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3:18 pm
कहानी का अंश… दीपू एक नटखट बालक था। स्कूल में उसकी शरारतों से जहाँ शिक्षक परेशान रहते थे, तो घर में उसके आलसीपन और लापरवाही से मम्मी-पापा को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। उसे सबसे ज्यादा मजा आता था, फूल-पत्तों को तोड़ने में और पौधों को उखाड़ फेंकने में। स्कूल में जब किसी दिन बच्चों को मैदान की या बगीचे की सफाई का काम सौंपा जाता, तो उस दिन तो दीपू के मजे हो जाते। वह पत्तों के साथ फूलों को भी तोड़ देता और कई छोटे-छोटे पौधों को तो जड़ सहित उखाड़ कर फिर से गमले में लगा देता। उसे फूलों की पंखुड़ियों को मसलना, पेड़ की शाखाओं को तोड़ना, चिड़िया के घोंसले को नष्ट करना ये सभी काम करने बहुत अच्छे लगते। उसके दोस्त भी उसकी शरारतों में उसके साथ शामिल होते। वे सभी मिल कर कोई न कोई ऐसी शरारत करते कि जिससे बेचारे मूक पेड़-पौधे और पक्षियों को परेशानी होती। दिसम्बर की छुट्टियों में जब उन्हें स्कूल की तरफ से पिकनिक ले जाया गया, तो वहाँ दीपू और उसके सभी दोस्तों ने मिलकर बगीचे के बहुत सारे फूल तोड़ लिए और उन्हें बिखेर दिया। इतने से ही उन्हें संतोष न हुआ तो पेड़़ पर चढ़कर चिड़िया का घोंसला भी नीचे गिरा दिया। बेचारी चिड़िया के चार अंडे फूट गए और वह चीं-ची करती चिल्लाती ही रह गई। शीना, मीना और उसकी सहेलियों ने उनकी शिकायत गेम्स टीचर से कर दी, फिर क्या था गेम्स टीचर ने उन्हें ऐसा डाँटा कि उनका पिकनिक का मजा ही जाता रहा। एक दिन पापा ने उसे गमलों में पानी डालने के लिए कहा। उसे तो यह काम भाता ही नहीं था, सो उसने हाँ कह कर आदेश टाल दिया। बाद में जब पिता ने देखा कि सारे गमले सूखे ही सूखे हैं, तो उन्होंने दीपू से उसका कारण पूछा। दीपू ने फिर बहाना बनाया और कहने लगा कि मैं भूल गया था। ऐसा कहकर वह दूसरे काम में लग गया। उस दिन तो गमलों में पापा ने पानी डाल दिया। कुछ दिन बाद पापा ने सख्ती के साथ दीपू से कहा कि आज तुम्हें गमलों में पानी डालना ही है। ऐसा कह कर वे किसी काम से बाहर चले गए। दीपू गमलों में पानी डालने लगा। पानी डालते हुए अचानक उसे शरारत सूझी- कुछ गमलों को तो उसने पानी से लबालब भर दिया और कुछ छोटे-छोटे पौधों को उखाड़ दिया। ऐसा करते हुए उसे बहुत अच्छा लगा। अपनी शरारत पर वह बहुत खुश था। फिर पापा की डाँट के डर से उसने उखाड़े हुए पौधों को फिर से गमले में ऐसे ही रख दिया। षाम को पापा ने पौधों की जो हालत देखी तो उन्हें दीपू की कारस्तानी का पता चला। उन्हें गुस्सा तो बहुत आया पर उन्होंने धैर्य से काम लिया। वे दीपू का स्वभाव जानते थे कि ये शरारती है, किंतु पेड़-पौधो के प्रति उसके मन में जरा भी दया भाव नहीं है, यह बात उन्हें दुःखी कर गई। उन्होंने दीपू के मन में पेड़-पौधों के प्रति प्यार जगाने का संकल्प लिया। आखिर दीपू के पापा ने दीपू के मन में पेड़-पौधों के प्रति प्रेम और दया भाव जगाने के लिए क्या किया? क्या वे दीपू का स्वभाव बदल पाए? इन सवालों के जवाब जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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