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1:08 pm
कविता का अंश... एक मटर का दाना था जी एक मटर का दाना, गोल-गोल था, सुंदर-सुंदर था वह बड़ा सयाना! घर से निकला, चौराहे पर मिली उसे एक कार, उछला-कूदा, कूदा-उछला झटपट हुआ सवार बैठ कार में, खूब अकड़कर दौड़ा - दौड़ा - दौड़ा, गलियाँ, सड़कें, चौरस्ते सबको ही पीछे छोड़ा। आगे-आगे, दौड़ा आगे एक मटर का दाना! एक मटर का दाना, था जो- सचमुच बड़ा सयाना! दिल्ली देखी, जयपुर देखा कलकत्ते हो आया, सभी अजूबे देख-देखकर झटपट घर पर आया। आ करके, नन्हे चुनमुन को किस्सा वही सुनाया, खूब हँसा वह, औरों को भी खिल-खिल खूब हँसाया। देखो, एक घुमक्कड़ समझो मुझको जाना-माना, इब्न बतूता संग घूमा हूँ किस्सा बड़ा पुराना! अजी मटर का दाना था वह एक मटर का दाना! एक मटर का दाना था वह सचमुच बड़ा सयाना। ऐसी ही अन्य बाल कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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