अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

कहानी का अंश... मेरा रोज उसी रूट से आना-जाना होता था। उस रास्ते में दो बड़े अस्पताल आते थे। मुझे ऑफिस जाने के लिए दो बसे पकड़नी होती थी। दूसरी बस मैं अस्पताल के स्टेन्ड से लेता था। उस दिन भी मैं ऑफिस के लिए बस से जा रहा था। समय काटने के लिए मैं पत्रिका के पन्ने पलटने लगा। तभी तीसेक साल का एक युवक ने अपनी कारुणिक आवाज में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था, बाबूजी मुझ गरीब पर दया करो। ईश्वर आपका भला करेगा। मेरी औरत महीने भर से बीमार थी। उसे इलाज के लिए दिल्ली लाया था। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। कल रात उस बेचारी ने दम तोड़ दिया। उसकी लाश अस्पताल के बाहर पड़ी है। मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। गाँव जाना तो दूर, मेरे पास उसके कफन तक के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं हैं। अब तो आप लोग ही मेरा सहारा हो। मुझ पर रहम करो, रहम करो। ऐसा कहते हुए वह जोर-जोर से रोने लगा। आगे क्या हुआ, जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

एक टिप्पणी भेजें

  1. बहुत ही उम्दा .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Thanks for sharing this!! :) :)

    उत्तर देंहटाएं

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.