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कहानी का अंश… मीना नाम की एक लडक़ी थी। वह पढ़ाई-लिखाई और घर के कामों में भी काफी होशियार थी। अपनी माँ को तो काम में मदद करती ही थी, साथ ही गाँव में भी सभी की मदद करती थी। शाला में भी वह सभी की सहायता करती थी। अपना गृहकार्य तो वह स्वयं करती ही थी, साथ ही यदि कोई पीछे छूट जाता तो उसका भी गृहकार्य वह कर देती थी। पड़ोस में रहने वाली राधा चाची यदि मीना को शक्कर लाने के लिए कहतीं, तो मीना झट तैयार हो जाती। पाठ मन ही मन याद करती जाती, कविता गुनगुनाती और चाची के लिए शक्कर भी ले आती। सारा गाँव उसे मेहनती मीना के नाम से पहचानता था। मीना शाला भी जाती, तो राह चलते लोगों से काम पूछती जाती। किसी का थैला पहुँचाना हो, किसी का कोई संदेश कहना हो, तो ये सारे काम मीना करती थी। मेहनती मीना सभी की प्यारी थी। मीना किसी को काम के लिए मना नहीं करती थी और गाँव में भी कोई उसे बिना काम बताए नहीं रहता था। एक दिन दवाखाने से किसी के लिए दवाई पहुँचाने के कारण मीना को शाला में प्रार्थना में देर हो गई। उस दिन प्रार्थना भी मीना को ही गानी थी। हेड मास्टरजी ने मीना को डाँटा। मीना भी उदास हो गई। प्रार्थना पूरी होने के बाद मास्टरजी ने कहा - अगले महीने हम अपनी शाला में एक अच्छा कार्यक्रम करने वाले हैं। सभी को अपने हाथों से बने हुए मिट्टी के खिलौने और चित्र आदि लाने हैं। कोई दूसरी अच्छी चीज भी बना कर लाई जा सकती है। प्रतियोगिता होगी। जिसमें जिसकी चीज सबसे अच्छी होगी उसे इनाम दिया जाएगा। शाला की छुट्टी होते ही सभी सोचने लगे कि क्या बनाया जाए- चित्र या खिलौना? खिलौना बनाएँ, तो किस चीज से? मीना ने भी सोचा। फिर उसे लगा कि मास्टरजी अपनी कहानी में जिस परी की बात करते हैं, क्यों न वैसी ही परी बनाई जाए! पंखों वाली, चमकीले कपड़े पहने हुए और अपने हाथ में सुनहरी छड़ी पकड़े हुए एक सुंदर परी! दूसरे दिन मीना गाँव के कुम्हार के पास गई। भोला काका, मेरे लायक कुछ काम है क्या? लाओ, मैं आपके लिए मिट्टी अच्छी तरह से मिला देती हूँ। माटी मिलाते हुए मीना ने कहा- भोला काका, क्या आप मुझे मिट्टी की गुडिय़ा बनाना सिखाएँगे? भोला काका ने कहा- इसमें मुश्किल क्या है? चलो, हम दोनों मिलकर बनाते हैं। भोला काका की मदद से मीना ने एक मिट्टी की गुडिय़ा तैयार की। भोला काका ने कहा - ये सूख जाए, फिर इसे ले जाना। दो दिन के बाद मीना उस गुडिय़ा को ले आई। उस पर चूने से सफेद रंग किया। बाल काले किए। होठों को लाल किया और आँखों में भी काला रंग किया। अब उसे पहनाने के लिए कपड़े चाहिए। मीना अब पहुँची दर्जी काका के पास। रघु काका, मेरे लायक कोई काम है क्या? रघु काका ने कहा - आज मैं बिलकुल फुरसत में हूँ। तुम्हारा कुछ काम हो तो बताओ। मीना ने थैले में से गुडिय़ा निकाली और कहा- मुझे इसके लिए सुंदर लहँगा-चुन्नी चाहिए। दर्जी काका ने अपने पास रखा कतरन का थैला खोला और उसमें से सफेद चमकीले कपड़े निकाले। गुडिय़ा का माप ले कर उसके लिए तुरंत कपड़े को आकार में काटा। मीना ने कहा- अब इसे सिलने का काम तो मैं ही करूँगी। मुझे सिलाई का काम आता है। छुट्टी के दिन सारा दिन उसने घर पर बैठ कर सिलाई की। उसके बाद उसने सफेद कार्डशीट से दो सुंदर पंख बनाए। उन्हें कांच की मदद से सजाया। आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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