अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

2:03 pm
कविवर रवीन्द्रनाथ टैगारे की बाँगला कविता ‘एकला चालो रे...’ का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। कविता का अंश... अनसुनी करके तेरी बात, न दे जो कोई तेरा साथ, तो तुही कसकर अपनी कमर, अकेला बढ़ चल आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे । देखकर तुझे मिलन की बेर सभी जो लें अपने मुख फेर, न दो बातें भी कोई क रे, सभय हो तेरे आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे । तो अकेला ही तू जी खोल, सुरीले मन मुरली के बोल, अकेला गा, अकेला सुन । अरे ओ पथिक अभागे रे, अकेला ही चल आगे रे । जायँ जो तुझे अकेला छोड़, न देखें मुड़कर तेरी ओर, बोझ ले अपना जब बढ़ चले, गहन पथ में तू आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे । तो तुही पथ के कण्टक क्रूर, अकेला कर भय-संशय दूर, पैर के छालों से कर चूर । अरे ओ पथिक अभागे रे, अकेला ही चल आगे रे । और सुन तेरी करुण पुकार, अंधेरी पावस-निशि में द्वार, न खोलें ही न दिखावें दीप, न कोई भी जो जागे रे- अरे ओ पथिक अभागे रे । तो तुही वज्रानल में हाल, जलाकर अपना उर-कंकाल, अकेला जलता रह चिर काल,। अरे ओ पथिक अभागे रे, अकेला बढ़ चल आगे रे । इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.