अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

3:52 pm
कविता का अंश... इसी घर से एक दिन शहीद का जनाज़ा निकला था, तिरंगे में लिपटा, हज़ारों की भीड़ में। काँधा देने की होड़ में सैकड़ो के कुर्ते फटे थे, पुट्ठे छिले थे। भारत माता की जय, इंकलाब ज़िन्दाबाद, अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद के नारों में शहीद की माँ का रोदन डूब गया था। उसके आँसुओ की लड़ी फूल, खील, बताशों की झडी में छिप गई थी, जनता चिल्लाई थी- तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा। गली किसी गर्व से दिप गई थी। इसी घर से तीस बरस बाद शहीद की माँ का जनाजा निकला है, तिरंगे में लिपटा नहीं, (क्योंकि वह ख़ास-ख़ास लोगों के लिये विहित है) केवल चार काँधों पर राम नाम सत्य है गोपाल नाम सत्य है के पुराने नारों पर; चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी, जीवन के कष्टों से मुक्त हुई, गली किसी राहत से छुई छुई। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.