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कविता का अंश... गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ, वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ, छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ, और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ, कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। दूर कर मुझमें भरी तू कालिमा जब, फैल जाए विश्‍व में भी लालिमा तब, जानता सीमा नहीं है अग्नि का कण, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। जग विभामय न तो काली रात मेरी, मैं विभामय तो नहीं जगती अँधेरी, यह रहे विश्‍वास मेरा यह रहे प्रण, गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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