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पितृ पक्ष के दौरान पितरों की सदगति के लिए कुछ खास परिस्थितियों में महिलाओं को भी विधिपूर्वक श्राद्ध करने का अधिकार प्राप्त है। गरूड़ पुराण में बताया गया है कि पति, पिता या कुल में कोई पुरुष सदस्य नहीं होने या उसके होने पर भी यदि वह श्राद्धकर्म कर पाने की स्थिति में नहीं हो तो महिला श्राद्ध कर सकती है। इस पुराण में यह भी कहा गया है कि यदि घर में कोई वृद्ध महिला है तो युवा महिला से पहले श्राद्ध कर्म करने का अधिकार उसका होगा। शाों के अनुसार पितरों के परिवार में ज्येष्ठ या कनिष्ठ पुत्न अथवा पुत्न ही न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य तिलांजलि और ¨पडदान करने के पात्न होते हैं। भारतीय संस्कृति में आश्विन कृष्ण पक्ष पितरों को समíपत है। यह कहा गया है कि श्राद्ध से प्रसन्न पितरों के आशीर्वाद से सभी प्रकार के सांसारिक भोग और सुखों की प्राप्ति होती है। आत्मा और पितरों के मुक्ति मार्ग को श्राद्ध कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि जो श्रद्धापूर्वक किया जाए, वही श्राद्ध है । पितृगण भोजन नहीं बल्कि श्रद्धा के भूखे होते हैं। वे इतने दयालु होते हैं कि यदि श्राद्ध करने के लिए पास में कुछ न भी हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आंसू बहा देने भर से ही तृप्त हो जाते हैं।
विधान है कि सोलह दिन के पिृतपक्ष में व्यक्ति को पूर्ण ब्रrाचर्य, शुद्ध आचरण और पवित्न विचार रखना चाहिए। गरूण पुराण के अनुसार पितृपक्ष के दौरान अमावस्या के दिन पितृगण वायु के रूप में %ार के दरवाजे पर दस्तक देते हैं। वे अपने स्वजनों से श्राद्ध की इच्छा रखते हैं और उससे तृप्त होना चाहते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद यदि वे निराश लौटते हैं तो श्राप देकर जाते हैं। श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किए जाने से पितर वर्ष भर तृप्त रहते हैं और उनकी प्रसन्नता से वंशजों को दीर्घायु, संतति, धन, विद्या, सुख एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो श्राद्ध नहीं कर पाते, उनके कारण पितरों को कष्ट उठाने पड़ते हैं। गीता में लिखा है कि यज्ञ करने से देवता के संतुष्ट होने पर व्यक्ति उन्नति करता है, लेकिन श्राद्ध नहीं करने से पितर कुपित हो जाते हैं और श्राप देते हैं। ब्रहम पुराण और गरूण के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितर की तिथि आने पर जब उन्हें अपना भोजन नहीं मिलता तो वे क्रुद्ध होकर श्राप देते हैं जिससे परिवार में मति, रीति, प्रीति, बुद्धि और लक्ष्मी का विनाश होता है।
मार्कण्डेय और वायुपुराण में कहा गया है कि किसी भी परिस्थिति में पूर्वजों के श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए। व्यक्ति सामथ्र्य के अनुसार ही श्राद्ध कर्म करे लेकिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितरों के श्राद्ध के लिए व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं होने की स्थिति मे श्राद्ध कर्म कैसे किया जाए, इस पर विष्णु पुराण का हवाला देते हुए वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के आचार्य डॉ. आत्माराम गौतम ने बताया कि श्राद्ध करने वाला अपने दोनों हाथों को उठाकर पितरों से प्रार्थना करे ., हे पितृगण .मेरे पास श्राद्ध के लिए न तो उपयुक्त धन है .न ही धान्य आदि। मेरे पास आपके लिए केवल श्रद्धा और भक्ति है। मैं इन्हीें से आपको तृप्त करना चाहता हूं। उन्होंने बताया कि सभी प्रकार के श्राद्ध पितृपक्ष के दौरान किए जाने चाहिए। लेकिन अमावस्या का श्राद्ध ऐसे भूले बिसरे लोगों के लिए ग्राह्य, होता है जो अपने जीवन में भूल या परिस्थितिवश अपने पितरों को श्रद्धासुमन अíपत नहीं कर पाते।
उपनिषदों में कहा गया है कि देवता और पितरों के कार्य में कभी आलस्य नहीं करना चाहिए। पितर जिस योनि में होते हैं, श्राद्ध का अन्न उसी योनि के अनुसार भोजन बनकर उन्हें प्राप्त होता है। श्राद्ध जैसे पवित्न कर्म में गौ का दूध, दही, और %ाृत सवरेत्तम माना गया है। धर्मशा में पितरों को तृप्त करने के लिए जौ, धान, गेहूं.मूंग, सवां, सरसों का तेल, कंगनी, कचनार आदि का उपयोग बताया गया है। इसमें आम, बहेड़ा, बेल, अनार, पुराना आंवला, खीर, नारियल, फालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, नीलकैथ, परवल, चिरौंजी.बेर, जंगली बेर, इंद्र जौ के सेवन आदि का भी विधान है।तिल को देव अन्न कहा गया है। काला तिल ही वह पदार्थ है, जिससे पितर तृप्त होते हैं, इसलिए काले तिलों से ही श्राद्ध कर्म करना चाहिए। डॉ. गौतम ने बताया कि भारतीय वैदिक वांगमय के अनुसार जीवन लेने के पश्चात प्रत्येक मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं। पहला देव रिण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ रिण। पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म करके परिजन अपने तीनों रिणों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार मृत्यु के उपरांत कर्ण को चित्नगुप्त ने मोक्ष देने से केवल इसलिए इन्कार कर दिया था कि उनके ऊपर पितृ ऋण बाकी था। कर्ण ने चित्नगुप्त से कहा- मैने अपनी सारी संपदा सदैव दान-पुण्य में ही समíपत की है, फिर मेरे ऊपर यह कैसा ऋण बाकी है।., चित्नगुप्त ने बताया कि उन्होंने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुका दिया है, लेकिन उन पर अभी पितृ ऋण बाकी है, जब तक वह इस ऋण से मुक्त नहीं होंग,े उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। धर्मराज ने कर्ण को यह व्यवस्था दी की वह १६ दिन के लिए पुन: पृथ्वी पर जाकर और ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध तर्पण तथा ¨पडदान विधि एवं श्रद्धापूर्वक करें तभी उन्हें मोक्ष मिलेगा।
¨हदू धर्मग्रंथों में वैसे तो श्राद्ध के अनेक भेदों का वर्णन है, लेकिन मत्स्य पुराण में नित्य, नैमित्तिक और काम्य इन तीन भेदों का वर्णन है।यमस्मृति में दो.वृद्धि श्राद्ध और पार्वण श्राद्ध का भी विधान है। विश्वमित्न स्मृति में इन पांच के अलावा सात अन्य.सपिण्डन, गोष्ठी, शुद्ध्यर्थ, कर्माग, दैविक, यात्नार्थ तथा पुष्टच्यर्थ भेद बताए गए हैं। धर्मशाों में यह उल्लेख मिलता है कि धर्म का आचरण करने वाले ब्राrाण को श्रद्धापूर्वक भोजन करवाने से देवता और पितर तृप्त होते हैं।पितृपक्ष में देश के सभी प्रमुख तीर्थस्थानों पर पितरों के लिए ¨पडदान एवं श्राद्ध करना उत्तम माना गया है। परन्तु इस अवसर पर बिहार के प्रमुख तीर्थस्थल गया में देश से ही नहीं, अपितु विदेशों से भी लोग अपने पितरों का श्राद्ध-तर्पण एवं ¨पडदान करने के लिए पहुंचत़े हैं।वाल्मीकि रामायण, आनन्द रामायण, महाभारत, स्मृति और उपनिषद में गया की महिमा का गुणगान किया गया है। उल्लेखनीय है कि गया में किया गया श्राद्ध जीवन में एक ही बार किया जाता है। मान्यता है कि गया में माता-पिता दोनों की मृत्यु के बाद ही जाकर श्राद्ध करना चाहिए। गया में श्राद्ध, ¨पडदान और तर्पण का अनुष्ठान आदि युग से हो रहा है ।विवरण मिलता है कि विष्णु भगवान ने कोटि.कोटि देववृंद की उपस्थिति में ‘गया’ नामक वैष्णव असुर के शरीर पर यज्ञ क्रम में उसे अचल करने के उपरांत वहां श्राद्ध ¨पडदान का आशीर्वाद दिया, जो इस कलियुग में भी जारी है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम ने भी अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए गया में ¨पडदान किया था। पूरे देश में पूर्व में गया (बिहार) और उत्तर में पिहोवा (हरियाणा) में श्राद्ध का बड़ा महात्म्य है। पिहोवा में पितरों की सद्गति और शांति के लिए ¨पडदान करने का ठीक वैसे ही विधान है, जैसे गया में है। वामन पुराण के अनुसार पिहोवा के समान कोई तीर्थ नहीं है, क्योंकि इसका नाम लेने से ही पाप नष्ट हो जाते हैं। इस स्थान पर शिव का वास है। वामन पुराण के अनुसार अति पुरातन काल में भगवान शिव ने पिहोवा में स्नान किया था। भगवान इंद्र ने भी अपने पितरों का ¨पडदान इसी तीर्थ में किया था। यह वह समय था, जब पिहोवा का महत्व गंगाद्वार हरिद्वार से भी अधिक था।इस तीर्थ का नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा। उनके पिता का नाम वेन था, जो कुष्ठ की बीमारी से पीड़ित थे। उन्होंने २१ दिन तक वहां के जल से स्नान किया और उन्हें कुष्ठ से मुक्ति प्राप्त हो गई। जिस स्थान पर वेन का कष्ट दूर हुआ, वहीं सरस्वती के तट पर पृथु ने पिता की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार और ¨पडदान किया। महाभारत के अनुसार वहां स्नान और ¨पडदान करने से श्रद्धालु व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ का फल तो मिलता ही है, उसे मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

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  1. बहुत सारे पौराणिक संदर्भों सहित आपने विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है । इस परिश्रम के लिये बधाई । लेकिन मेरी श्रद्धा श्राध मे नही है सर ।

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