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11:36 am
कविता का अंश... रात को, ख्वाबों की पोटली, सिरहाने रखकर सोई थी। सुबह आँख खुली तो देखा, पोटली खुली थी और ख्वाब गायब थे। कहाँ गए ? कौन ले गया ? आसमान, तारे, हवाएँ पर्वत, नदियाँ, परिंदे ? शक हुआ कि कहीं वक्त की साजिश तो नही? दिन भर वक्त नहीं मिला कि वक्त को तलाशती फिरूँ। गहरे अंधकार में, पलकें रिश्ता जोड़ ही रही थी, कि देखा रात की मुंडेर पर बैठी, नींद के आगोश में ख्वाब अँगडाइयाँ ले रहे हैं। ऐसी ही अन्य कविताओं का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए....

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