अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

12:25 pm
कविता का अंश... हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे । हम बहता जल पीनेवाले मर जाऍंगे भूखे-प्यासे कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से । स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले । ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने लाल किरण-सी चोंच खोल चुगते तारक-अनार के दाने । होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती सॉंसों की डोरी । नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो लेकिन पंख दिए हैं तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो । इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.