अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

12:36 pm
कविता का अंश… शहर शमशान के किसी अँधेरे कोने में मरा पड़ा है। घंटाघर में वक्त की कैंची, कबूतरों के पर कतर रही है। मौसम के साथ वक्त के हाशिए पर, आदमी और उसकी आत्मा की, मौत दर्ज कर दी गई है। वक्त की इस नई सतह पर, हिजड़ों की एक पूरी पीढ़ी, अतीत और भविष्य पर, बहस में जुटी है। मृत आदमी और जीवित नाग के बीच, संबंध को तलाशती। बुद्धिमानों का अंधापन और अंधों का विवेक, मापने के लिए, हिटलरी कुर्सी अपने पंजों के नीचे से, कुछ शब्द निकालकर रख देती है। अचानक… सड़कें, इश्तिहारों के रोजनामचों में तब्दील हो जाती है… इस अधूरी कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.