अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

3:16 pm
कहानी का अंश... एक लोमडी को कई दिनों से खाने को कुछ नहीं मिला था। इसलिए वह शिकार की खोज में घूम रही थी। उसकी चलने-फिरने की शक्ति भी कम हो गई थी। एक बार वह पहाड़ की ढाल पर शिकार की खोज में थी कि एकाएक पैर के नीचे का पत्थर लुढक गया और कमजोर होने के कारण वह भी अपने आपको संभाल नहीं सकी और लुढकती चली गई। नीचे की तरफ मैदान था। जब वह वहाँ पर पहुँची तो उसने खरगोशों का झुंड देखा। खरगोशों को देखकर उसके मुंह में तो पानी आ गया। उसने सोचा कि यहाँ पर उसके लिए रोज एक-दो खरगोश खाने का इंतजाम तो हो ही जाएगा। वह रोज उस जगह पर आने लगी कि कभी मौका मिले तो वह खरगोश को खा ले। जब खरगोशों ने लोमड़ी को रोज वहाँ आते हुए देखा तो पहले तो वह डर गए कि यह उन्हें खा लेगी। फिर उन्हें लगा कि वह लोमड़ी तो अकेली है और हम सभी हैं। हम सभी मिलकर उस अकेली लोमड़ी का मुकाबला कर सकते हैं। यही सोचकर वे सभी बेफिक्र होकर आनंद से रहने लगे। एक दिन उस लोमड़ी ने खरगोश के दो बच्चों के पास आकर उनकी खूब तारीफ की और अपने घर दावत के लिए आने का न्यौता दिया। वे खरगोश डर के मारे जल्दी से वहाँ से चले गए। लेकिन उसके बाद उन खरगोशों ने अपने आपको असुरक्षित महसूस किया आैर उन्होंने अपनी एक सभा बुलाई और लोमड़ी से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचा। क्या था वह उपाय? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.