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बाल कविताएँ – हरीश परमार मेरी प्यारी गुडिया… कविता का अंश…. ठुमक-ठुमक कर आँगन में, चल रही है मेरी बिटिया। रूनझुन-रूनझुन बाजत है, उसके पैरों की पायलिया। एक कदम फिर दो कदम, धीरे-धीरे आगे बढ़ती,। अब गिरी कि तब गिरी, लेकिन सँभल-सँभल जाती। हाथ उठाकर दूर भगाए, जब आँगन में उतरे चिडिया। कभी मम्मी, कभी पापा के, पीछे-पीछे चलती है। थक जाती पर नहीं बैठती, हर दम चलना चाहती है। सबके मन को भली लगे, उसकी तुतली-तुतली बतियाँ। मेरा तो है एक ही सपना, बड़ी हो जाए मेरी बिटिया। पढ़े-लिखे और नाम कमाए, देश का गौरव बन जाए, मेरी प्यारी-प्यारी बिटिया। ऐसी ही अन्य मनभावन बालकविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

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