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12:21 pm
कहानी का अंश….. एक जंगल था। उस जंगल में सियार, लोमड़ी, भेडिया और सिंह चारों एक साथ रहते थे। जंगल का राजा अपने साथियों के साथ बड़े आराम से रहता था। सियार, लोमड़ी और भेडिया खुश थे, बहुत खुश। सिंह राजा था। लोमड़ी मंत्री थी। भेडिया सेनापति था और सियार था अर्दली। एक दिन की बात है । सिंह ने मुँह खोलकर जम्हाई ली। पास ही भेडिया बैठा हुआ था। उसने कहा – सरकार, आपके मुँह से बदबू आ रही है। सिंह नाराज हो गया। वह बोला – मैं जंगल का राजा हूँ। मेरे मुँह से बदबू कैसे आ सकती है? उसने इतना कहकर भेडिये पर झपट्‌टा मारा। एक ही झपट्‌टे में उसकी गरदन तोड़ दी। पंजो से उसका पेट फाड़ दिया। बेचारा भेडिया बेमौत मारा गया। यह देखकर सियार और लोमड़ी डर गए। अगले दिन सिंह ने मुँह खोलकर फिर से जम्हाई ली और सियार से पूछा – अब तू बता, क्या मेरे मुँह से बदबू आती है? सियार ने कल भेडिये की बुरी हालत देख ली थी। उसने सोचा कि राजा का मिजाज गरम हो गया है। हमें नरमी से काम लेना चाहिए। वह बोला – हुजूर, आपके मुँह से तो इलायची की खुशबू आ रही है। अहा! क्या प्यारी सुगंध है। यह कहकर वह सिंह की तारीफ के पुल बाँधने लगा और जोर-जोर से हँसने लगा। सिंह ने डाँटकर कहा – चापलूस कहीं का। तुझसे मुझे यही आशा थी। इतना बड़ा यह जंगल, इसका मैं अकेला राजा। ताजा खून मैं पीऊं, जानवरों को नोच-नोच कर मैं खाऊँ, कलेजी मैं चबाऊँ, फिर मेरे मुँह से बदबू न आएगी तो किसके मुँह से आएगी? तेरी तो मति मारी गई है। कहता है कि खुशबू आ रही है। सियार भी सिंह की नाराजगी का शिकार हो गया। अब बाकी बची लोमड़ी। अगले दिन राजा ने यही सवाल लोमड़ी से पूछा। लोमड़ी बोली – सरकार, मुझे तो जुकाम हो गया है, बदबू-खुशबू का कुछ पता ही नहीं चलता। सिंह उसकी ओर देखता रह गया। कहा भी गया है – जैसी चले बयार, पीठ तब तैसी कीजीए। इस कहानी का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए….

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