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कहानी का अंश… दीपिका का निर्णय सुन, पूरा परिवार हतप्रभ रह गया। बडौदा से आए मेहमानों को चाय-नाश्ता सर्व करने के लिए जैसे ही मम्मी ने कहा, उसकी त्योरियाँ चढ़ गई। बोली – बहुत कर चुकी अपना प्रदर्शन, अब मुझसे यह नहीं होगा। आप और पापा कब तक गिड़गिड़ाते रहेंगे, हाथ जोड़ते रहेंगे लोगों के सामने? कब तक में सज-धजकर उनके सामने बिकाऊ माल की तरह पेश होऊ? और वे मुझे रिजेक्ट करके चलते बनें और आस-पास के पड़ोसवाले, रिश्तेदार फिर चर्चा करे कि देखा, सोलंकी जी की लड़की को? फिर लड़के वाले नापसंद कर गए। लेकिन बेटी, यह वैसे लोग नहीं हैं। मेरा मन कहता है कि इस बार तेरी किस्मत जाग जाएगी। इन लोगों की कोई माँग भी नहीं है। बस, लड़के को लड़की पसंद आ जाए। वे लोग कुछ और नहीं चाहते हैं। मम्मी ने समझाया। दीपिका दृढ़ निश्चय कर चुकी थी। वह मम्मी से बोली – मेरी किस्मत अब मैं खुद जगाऊँगी। मैंने तय कर लिया है कि अब मैं आजीवन शादी नहीं करूँगी। इतना कहकर दीपिका ने दरवाजा बंद कर लिया। मम्मी ने दरवाजे को थपथपाते हुए उसे फिर से समझाया – नहीं, बेटी। ऐसा नहीं करते। सयानी बेटी को कोई कब तक घर बैठाता है? मेरा कहना मान ले बेटी, तू तो अधिक पढ़ी-लिखी है, समझदार है। नीचे पापा मेहमानों के साथ तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। उसने भीतर से ही जवाब दिया कि मम्मी उनसे कह दो, कि मैं विवाह नहीं करूँगी। वे लोग जा सकते हैं। पैंतीस साल हो गए हैं, इस बात को मगर ऐसा लगता है कि जैसे यह कल की ही घटना हो। इन वर्षों में कितना कुछ बदल गया। माँ नर्मदा का ढेर-सा पानी बह चुका है। जब भी उसे रात को नींद नहीं आती है, वह अपने जीवन के पृष्ठों को पलटने लगती है। कई कहानियाँ दबी पड़ी है इन पृष्ठों में। कितना कुछ सहा है बीत दिनों में दीपिका ने। क्या वह अपने संकल्प पर दृढ़ रह पाई? क्या उसके माता-पिता और भैया-भाभी ने उसका साथ दिया? क्या उसके माता-पिता लड़केवालों को ना कह पाए? दीपिका का क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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