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12:03 pm
कविता का अंश... बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। पेड़ खड़े फैलाए बाँहें लौट रहे घर को चरवाहे यह गोधूली! साथ नहीं हो तुम बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। कुलबुल कुलबुल नीड़-नीड़ में चहचह चहचह मीड़-मीड़ में धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम, बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। जागी-जागी सोई-सोई पास पड़ी है खोई-खोई निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम, बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। ऊँचे स्वर से गाते निर्झर उमड़ी धारा, जैसी मुझ पर बीती झेली, साथ नहीं हो तुम बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। यह कैसी होनी-अनहोनी पुतली-पुतली आँखमिचौनी खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम, बहुत दिनों में आज मिली है साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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