अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

5:23 pm
कविता का अंश... गाँवों की पगडण्डी जैसे, टेढ़े अक्षर डोल रहे हैं । अम्मा की ही है यह चिट्ठी, एक-एक कर बोल रहे हैं । अड़तालीस घंटे से छोटी, अब तो कोई रात नहीं है। पर आगे लिखती है अम्मा, घबराने की बात नहीं है । दीया बत्ती माचिस सब है, बस थोड़ा सा तेल नहीं है। मुखिया जी कहते इस जुग में, दिया जलाना खेल नहीं है। गाँव देश का हाल लिखूँ क्या, ऐसा तो कुछ खास नहीं है। चारों ओर खिली है सरसों, पर जाने क्यों वास नहीं है। केवल धड़कन ही गायब है , बाकी सारा गाँव वही है। नोन तेल सब कुछ महंगा है, इन्सानों का भाव वही है । रिश्तों की गर्माहट गायब, जलता हुआ अलाव वही है। शीतलता ही नहीं मिलेगी, आम नीम की छाँव वही है। टूट गया पुल गंगा जी का, लेकिन अभी बहाव वही है। मल्लाहा तो बदल गया पर, छेदों वाली नाव वही है। बेटा सुना शहर में तेरे, मार-काट का दौर चल रहा। कैसे लिखूँ यहाँ आ जाओ, उसी आग में गाँव जल रहा। कर्फ्यू यहाँ नहीं लगता, पर कर्फ्यू जैसा लग जाता है। रामू का वह जिगरी जुम्मन, मिलने से अब कतराता है। इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.