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7:05 pm
कविता का अंश…. ‘नोबल’ शब्द पड़े कानों में, पुरस्कार की याद दिलाए, चलो आज करते हैं चर्चा, कैसे ये अस्तित्व में आए। नाइट्रोजन ग्लिसरीन बेहद, खतरनाक विस्फोटक था, जिसके जलजले के आगे, कोई न संकट मोचक था। मि. अल्फ्रेड नोबल जी ने, ढक्कन ऐसा बना लिया, जिसने नाइट्रोजन ग्लिसरीन पर, अंकुश अपना लगा दिया। आज भी विस्फोटक के ऊपर, ढक्कन ही तो लगते हैं, जिनके खुलने के बाद ही, विस्फोटक सब फटते हैं। नाइट्रोजन ग्लिसरीन बला थी, आसानी से न मानी यदा-कदा फिर फटकर इसने, रखी जारी मनमानी। ड्राई सिलिका में नोबल ने, विस्फोटक को डुबो दिया, जो चाहे कर सकता मानव, बुरी बला को बता दिया। सन् 1866 में फिर, डायनामाइट का जन्म हुआ, उसके बाद जेलजीनाइट का, दुनिया में आगमन हुआ। इस अधूरी कविता का पूरा आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

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