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2:11 pm
कविता का अंश... फैला है अंधकार हमारी धरती पर हर जन है लाचार हमारी धरती पर हे देव! धरा है पूछ रही... कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! तुम तो कहते थे धर्म की हानि होगी जब-जब हर लोगे तुम पाप धरा के आओगे तुम तब-तब जरा सुनों कि त्राहि-त्राहि चारों ओर से होती है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! सीता झेल रही संताप रोके रुके नहीं है पाप हानि धर्म की होती है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! द्रोपदी कलयुग में लाचार तुम्हें क्यों सुनती नहीं पुकार दुर्योधन मुँह बिचकाता है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! दुर्योधन लाख सिरों वाला टलता नहीं टले टाला दुर्योधन हमें चिढ़ाता है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! यहाँ रावण राज लगा चलने मिलकर विभीषण-रावण से श्रीराम को रोज सताता है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! अब आ जाओ हरि जल्दी से प्रभु देर ना करना गलती से जग आँख लगाए बैठा है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! यहां रंग नहीं हैं होली के नित खून बहे है गोली से मन व्याकुल तुम्हें ध्याता है कब लोगे अवतार हमारी धरती पर ! इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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