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लेख का अंश… जब अम्मा चावल बीनती या गेहूँ साफ करती, तब भी गौरैया न मालूम कहाँ से बिना बुालए फुर्र से आ जाती। हमारी अम्मा भी अक्सर उन्हें दाना फेंकती रहती और गुनगुनाती रहती – राम जी की चिरैया, राम जी का खेत। खाय लो चिरैया, भर-भर पेट। हाँ जी, भर-भर पेट। कभी गुस्सा हो जाती – अब का सारा दाना तुम्हइय दै दूँ? चलो, भागो यहाँ से। जाओ अपौ काम करौ। कभी बुआ को छेड़ देती- ननद रानी, इ चिरैया तुम्हरे ससुराल से आई है। फिर चिरैया से कहती – ऐ चिरैया। जाय के ननदोई राजा से कहिओ कि ठंड परन लगी है। अब तुम्हार दुल्हनिया मायके न रहन चाहत। समझि गई? हाँ ठीक से कहियो जाय। तोहे मोती-से चाऊर चुगाऊँगी। चिरैया भी जैसे हाँ में सिर हिला देती और बुआ शरमा कर वहाँ से भाग जाती। लेकिन यह रिश्ता सिर्फ गौरैया के साथ था और किसी चिड़िया के साथ नहीं। गौरैया ही एक ऐसी चिरैया थी, जो हमें अपनी-सी लगती थी। बिलकुल घर जैसी। जिसे घर में आने-जाने की पूरी आजादी थी। उसने कभी हमारा नुकसान नहीं किया। बल्कि शैतान लड़के कभी-कभी उसका घोंसला उजाड़ देते। तब दादी बहुत पश्चाताप करती। मेरी बेटी पूछ बैठी – पापा, अब क्यों नहीं आती गौरैया हमारे घर में? गाँव में तो आती है। मैं क्या जवाब देता? मैंने भी कह दिया – शहर में उसका दम घुटता है ना, इसीलिए। एक बात तो सच है, गौरैया बहुत नाजुक चिरैया होती है। अब हमारे घर में हरे-भरे पेड़-पौधे नहीं रहे। बिजली-टेलीफोन के तारों के फैले जाल में फँसकर घायल होने से उसे डर लगता है। हमारे मोबोइल और फोन के ऊँचे-ऊँचे टावर से कुछ ऐसी तरंगे निकलती है, जो हमारे लिए नुकसान दायक है तो फिर तो गौरैया के लिए भी अधिक नुकसान दायक होगी ही। वह उसकी बच्चे पैदा करने की क्षमता घटाती है। उन्हें बीमार करती है। पहले वह कहीं भी ऊँची जगह देखकर घोंसला बना देती थी। अब शायद डरती है कि कोई उजाड़ न दे। इस अधूरे लेख का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए… संपर्क - Email:- amethiarun@gmail.com

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