अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

1:17 pm
कविता का अंश… माँ, यह मुझे बता दो, सूरज नित्य कहाँ जाता है? क्यों होते ही प्रात: पुन: नभ पथ पर आ जाता है? बेटा, दिन भर चलते-चलते जब दिनकर थक जाता है, करता तब विश्राम, सवेरे आता वह सिखलाता – करो शक्ति भर काम कि जब तक, मैं नभ में चलता हूँ। सो जाओ चुपचाप रात में जैसा मैं करता हूँ, किन्तु प्रात: होते ही जग जाओ, मत देर लगाओ। नित्य क्रिया से निपट काम में अपने तुम लग जाओ। माँ, दिनकर-सा ही जब डटकर मैं भी काम करूँगा, क्या वैसा ही ऊपर उठकर मैं भी चमक सकूँगा? बेटा, जब तुम काम करोगे, तन-मन, हृदय लगाकर, अपने में विश्वास जमाकर, भय, आलस्य भगाकर, यश पाओगे, सुख पाओगे, विजयी कहलाओगे। चमक उठोगे तब तो तुम भी निश्चय दिनकर-सा ही, तुम्हें देखकर राह पाएँगे, भ भूले-भटके राही। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए…

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.