अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

12:24 pm
कविता का अंश... टेढ़े-मेढ़े बैगन जी होली पर ससुराल चले बीच सड़क पर लुढ़क-लुढ़क कैसी ढुलमुल चाल चले पत्नी भिण्डी मैके में बनी-ठनी तैयार मिलीं हाथ पकड़ कर वह उनका ड्राइंगरूम में साथ चलीं मारे खुशी, ससुर कद्दू देख बल्लियों उछल पड़े लौकी सास रंग भीगी बैगन जी भी फिसल पड़े इतने में उनकी साली मिर्ची जी भी टपक पड़ीं रंग भरी पिचकारी ले जीजाजी पर झपट पड़ीं बैगन जी गीले-गीले हुए बैगनी से पीले। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए....

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.