको सेती थी। सेती थी और खुश वो होती थी। एक दिन सुबह-सुबह, चली हवा सर-सर,सर, चींचीं काँपी थर-थर,थर। इस कविता का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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