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5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर स्व. अनुपम मिश्र जी की स्मृति में…. कविता - उदास नदी… नदी उदास है और खामोश भी। उसका मसीहा उससे बहुत दूर चला गया है। इतनी दूर कि लौटकर नहीं आ सकता और इसीलिए नदी उदास है। दूर कहीं आसमान से, मसीहा भी निहार रहा है उदास नदी को… पर वह विवश है, नहीं छीन सकता उसकी उदासी, नहीं तोड़ सकता उसकी खामोशी, जीवन भर स्वयं को, जल यज्ञ में होम करता रहा, कि नदी खिलखलाती रहे, इठलाती रहे, बलखाती रहे… और एकाएक शून्य में समा गया वो। अपने सारे सपने तट पर ही छोड़ गया वो। रोज एकांत में खाली आँखों से निहारता है नदी को और नदी देखती है उसे उन्हीं रिक्त लहरों से… मगर एक दिन, मसीहा को दिखे कुछ युवा नदी के मुहाने पर उसकी उम्मीद जाग उठी वे युवा किसी गंभीर विषय पर चर्चा कर रहे थे। आज के समय में प्रदूषण से बढ़कर गंभीर विषय और क्या हो सकता है? लेकिन उनकी चर्चा सुनकर उम्मीद टूटती गई क्योंकि केवल चर्चा करना समय बिताने का साधन ही तो है! क्या करेंगे ये? क्या कर पाएँगे ये? सोच ही रहा था वह मसीहा कि वहीं पर कुछ नन्हे मासूम खेलते नजर आए वो उन्हें देख ही रहा था कि एक मासूम उन युवाओं के पास आया एक युवा जब सिगरेट की राख नदी में बार-बार डाल रहा था कि मासूम ने कहा – भैया, ऐसा न करो। इससे पानी गंदा हो जाएगा। और फिर उसने अपनी नन्हीं हथेली में वह राख तैरता पानी भर लिया और उसे धरती पर उड़ेल दिया। मुस्कराता हुआ फिर दूसरे मासूमों से जा मिला। जब मसीहा ने देखा मासूम की इस हरकत को उसकी उम्मीद यकींन में बदल गई कोई तो है जो उसके अधूरे काम को पूरा करेगा उसका स्वप्न साकार करेगा सुकून की साँसे लेकर करवट बदल ली उसने और उसके चेहरे पर सुकून देखकर कई दिनों से उदास नदी हौले से मुस्करा दी। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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