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12:30 pm
कविता का अंश… क्या तुम्हे याद हैं, बीकानेर की काली पीली आन्धियाँ, उजले सुनहले दिन पर , छाने लगती थी पीली गर्द, देखते ही देखते स्याह हो जाता था आसमान। लोग घबराकर बन्द कर लेते थे, दरवाज़े - खिड़कियाँ। भाग भाग कर सम्हालते थे, अहाते मे छूटा सामान। इतनी दौड भाग के बाद भी, कुछ तो छूट ही जाता था जिसे, अन्धड़ के बीत जाने के बाद, अक्सर खोजते रहते थे हम, कई दिनों तक । कई बार इस तरह खोया सामान, मिलता था पडौसी के अहाते में। कभी सडक के उस पार फँसा मिलता था, किसी झाडी में। और कुछ बहुत प्यारी चीजें, खो जाती थीं, हमेशा के लिए। मुझे उन आन्धियों से डर नहीं लगता था। उन झुल्सा देने वाले दिनों में, आँधी के साथ आने वाले, हवा के ठंडे झोंके बहुत सुहाते थे मुझे। मैं अक्सर चुपके से खुला छोड देती थी, खिड़की के पल्ले को। और उससे मुंह लगा कर, बैठी रहती थी आँधी के बीत जाने तक । अक्सर घर के उस हिस्से में, सबसे मोटी जमी होती थी धूल की परत। मैं बुहारती उसे, अक्सर सहती थी माँ की नाराज़गी। लेकिन मुझे ऐसा ही करना अच्छा लगता था… इस अधूरी कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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