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कविता का अंश... दही-बड़े हम दही बड़े! दौड़े आओ, मत शरमाओ खाओ भाई खड़े-खड़े! स्वाद मिलेगा कहीं न ऐसा, चखकर देखो फेंको पैसा। टाफी-च्यूंगम, आइसक्रीम के पल में लो झंडे उखड़े। अजब-अनोखा रंग जमाया, डंका हमने खूब बजाया। आ ठेले पर, खड़े हुए हैं, लाला, बाबू बड़े-बड़े। अपनी मस्ती, अपनी हस्ती, खा करके आती है चुस्ती। तबियत कर दें खूब झकाझक- अगर कोई इमसे अकड़े। पेड़ा, बरफी चित्त पड़े हैं, रसगुल्ले उखड़े-उखड़े हैं। भला किसी की यह मजाल जो आकर के हमसे झगड़े। ऐसी ही अन्य बाल कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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