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कविता का अंश… और निकट कुछ आना… महक रही हो जब निशिगंधा, संग चाँदनी झूमे चंदा, और निकट कुछ आना… तुम फिर और निकट कुछ आना। डगमग करती नाव साँस की, सपनों के तट पर बाँधूँगा, बिठा अंक में तुमको अपनी, जीवन के रिश्ते साधूँगा, निष्ठुर जग हो सोया-सोया, आलम सारा खोया-खोया, हौले से मुस्काना तुम फिर हौले से मुस्काना, और निकट कुछ आना। मैं देखूँगा फिर यह विरहा, कैस तन को करे खोखला, रच ही डालें प्रीतों वाला, छोटा-सा हम एक घोंसला, पवन झकोरे धूम मचाएँ, हँस-हँस मेघ मल्हार सुनाएँ, मुख मेरा सहलाना, तुम फिर मुख मेरा सहलाना, और निकट कुछ आना… इस अधूरी कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

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