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बुधवार, 17 सितंबर 2025



अमर उजाला 7 सितम्बर 2025


सबेरा संकेत 17 अगस्त 2025

 

सोमवार, 20 जनवरी 2025

चीनी मांझे से टूटती जिंदगी की डोर

 

नवभारत रायपुर में 12 जनवरी 2024 को प्रकाशित

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

यादों का वसंत




15 फरवरी 2018 को जनसत्ता में प्रकाशित

शनिवार, 4 नवंबर 2017

एकांत का संगीत

clipआज जनसत्ता के संपादकीय पेज पर प्रकाशित आलेख

शनिवार, 7 मई 2016

चिंतन - 3 - वृक्ष बोलते हैं

चिंतन का अंश... सर जगदीश चंद्र बोस ने यह सिद्ध कर दिया है कि वृक्ष में भी जान होती है, वे भी सुख-दु:ख और संवेदनाओं को समझते हैं। यह भी तय हो गया कि वृक्ष इंसानों की भाषा समझते हैं। प्रयोगों से यह भी सिद्ध हो गया है कि मानव यदि रोज अपने बगीचे के पेड़-पौधों में पानी डालते हुए उनसे अच्छी-अच्छी, प्यारी-प्यारी बातें करे, तो वे उसकी बात मानते हैं। बस यह सिद्ध नहीं हो पाया है कि वृक्ष बोलते हैं। यह सिद्ध भी नहीं हो सकता, क्योंकि खामोशी की कोई आवाज नहीं होती। वृक्ष जो कुछ भी सोचते हैं, उसे हम तक पहुँचाने की पूरी कोशिश भी करते हैं। हम ही हैं, जो वृक्ष की भाषा नहीं समझ पाते। यहाँ आकर मानव पंगु बन जाता है कि जब वृक्ष हमारी भाष समझते हैं, तो मानव उनकी भाषा क्यों नहीं समझ पाता? कभी किसी एकांत में या फिर जंगल में जाकर सुनो, एकांत का संगीत, इसी संगीत में कहीं आवाज आएगी कि कोई कुछ बोल रहा है। आवाज की गहराई पर जाकर पता चलेगा कि अरे! ये तो वृक्ष की आवाज है। कुछ समय तक लगातार इस तरह का प्रयोग जारी रहा, तब आप वृक्ष की आवाज पहचानने लग जाएँगे। तब आपको पता चलेगा कि वृक्ष आजकल दु:खी हैं। कई बार हमने पेड़ से लगातार पानी रिसते देखा होगा। लोग कहते हैं कि पेड़ रो रहा है। इसके वैज्ञानिक कारण जो भी हो, पर जब हम यह जानते हैं कि पेड़ों में जान होती है, तो फिर उनकी सारी प्रक्रियाएँ भी मानव की तरह होंगी। इसलिए जब पेड़ बोलते हैं, तब हमें उनसे बातें करनी चाहिए। आज यदि हम उनकी भाषा समझने लग जाएँ, तो उनकी पीड़ाओं को शब्द दे पाएँगे। पेड़ उनसे सदैव प्रसन्न रहते हैं, जो प्रकृति प्रेमी होते हैं। क्योंकि यही तो हैं, जिनसे पेड़ बचे हुए हैं। पौधरोपण एक यज्ञ है, पेड़ों की संख्या बढ़ाने का। जो इस यज्ञ को करता है, वही वास्तव में पेड़ों का सच्च साथी है। अपने साथियों की लगातार कम होती संख्या से आजकल वृक्ष द़:खी हैं। देखते ही देखते उनके सामने से सागौन, बबूल, शीशम, देवदार, चीड़, आम आदि के पेड़ गायब हो गए। कुछ तो रातों-रात कट गए, कुछ बेमौते मारे गए। इनके दु:ख का कारण यही है। आलीशान घरों, हवेलियों में बनने वाले फर्नीचर के रूप में ये पेड़ ही हैं, जो हमारे सामने विभिन्न आकार में होते हैं। कभी कुर्सी, कभी डायनिंग टेबल, कभी पलंग, कभी दीवान आदि रूप होते हैं, इन्हीं पेड़ों के। कभी हवाओं के साथ मस्ती से झूमने वाले आज यही पेड़ बंद कमरों में खामोश जिंदगी बिता रहे हैं। वृक्षों की दर्दभरी कहानी ऑडियो की मदद से सुनिए...

शुक्रवार, 6 मई 2016

चिंतन - 2 पानीदार पानी

चिंतन का अंश... जल संकट प्राय: गर्मियों में आता था, अब वर्ष भर बना रहता है। ठंड के दिनों में भी शहरों में लोग नल निचोड़ते मिल जाएंगे। इस बीच कुछ हज़ार करोड़ रुपए खर्च करके जलसंग्रह, पानी-रोको, जैसी कई योजनाएं सामने आई हैं। वाटरशेड डेवलपमेंट अनेक सरकारों और सामाजिक संगठनों ने अपनाकर देखा है, लेकिन इसके खास परिणाम नहीं मिल पाए। हमें भूलना नहीं चाहिए कि अकाल, सूखा, पानी की किल्लत, ये सब कभी अकेले नहीं आते। अच्छे विचारों और अच्छे कामों का अभाव पहले आ जाता है। हमारी धरती सचमुच मिट्टी की एक बड़ी गुल्लक है। इसमें 100 पैसा डालेंगे तो 100 पैसा निकाल सकेंगे। लेकिन डालना बंद कर देंगे और केवल निकालते रहेंगे तो प्रकृति चिट्ठी भेजना भी बंद करेगी और सीधे-सीधे सज़ा देगी। आज यह सज़ा सब जगह कम या ज्यादा मात्रा में मिलने लगी है। पानी अभी भी हमारे लिए राशन जितना महत्वपूर्ण नहीं हो पाया है, लेकिन जब यही पानी पेट्रोल से भी महँगा मिलेगा, तब शायद हमें समझ में आएगा कि सचमुच यह पानी को हमारे चेहरे का पानी उतारने वाला सिद्ध हुआ। हमारे देखते-देखते ही पानी निजी हाथों में पहुँचने लगा। पानी का निजीकरण पहले यह बात हम सपने में भी नहीं सोच पाते थे, लेकिन आज जब सड़कों के किनारे पानी की खाली बोतलें, पॉलीथीन आदि देखते हैं, तब समझ में आता है कि यह पानी तो सचमुच कितना महँगा हो रहा है। यह सच है कि पानी का उत्पादन कतई संभव नहीं है। कोई भी उत्पादन कार्य बिना पानी के संभव नहीं। जन्म से लेकर मृत्यु तक पानी की आवश्यकता बनी रहती है। पानी को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय वर्षा जल को रोकना। इसे रोकने के लिए पेड़ों का होना अतिआवश्यक है। जब पेड़ ही नहीं होंगे, तब पानी जमीन पर ठहर ही नहीं पाएगा। अधिक से अधिक पेड़ों का होना यानी पानी को रोककर रखना है। दूसरी ओर हमारे पूर्वजों ने जो विरासत के रूप में हमें नदी, नाले, तालाब और कुएँ दिए हैं, उन्हीं का रखरखाब यदि थोड़ी समझदारी के साथ हो, तो कोई कारण नहीं है कि पानी न ठहर पाए। जल ही जीवन है, यह उक्ति अब पुरानी पड़ चुकी है, अब यदि यह कहा जाए कि जल बचाना ही जीवन है, तो यही सार्थक होगा। मुहावरों की भाषा में कहें तो अब हमारे चेहरें का पानी ही उतर गया है। कोई हमारे सामने प्यासा मर जाए, पर हम पानी-पानी नहीं होते। हाँ, मौका पड़ने पर हम किसी को भी पानी पिलाने से बाज नहीं आते। अब कोई चेहरा पानीदार नहीं रहा। पानी के लिए पानी उतारने का कर्म हर गली-चौराहों पर आज आम है। संवेदनाएँ पानी के मोल बिकने लगी हैं। हमारी चपेट में आने वाला अब पानी नहीं माँगता। हमारी चाहतों पर पानी फिर रहा है। पानी टूट रहा है और हम बेबस हैं। इस चिंतन का आनंद ऑडियो की मदद से सुनकर लीजिए...

चिंतन - 1 हमारी वनश्री

चिंतन का अंश... वन का दूसरा आशय हरियाली भी है। भला किसे अच्छी नहीं लगती, हरी-हरी वसुंधरा, यहाँ से वहाँ तक हरितिमा की फैली हुई चादर, आँखों को राहत देने वाले लुभावने दृश्य। जब भी हम प्रकृति के संग होते हैं, एक अजीब सी राहत महसूस करते हैं। हमें ऐसा लगता है, जैसे हम प्रकृति की गोद में हैं। जहाँ वह हमें माँ की तरह दुलार कर रही है। प्रकृति की इस रंगत को वनों से सहारा दिया है। जहाँ वन होंगे, वहाँ भूमि का कटाव नहीं होगा। वहाँ सघन पेड़ होंगे। यही सघन पेड़ बादलों को लुभाते हैं और बारिश के लिए लालायित करते हैं। इसलिए यह पर्यावरण बचाना है, तो वनों को संरक्षित रखना होगा। वन सुरक्षित रहेंगे, तभी हमारी वन संपदाएँ भी सुरक्षित रहेंगी। वन संपदाओं पर ही मानव स्वास्थ्य निर्भर है। वनों से हमें शुद्ध वायु ही नहीं, बल्कि कई जड़ी-बूटियाँ भी प्राप्त होती हैं। पूरा आयुर्वेद वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों पर आश्रित है। हमारे देश के वनों में वन संपदा के रूप में प्रचूर मात्रा में जड़ी-बूटियाँ हैं। इसी से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।् हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वनों में वायु होती है, यही वायु हमारी आयु में वृद्धि करती है। आज लोगों को स्वच्छ वायु ही नही मिल रही है, ऐसे में वन हमारे लिए बहुत ही आवश्यक हो जाते हैं। वन संपदा का संरक्षण एक समस्या है, क्योंकि लगातार घटते वन क्षेत्रों के कारण वन संपदा का भी दोहन हो रहा है। वनों को लेकर हमारी आवश्यकताएँ बढ़ रहीं हैं, इसलिए वन संपदा की रक्षा के लिए अधिक से अधिक पौधरोपण करना आज की महती आवश्यकता है। वन रहेंगे, तभी मानव जीवन संभव है। बिना वनों के मानव जीवन की कल्पना करना बेमानी है। दोनों ही परस्पर निर्भर हैं। वनों को लेकर अब हमारी चिंता बढ़ी है। सरकार ने भी इस दिशा में कुछ प्रयास किए हैं, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं। वन नीति के सख्ती से अमल में लाए जाने के कारण बन संपदा के दोहन पर रोक लगी है। यही नहीं औषधीय पौधों के संरक्षण और नए पौधे उगाने की दिशा में भी सार्थक प्रयास हो रहे हैं। दुनिया भर में जंगलों की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल करने वाली नई तकनीक से पता चलता है कि भविष्य में वनों की हालत को लेकर जो चिंता जताई गई है, स्थिति उतनी भी ख़राब नज़र नहीं आती है। शोधकर्ताओं के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा है कि उन्होंने जंगलों की पहचान के बारे में जो अध्ययन किया है उससे पता चलता है कि दुनिया भर में वनों की कमी वाली स्थिति से बेहतरी की तरफ अब कोई पड़ाव नजर आने वाला है। इस अध्ययन में दुनिया भर में लकड़ियों के भंडार और वन संपदा का अनुमान लगाने की कोशिश की गई है यानी अध्ययन में सिफऱ् उस इलाक़ों का अध्ययन भर ही नहीं किया गया जो पेड़ों से ढँके हुए हैं। इस अध्ययन के परिणाम अमरीकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल एकैडेमी ऑफ़ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं। वनों को लेकर हमें अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। वन से हम जब भी कुद लें, तो उसे कुछ देने के बारे में भी सोचें। निश्चित रूप से वन को हम जो कुछ भी देंगे, वह दोगना होकर हमें मिलेगा। तपती गर्मी में किसी घने पेड़ की छाया मानव को जो राहत देती है, वह किसी संपदा से कम नहीं होती। वनों के आसपास निवास करने वाले आदिवासी वनों पर ही आश्रित होते हैं। कई मामलों में ये वन की रक्षा भी करते हैं। वनों से प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटियों का इन्हें ज्ञान होता है। अपना घरेलू इलाज वे वनों से प्राप्त औषधियों से ही कर लेते है। इस चिंतन का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

निराधार हुआ आधार

डॉ. महेश परिमल
सबसे पहले जब उद्योगपति नंदन नीलकेणी ने पिछली सरकार के सामने एक भारतीय की अपनी पहचान के लिए एक प्रस्ताव रखा कि हम भारतीयों के नाम में समानता हो सकती है, पर यदि अपनी पहचान कायम करने के लिए यदि सभी के अलग-अलग नम्बर हों, जिसके आधार पर उसकी पहचान स्थापित हो सके। तो सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए सभी के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया। धीरे-धीरे यह हर भारतीय की पहचान बनने लगा। इससे आगे बढ़ते हुए भाजपा सरकार ने इसे उपभोक्ता के बैंक खाते से जोड़ने के लिए कदम उठाया। इससे समूचे देश में एक क्रांति ही आ गई। हर तरफ आधार कार्ड की ही चर्चा होने लगी। साथ-साथ इसमें की गई गलतियों एवं लापरवाहियों के किस्से भी आम हो गए। लेकिन एक बात यह ठीक रही कि इससे उपभोक्ता के खाते में सबसिडी की राशि सीधे जमा होने लगी। पर तभी सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश दिया कि आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं किया जा सकता। इससे लोगों में एक तरह की बेचैनी देखी गई। काफी जद्दोजहद से बना था आधार कार्ड, लेकिन उसकी उपयोगिता को अनदेखा कर दिया गया। अब अाधार कार्ड की हालत यह है कि यह अपनी पहचान बनाते-बनाते स्वयं ही निराधार हो गया। एक तरफ डिजिटल इंडिया के लिए सरकार हाय-तौबा मचा रही है, तो दूसरी तरफ डायरेक्ट केश ट्रांसफर के साथ जुड़ी आधार कार्ड योजना के संबंध में लापरवाह हो गई है। सरकार की सबसिडी की राशि सीधे उपभोक्ता के खाते में चली जाए, इसके लिए आधार कार्ड को सीधे बैंक खाते से जोड़ दिया गया। आधार कार्ड पाकर लोग स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। लोग इसे हाईप्रोफाइल मानने लगे। लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अपने निर्णय में यह कहा कि प्रजा का यह बायोमेट्रिक डाटा सुरक्षित नहीं है। इस जानकारी को गोपनीय भी नहीं रखा जा सकता। सुप्रीमकोर्ट ने सबसिडी जमा करने के लिए आधार कार्ड को उपयोगी माना। परंतु इसके अन्य क्षेत्रों में उपयोग के लिए अनुपयोगी माना। इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है कि इसे अन्य क्षेत्रों में भी उपयोग में लाया जाए या नहीं। आधार कार्ड की योजना सभी क्षेत्रों में जारी रखी जाए या नहीं, इस आशय का सुझाव सेबी, आरबीआई, एलआईसी, ट्राई एवं आयकर आदि ने दिए हैं। इस तरह से देखते ही देखते आधार कार्ड जीवन का ही आधार बन गया। लोग इसके लिए लम्बी-लम्बी लाइनों में खड़े रहकर, परेशान होकर अपना कार्ड बनवाने लगे। सब कुछ अच्छे से चल रहा था कि अचानक ही एक जनहित याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने यह फैसला दिया कि आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। इस फैसले से लोगों की आशाओं पर मानों तुषारापात हो गया। आधार कार्ड को कांग्रेस अपना गेम चेंजर समझती थी, परंतु लोकसभा चुनाव में वह इसे पूरी तरह से भुना नहीं पाई। कांग्रेस के इस कार्य को भाजपा सरकार ने भुनाने का प्रयास किया, इसमें काफी हद से कामयाब भी रही।


सरकार डायरेक्ट बेनीफीट ट्रांसफर स्कीम को आधार कार्ड के साथ जोड़ना चाहती थी, परंतु इसके लिए कोई योजना तैयार नहीं कर पाई। एक योजना के अंतर्गत यह प्लान था कि सरकार की तरफ से मिलने वाले लाभ को सीधे उपभोक्ता के बैंक खाते में डाल दिया जाए। यूपीए सरकार इस योजना में विफल साबित हुई। सभी यही सोच रहे थे कि एनडीए सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नाकामयाब योजना को ताक पर रख देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। आधार कार्ड का आइडिया देने वाले नंदन नीलकेणी मोदी को इसकी उपयोगिता को समझाने में सफल रहे। उन्होंने बताया कि आधार कार्ड से अभी भले नहीं, पर भविष्य में इसके चमकात्कारिक परिणाम सामने आ सकते हैं। इसके बाद इस आधार कार्ड को जोरदार सफलता मिलने लगी। एलपीजी सबसिडी आदि की राशि सीधे ग्राहक के खाते में जमा होने लगी। जन धन योजना के अंतर्गत 28 अगस्त तक 17.74 करोड़ बचत खाता बैंकों में खुले थे। इसमें से 22 हजार करोड़ की राशि जमा भी हो गई। ये सभी खाते आधार कार्ड के साथ जोड़ दिए गए थे। 3 लाख 515 हजार 634 परमानेंट एकाउंट नम्बर (पेनकार्ड) आधार कार्ड के साथ जुड़ गए। आधार कार्ड का दूसरा लाभ यह हुआ कि बैंक एकाउंट ख्ुलवाना, पासपोर्ट बनवाना आदि अन्य सरकारी कामों में भी इसका उपयोग होने लगा था। सरकार को आधार कार्ड के उपयोग को एक सीमा में रखने के बजाए राज्यों में कितने बोगस राशन कार्ड हैं, इसकी जांच कर उसे रद्द करने का काम करना चाहिए।
आधार का आधार पहले तो स्पष्ट था, इसके कारण कई बोगस उपभोक्ताओं की पहचान हो गई। भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया। इससे प्रजा का धन योग्य हाथों में जाना शुरू हो गया। आधार कार्ड के कारण यह स्पष्ट हुआ कि 2011 में आंध्र प्रदेश में जब जनसंख्या की गणना हुई, तो पता चला कि जितने राशन कार्ड हैं, उससे अधिक उस राज्य की आबादी है। यानी की आबादी से कई गुना राशन कार्ड थे। इससे बिचौलियों का आधार खत्म हो गया। इन्हीं के कारण सरकार द्वारा दिया जाने वाला लाभ सही हाथों तक नहीं पहुंच पाता था। इससे कई फायदे हुए। लेकिन जो पहले सरकारी सहायता को लोगों तक नहीं पहुंचने देना चाहते थे, वही लोग इससे घबराने लगे। वही लोग जनहित याचिका लगाकर उसे एक बेकार योजना बनाने में लगे हुए हैं। आधार कार्ड जैसी योजना बार-बार देखने को नहीं मिलती। जब तक लार्जर बैंक कोई निर्णय न ले, तब तक आधार कार्ड केवल एलपीजी, केरोसीन और अनाज की सबसिडी में काम में लाई जा सकती है। इससे भले ही सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। लेकिन इसके लाभ को देखते हुए इसे जारी रखना चाहिए। ताकि सरकारी लाभ का फायदा सीधे हितग्राहियों को ही मिले।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

सुलगते सवालों के मुहाने पर हम!

डॉ. महेश परिमल
 इस समय देश का माहौल कुछ बदला-बदला-सा लग रहा है। नेताओं की जुबानें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। जुबानी-जंग तेज से तेजतर होती जा रही हैं। लोग स्वयं को असुरक्षित समझने लगे हैं। कोई मकान बदल रहा है, तो कोई शहर। कोई अपने घर में राशन भर रहा है, तो कोई बच्चों को विदेश भेज रहा है। ये सारे ताम-झाम केवल स्वयं और परिवार की सुरक्षा को लेकर हो रहा है। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर दोनों को अलग करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जा रही है। ऐसा लगता है कि भीतर ही भीतर कुछ पक रहा है। कुछ ऐसी तैयािरयां हो रही हैं, जो इसके पहले कभी नहीं हुई। लोग परस्पर संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। सब अपने में ही मस्त हैं। टीवी पर चीखते लोग ऐसे लगते हैं, मानों पूरे देश में आग लगा देंगे। अखबार भी कम नहीं हैं। एक छोटी-सी खबर को भी बहुत बड़ा स्थान देकर उसे तूल दिया जा रहा है। कोई किसी का सरमायादार नहीं बनना चाहता। विश्वास नाम की चीज तो रह ही नहीं गई है। ऐसा माहौल पहले कभी देखने को नहीं मिला। अभी कुछ ही दिन पहले एक मित्र ने अपने प्रावीडेंस फंड से कुछ राशि निकाली। उस राशि से उसने घर में दो महीने का राशन भर लिया। मुझे आश्चर्य हुआ। इसका कारण जानना चाहा, तो उसने साफ-साफ कहा-इस देश में अब कभी-भी कुछ भी हो सकता है। हो सकता है, लंबा कर्फ्यू ही लग जाए। इसलिए बच्चों के लिए कुछ तो रखना ही होगा। मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है। इस देश को काफी लंबे समय बाद बहुमत वाली सरकार मिली है। सरकार का वादा है कि वह जाति,धर्म आदि से उठकर काम करेगी। सबका विकास करेगी। ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है, तो फिर अराजकता का माहौल क्यों दिखाई दे रहा है? कहीं तो ऐसा कुछ है, जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा है, पर भीतर ही भीतर सुलग रहा है। इस बीच नेताओं के बयान पर कोई अंकुश नहीं है। वे कुछ भी बोल रहे हैं, तो मीडिया को मसाला मिल रहा है। कहीं किसी के मुंह से कुछ गलत निकला कि वह मुद्दा बन जाता है। कहने वाला तो एक ही बार कहता है, फिर मीडिया उसे दिन में करीब 100 बार कहलवा देता है। इससे माहौल बिगड़ते देर नहीं लगती। देखा जाए, तो संयम तो कहीं किसी में दिखाई नहीं दे रहा है। अंकुश के अभाव में लोग एक-दूसरे को भड़काने में ही लगे हैं। सोशल मीडिया तो इस दिशा में एक कदम आगे जाकर काम करने लगा है। अफवाहें फैलाने में इससे बड़ा कोई माध्यम ही नहीं है। यूं तो सोशल मीडिया ज्ञान का खजाना है, पर इस खजाने का दुरुपयाेग ही अधिक हो रहा है। आपसी सद्भाव अब दुर्लभ हो गया है। इक्का-दुक्का कुछ खबरें आ जरूर रही हैं, पर वह समुद्र में एक बूंद की तरह है। बच्चों में प्रतिस्पर्धा के नाम पर कुछ ऐसे संस्कार डाल दिए गए हैं कि दूसरे नम्बर पर आने पर वह यही कहता पाया जाता है कि टीचर नेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे पक्षपात किया। काेई भी किसी के निर्णय से संतुष्ट ही नहीं है। हर कोई अपना मुकाम खुद ही बनाना चाहता है। बच्चों में यह सब कुछ आ रहा है, बड़ों के माध्यम से। बच्चे जो देख-सुन रहे हैं, उसे ही अपने जीवन में उतार रहे हैं। संस्कार के साधन अब माता-पिता ही नहीं, बल्कि मोबाइल-टीवी हो गए हैं। आकाशीय मार्ग से मिलने वाले इस ज्ञान से बच्चे कुछ अलग ही तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं। स्कूलों में हर बच्चा आक्रामक ही दिखाई दे रहा है। सभी की नसें तनी हुई होती हैं। इसकी वजह होम वर्क तो कतई नहीं है। पर वे भी स्वयं पर काबू नहीं रख पा रहे हैं। घर में कोई भी इलेक्ट्राॅनिक चीज बच्चों की सहमति के बिना आ ही नहीं सकती। बच्चे बड़ों के काम में दखल देने लगे हैं, पर उन्हें अपने काम में बड़ों का दखल कतई मंजूर नहीं। हर कोई अपने ही आस्मां में कैद रहकर अपना रास्ता खोज रहा है। न तो उसे अपनी मंजिल का पता है और न ही उसे यह पता है कि उसे जाना कहां है? यदि जाना है, तो उसके पास जो संसाधन है, उससे वह अपनी मंजिल तक पहंुच सकता है? रही बात गांव, मोहल्ले, शहरों की, तो सभी जगह राजनीति ने ऐसी पैठ जमा ली है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। एक-दूसरे को नीचा दिखाना मानो राष्ट्रधर्म बन गया है। अपने को कोई कम आंकना ही नहीं चाहता। किसी भी किसी अपराध में पकड़ लिया जाए, तो उसकी पहंुच इतनी दूर तक होती है कि वह पुलिस हिरासत में पहुंचने के पहले ही रिहा हो जाता है। मामला थाने तक भी नहीं पहुंच पाता। ऐसा तो गांव, मोहल्ले में हो रहा है। पर जो राजधानी स्तर पर हो रहा है, उसकी तस्वीर बहुत ही भयानक है। छोटी से छोटी संस्थाओं के तार राजनेताओं से जुड़े हुए हैं। इन नेताओं के तेवर इतने अधिक सख्त हैं कि अपनी जीत के लिए वे कुछ भी कर सकने के लिए दल-बल के साथ तैयार हैं। हर नेता की अपनी तैयारी है। उनके अपने कार्यकर्ता हैं, जो एक आवाज पर लड़ने-मरने को उतारू हैं। मानों यह संकल्प ही ले लिया है कि अब की बार तो कोई बच ही नहीं पाएगा। बिहार चुनाव को लेकर इस समय काफी गर्मा-गर्मी भी दिखाई दे रही है। अभद्र भाषा का चलन ऐसा बढ़ गया है कि कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करना चाहता। माहौल ऐसा बन गया है कि दुश्मन को जीवित देखना भी पसंद नहीं है। दुश्मन का जिंदा रहना उनकी कायरता है। अपनी इस कायरता को कम करने के लिए वे कुछ ऐसा करने के लिए तैयार हैं, जिससे दुश्मन नेस्तनाबूत हो जाएं। देश की स्थायी सरकार में ही कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी का कहना नहीं मान रहे हैं। आपत्तिजनक बयानों के बाढ़ आ गई है। मुद्दा कोई भी हो, उसका तुरंत राजनीतिकरण हो जाता है। उसके बाद बयान दर बयान का सिलसिला चल निकलता है। उनके बयान इतने अधिक आक्रामक होते हैं कि लोग अपने वश में नहीं रह पाते। कुछ कर गुजरने की छटपटाहट बढ़ जाती है। अब साधू-संत भी इसमें पीछे नहीं रहे। उनके अंधभक्त भी इतने अधिक हिंसावादी हैं कि वे और कोई दूसरी भाषा न तो समझते हैं और न ही उन्हें शांति की भाषा आती है। हर दल का अपना एक अलग ही आक्रामक शाखा है, जो बस आदेश की प्रतीक्षा में है। उलझन भरे इस माहौल में आम आदमी का सांस लेना मुश्किल हो गया है। बदलते माहौल को लेकर हर कोई अपने तईं तैयारी कर ही रहा है। पर यह तय है कि कुछ हुआ, तो सबसे अधिक प्रभावित आम आदमी ही होगा। वही मारा जाएगा, उसके बच्चे मारे जाएंगे, उसका परिवार तबाह हो जाएगा। उच्च और मध्यम वर्ग तो अपनी तैयारी कर चुका है, अब निम्न वर्ग क्या करे? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सुलगते सवालों के मुहानों पर बैठा आज इंसान यह तय नहीं कर पा रहा है कि क्या किया जाए? संकीर्ण मानसिकता, ओछी राजनीति, तीखी हवाओं के बीच आम आदमी अपने वजूद को तलाश रहा है। इससे बचने की कोई राह दूर-दूर नहीं दिखाई नहीं दे रही है। क्या होगा इस देश का, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
 डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

विरोध नहीं, उसकी जड़ की पड़ताल हो

डॉ. महेश परिमल
चिड़िया जैसी कद का एक खूबसूरत स्पेनिश पक्षी होता है, जिसका नाम है केनेरी। 300 वर्ष पहले जब कोयले की खानों में काम करने वाले खनिक मजदूर अपने काम के लिए जाते थे, तब अपने साथ इस केनेरी पक्षी को भी ले जाते थे। इस पक्षी की यह विशेषता हाेती है कि खदानों से निकलने वाली मिथेन जैसी जहरीली गैस को सबसे पहले यही पक्षी महसूस करता है, थोड़ी-सी गंध से ही इस पक्षी का दम घुटने लग जाता है। कुछ देर बाद इसकी मौत हो जाती थी। इससे मजदूर समझ जाते थे कि कहां पर मिथेन गैस की बहुतायत है। एक पक्षी की अकाल मृत्यु से कई मजदूरों की जान बच जाती थी। समाज में रहने वाले सर्जक, लेखक, कलाकार या फिर कवि ये सभी अपने आसपास के समाज के केनेरी पक्षी की तरह होते हैं। अपने समय या देशकाल के आंतरिक सत्य को ये सबसे पहले महसूस करते हैं। उसके बाद अपने विचार समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं। आम जनता अपने आसपास फैली जहरीली हवाओं को पहचान नहीं पाती, इसलिए ये समाज के संवेदनशील लोग केनेरी पक्षी की भूमिका अदा करते हैँ। अपने जान जोखिम में डालकर ये लोगों को सचेत करते हैं कि आने वाला समय काफी संवेदनशील है, जो खतरनाक भी हो सकता है। इसलिए सचेत हो जाएं। लोगों को सचेत करने वाले यही सर्जक, कवि, कलाकार, लेखक अपनी इसी ख्ूबी के कारण समाज के पहरुए का काम करते हैं। इसलिए इनका स्थान विशिष्ट होता है। इस समय ये काम नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने किया है। स्वयं को मिले सम्मान सरकार को लौटाते हुए इन्होंने अपनी तरफ से विरोध का स्वर मुखर किया है। इस स्वर में वह पीड़ा प्रस्फुटित होती है, जो उनकी पहचान है।
इस समय देश में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक संवेदनशील समाज के लिए घातक है। इससे बौद्धिक वर्ग कुछ अनमना-सा महसूस कर रहा है। विख्यात साहित्यकार नयनतारा सहगल ने कितनी ही समस्याओं को लेकर देश के प्रधानमंत्री और अन्य प्रबुद्ध वर्ग के मौन को लेकर अपना विरोध व्यक्त किया है। इस ओर सबका ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने की घोषणा भी कर दी है। उनका अनुसरण करते हुए अशोक वाजपेयी ने भी स्वयं को मिले पुरस्कार लौटा दिए हैं। स्वाभाविक है, कुछ लोग इसे भाजपाई खेमे के विरोध के रूप में देख रहे हों और इसे  राग कांग्रेसी’ बता रहे हों। पर क्या यह पूरा सच है? नयनतारा सहगल को कांग्रेसी कहकर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। भले ही वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी हों, पर केवल इसी कारण से उन्हें हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में भी है। पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान अपने उपन्यास ‘टाइम टू बी हेपी’ से खींचा। इसके बाद तो ‘स्टार्म इन चंडीगढ़’ ‘मिस्टेकन आईडेंटटिटी’ और ‘रिच लाइफ अस’ जैसे उपन्यासों के माध्यम ने साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। यही नहीं समय-समय पर उन्होंने सर्जनात्मक साहित्य के साथ-साथ अपने आसपास के राजनीतिक, सामाजिक अौर वैश्विक परिवेश पर भी अपने विचार व्यक्त करती रहीं हैं। नयनतारा जवाहर लाल नेहरू की भांजी है, इस आवरण से तो वे तभी मुक्त हो गई थीं, जब उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन में उनका विरोध किया था। अपनी किताब इंदिरा गांधी इमर्जेंसी एंड स्टाइल में उन्होंने व्यक्तिपूजा, एकाधिकार के कारण लोकतंत्र की छटपटाहट को व्यक्त किया था। उस समय उनका यह रूप भाजपा को बहुत भला लगा था। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने नयनतारा को एक ‘जाग्रत सर्जक’ ही एक जाग्रह प्रहरी हो सकता है, कहकर उनकी प्रशंसा की थी। वही नयनतारा अब भाजपा शासन की बुराई कर रहीं हैं, तो इसे कांग्रेसी राग कहा जा रहा है। किस तरह की दोहरी मानसिकता है लाेगों की? दूसरी ओर अशोक वाजपेयी को  हिंदी के ख्यातनाम कवि के रूप मे पहचाना जाता है। सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला है उन्होंने। गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के लिए उन्होंने काफी काम किया है। उनका कार्यकाल कांग्रेस शासन में अधिक रहा, इसलिए लोग उन्हें ‘कांग्रेस कवि’ कहते हैं। परंतु जिनकी कविता के प्रशंसक अटल बिहारी वाजपेयी हों और उन्होंने ही अशोक जी को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया हो, तो फिर वे किस तरह से कांग्रेसी कवि हो गए? इसका जवाब किसी भाजपाई के पास नहीं है।
इन दोनों बुद्धिजीवियों ने वर्तमान राजनीतिक वातावरण में बढ़ रही धर्मांधता, मानवीय मूल्यों के हनन और स्वेच्छाचारी विचारधारा के अतिक्रमण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। यह एक चुनौतीभरा काम है। नयनतारा ने साहित्य अकादमी द्वारा मिले सम्मान को वापस करते हुए यह मुद्दा उठाया हे कि देश में स्थापित हितों के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की हत्या हो रही है,तब साहित्य अकादमी खामोश क्यों बैठी है? दादरी हत्या के मामले में प्रधानमंत्री अब तक मौन क्यों हैं? इस पर भी उन्होंने अपना विरोध मुखर किया है। नयनतारा ने इसके पहले कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी की हत्या, वामपंथी विचार गोविंद पानसरे की हत्या और सुधारवादी नेता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का उल्लेख किया है। ये तीनोें बुद्धिजीवी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी तरह का योगदान देते रहे हैं। तीनों की हत्या में समानता है। तीनों ही मामले में धर्मांध लोगों को इनकी सक्रियता फूटी आंख नहीं सुहा रही थी। ये उनके लिए आंख की किरकिरी बन गए थे। एम.एम. कलबुर्गी भी साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। अपने लेखन में उन्होंने समय-समय पर धार्मिक रूढ़ियों, उन्माद, क्रियाकांडों की निरर्थकता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर तीखा प्रहार भी किया था। मूर्ति में क्या कोई शक्ति है, इसकी जांच के लिए उन्होंने जो कुछ किया, उस पर विहिप और बजरंग दल वाले भड़क उठे, उनकी काफी आलोचना हुई। अंतत: 30 अगस्त को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। गोविंद पानसरे महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत के साम्यवादी विचारक थे। राजनीतिक विचारधारा वामपंथी होने के कारण वे समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाते रहते। शिवाजी पर केंद्रित उनकी किताब काफी विवादास्पद हुई थी। शिवाजी पर उनके दृष्टिकोण से शिवसेना एवं अन्य धार्मिक कट्‌टरवादी संस्थाएं उनके विरोध में आ खड़ी हुई थीं। उन पर तीन बार प्राणघातक हमला हुआ। ऐसे ही एक हमले में गत फरवरी में वे अपनी जान गवां बैठे। इसी तरह नरेंद्र दाभोलकर भी समाज में फैली कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधश्रद्धा, क्रियाकांडों, धार्मिक पाखंडों आदि पर जमकर प्रहार करते। अपनी इसी प्रहारक क्षमता के कारण वे धर्म के नाम पर ढोंग करने वाले कथित बाबाओं के लिए परेशानी का कारण  बन गए थे। कितनी बार उन्हें जान से मारने की धमकी मिली। उन पर हमले भी हुए। अंधश्रद्धा निर्मूलन संबंधी विधेयक लाने के लिए वे पूरे महाराष्ट्र में अभियान चला रहे थे। इसके कारण कितने ही सांप्रदायिक संगठनों के निशाने पर आ गए थे। अंतत: उन्हें भी अपनी जान खोनी पड़ी।
उपरोक्त तीनों मामलों से एक बात यही निकलकर आती है कि क्या गोविंद पानसरे ने शिवाजी के प्रति अपने विचार रखने का अधिकार नहीं है। क्या वे अपनी नई नजर, नए तर्क से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते? मूर्ति में बसने वाले ईश्वर वास्तव में हमारे भीतर बसते हैं, ऐसा कहने वाले कलबुर्गी अपने ही बचपन में की गई नादानी का किस्सा बताते हैं, तो कुछ लोगों के सर पर आसमान क्यों टूट पड़ता है? यह ईश्वरीय तत्व का अपमान है या सत्य की तरफ ले जाने वाला एक नूतन अभिगम है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त है। यह लोकतंत्र का प्राण है। इसके अलावा यह हिंदू धर्म का मर्म भी है। प्राचीन वेदग्रंथों में भी ब्रह्म को व्याख्यायित करने के लिए मंथन करने वाले शिष्यों को गुरु सतत ‘नेति...नेति’ कहकर सत्य की तरफ ले जाते रहे हैं। क्या उस समय उनके शिष्यों ने अपने गुरु पर हमला किया था। ब्रह्म यह नहीं है, ऐसा लगातार कहने वाले गुरु को हम नास्तिक कहने में जरा भी संकोच नहीं करते। विचारों की ताजगी को खुले रूप में स्वीकारना ही हिंदू धर्म का लचीलापन है। इसी लचीलेपन के कारण ही हिंदू धर्म हजारों साल के बाद भी पूरी शिद्दत के साथ अडिग है। इतने सारे आक्रमणों के बाद भी उसमें जरा भी विचलन नहीं आया है। उसकी अविचलता ही उसकी पहचान है। तो क्या आज यदि कुछ लोग ज्वलंत मामलों में अपना नया विचार रखते हैं, तो सचमुच हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा? यदि वास्तव में ऐसा होता, तो यह धर्म कब का नेस्तनाबूत हो चुका होता। नयनतारा सहगल हो या अशोक वाजपेयी, यदि वे अपना विरोध दर्ज करते हैं, तो उन्हें गंभीरता से सुनना ही होगा। आखिर उन्हें एेसा कहने और करने की नौबत क्यों आई, इस पर गहराई से विचार आवश्यक है। न कि उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर किसी तरह की टिप्पणी की जाए। समाज में यदि विरोध नहीं होगा, तो नए विचार कैसे आएंगे। विरोध तो सामाजिक विकास का अभिन्न अंग है। इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यदि हमने विरोध को नहीं स्वीकारा, तो मंजीरों के शोर में हम भी क्रमश: तालिबानी मानसिकता के प्रभाव में आ जाएंगे। इसका हमें आभास भी नहीं होगा। विरोध को कुचलना समाधान नहीं है, बल्कि विरोधियों का हौसला बुलंद करना है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

धैर्य की सीमा

डॉ. महेश परिमल
लोग कहते हैं कि धैर्य की सीमा क्या होनी चाहिए? एक जिज्ञासु ने जब मुझसे यह प्रश्न किया, तो मैंने कहा-यदि धैर्य की सीमा जानना चाहते हो, तो पानी को बर्फ बनता देखो। पानी का बर्फ बनना यानी तापमान का लगातार गिरना। तापमान का गिरना यानी ठंड के थपेड़ों को सहना। अपनी आंखों के सामने एक-एक चीज का सिमटना। आँख का संकुचित होना। पानी काे एकटक देखना। निर्निमेष देखती आँखें और पानी का रूप परिवर्तन। ठीक वैसे ही, जैसे तेज हवाओं के आगे बुझते दीपक को जलाए रखने की मशक्कत करना। एक स्थिति ऐसी आती है, जब हमें स्वयं का भान नहीं होता। यही होती है ध्यान की अवस्था। इस दौरान जो कुछ होता है, वही है सच्चा ध्यान। इधर पानी बर्फ बनता है, उधर ध्यान पूरा होता है। एक नई चीज आपके सामने होती है। आपको लगता है कि आज मेरे सामने कुछ नया हुआ। यहां से शुरू होती है खुद को पहचानने की कला। इस कला को हर कोई नहीं समझ सकता। खुद को पहचानना यानी खुदा को पहचानना। इसलिए ईश्वर तक जाने का रास्ता खुद से निकलता है। ईश्वर को खोजने के लिए खुद को खोज लो, ईश्वर आपके सामने होंगे।
अब आप कहेंगे कि ये ईश्वर क्या होता है? जो हमें संबल दे, हमें चुनौतियों से लड़ना सिखाए, हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, वह ईश्वर। यह काम यदि कोई इंसान भी करे, तो भी वह हमारे लिए ईश्वर ही है। ईश्वर स्वयं सभी जगह नहीं जा पाते, इसलिए वे अपना प्रतिनिधि भेजते हैं, जो उनकी तरह काम करते हैं। अब इस प्रतिनिधि को कौन पहचान पाता है? वही जिसे ईश्वर की तलाश है। इसलिए यदि हमारे आसपास कोई ऐसा इंसान है, जो ईश्वर की तरह काम करता है, तो उसे अपना आराध्य मान लो। यह किसी भी रूप में हो सकता है। कभी किसी बुजुर्ग के रूप में या फिर बच्चे के रूप में। प्रेयसी में यदि ईश्वर के दर्शन करना चाहते हैं, तो उसके लिए रामकृष्ण परमहंस बनना होगा। रामकृष्ण परमहंस यानी विवेकानंद के गुरु। इनकी सीमा तक पहुँचना हम साधारण इंसान के बस की बात नहीं है। हमें तो केवल पानी को बर्फ बनने की प्रक्रिया देखनी है। यही है धैर्य की सीमा।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

इस देश में चलती है कैंसर एक्सप्रेस

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

शब्दों की मोहक दुनिया

डॉ. महेश परिमल
शब्दों का सौंदर्य अद्भुत होता है। जब भी हमारे सामने कुछ शब्द विशेष सामने आते हैं, तो हम उस पर एक तरह से फिदा ही हो जाते हैं। मुँह से अनायास ही निकल जाता है कि वाह क्या शब्द है। शब्द और भाषा का अपना विशिष्ट शास्त्र है। शब्द समय के साथ बनते रते हैं, साथ ही इतिहास के गर्त में गुम भी होते रहते हैं। एक ओर जहां अंगरेजी के एक-एक शब्द पर शोध होते रहते हैं, वही दूसरी ओर अन्य भाषाओं के लिए यह जुनून नजर नहीं आता। हाल ही में आक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द ईयर के रूप में ‘सेल्फी’ शब्द का चयन किया गया है। इस शब्द का आशय है कि  मोबाइल या कैमरे से अपनी ही तस्वीर लेकर उसे फेसबुक या अन्य किसी विशेष मीडिया साइट पर अपलोड करना। हर वर्ष वर्ल्ड ऑफ इयर की स्पर्धा में नए-नए शब्दों का समावेश किया जाता है। जिस शब्द का चयन होता है, उसे शब्दकोश में स्थान मिलता है। यह सब देखकर और जानकर ऐसा लगता है कि इस तरह के कार्य यदि हमारी भाषा में हो, तो कितना अच्छा हो।
शब्द जीवंत हैं, क्योंकि इसे हम बोलते, लिखते और पढ़ते रहते हैं। हर शब्द अपने आप में एक मुहावरा होता है। हर शब्द की अपनी पहचान होती है। हर शब्द अपने आप में इतिहास को संजोया हुआ होता है। शब्द में इतिहास ही नहीं, बल्कि वर्तमान के दर्शन होते हैं। आश्चर्य यह है कि शब्द का भूगोल भी होता है, क्योंकि कुछ शब्द केवल कुछ ही देश अथवा राज्य में ही प्रयुक्त होते हैं। नए शब्दों का जन्म होता रहता है। हमेशा नए-नए शब्द अस्तित्व में आते रहते हैं। यह भी सच है कि शब्दों की मौत भी होती है। काल के शब्द रसातल में चले जाते हैं और लुप्त हो जाते हैं। कितने ही शब्द निजी होते हैं। अक्सर प्रेयसी अपने प्रियतम को एक विशेष नाम से पुकारती है। प्रेमी भी ऐसा ही करते हैं। पति और पत्नी के बीच भी वार्तालाप में कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिसका अर्थ वह नहीं होता, जिसका अर्थ साधारणतया वही होता है। ऐसे शब्द या नाम लीविंग सर्टिफिकेट या पासपोर्ट में नहीं होते। केवल दिल में ही होते हैं। कुछ शब्द इतने निजी होते हैं कि किसी व्यक्ति विशेष की उपस्थिति में ही बोले जाते हैं। महामहिम शब्द राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए ही प्रयुक्त होता है। मी लार्ड योर ऑनर आदि शब्द केवल अदालत में न्यायमूर्ति के लिए प्रयुक्त होते हैं। शब्द घिसते हैं, पिटते हैं और नए शब्दों की रचना के लिए मार्ग दिखाते हैं। देखते ही देखते लाइब्रेरी कब रायबरेली हो गया, हमें पता नहीं चला। रेफ्रिजेरेटर, फ्रिज और टेलीविजन टीवी हो गया, हमें पता ही नहीं चला।
भाषाशास्त्री शब्दों और वाक्यों पर घात लगाकर बैठे होते हैं। वे उस शब्द की व्युत्पत्ति से लेकर उसके विसर्जन तक का हिसाब रखते हैं। कहा जाता हे कि चार कोस पर पानी बदले और चार कोस पर बानी। हिंदी को ही ले लीजिए, वही हिंदी उत्तर प्रदेश में कुछ और तरीके से बोली जाती है, और मध्यप्रदेश में कुछ और तरीके से। पंजाब की हिंदी और बंगला की हिंदी में जमीन आसमान का अंतर है। इसी तरह छत्तीसगढ़ी रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव आदि में विभिन्न स्वरूपों में मिलती है। इस वर्ष ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईयर 2013 में ‘सेल्फी’ का समावेश किया गया है। यह शब्द पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष 17 हजार बार अधिक प्रयुक्त हुआ है। शब्दों पर शोध ऐसे ही नहीं होता। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी उसके लिए रिसर्च प्रोग्राम बनाती है। ‘सेल्फी’  इंटरनेट पर सबसे अधिक प्रयुक्त हाने वाले शब्दों में से है। आक्सफोर्ड डिक्शनरी के संपादक जुडी पियरसल का कहना है कि सामाजिक, राजनैतिक और तकनीक बदलाव से शब्द भी आकार प्राप्त करते हैं। शब्द जुड़ते हैं, बिखरते हैं, नए बनते हैं और पुराने लुप्त हो जाते हैं। यह सब लोगों द्वारा ही होता है। माँ के स्थान पर मम्मी, मॉम या मम्मा शब्द आ गए, आपको पता चला? पिताश्री या पापा का स्थान पर पप्पा ने ले लिया। अब पप्पा का स्थान डेड ले रहा है। हमें पता ही नहीं चलता कि भाषा बदल रही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने एक शब्द दिया है-अफरा-तफरी, यह शब्द इतना अधिक प्रचलित हो गया है कि हर कोई आपाधापी के लिए इसी शब्द का प्रयोग कर रहा है। जिम को आज जिम के रूप में ही कहा जाता है, किसी को व्यायामशाला या कसरत स्थल कहते कभी सुना है आपने? क्रीडांगन अब ग्राउंड बन गया है।
अब फिर आते हैं शब्द ‘सेल्फी’  पर। आज की पीढ़ी शायद ही इस शब्द से अपरिचित हो। सभी ऐसा ही करने लगे हैं। अपनी ही तस्वीर अपने मोबाइल या कैमरे से खींचते हैं, फिर उसे सोशल साइट्स पर अपलोड कर देते हैं। इस कार्य से अब सेलिब्रिटिश भी बच नहीं पाए हैं। 2002 में सबसे पहले ऑस्ट्रेलियन फोरम में ‘सेल्फी’ शब्द का प्रयोग किया गया था। 2004 में क्लिकर्स वेबसाइट पर हैगटैग के लिए ‘सेल्फी’ का प्रयोग किया गया। फिर 2012 तक फिर इसका उपयोग अधिक नहीं हो पाया। 2012 में सोशल मीडिया पर सेल्फ पोर्टेट फोटोग्राफ्स का शार्टकट रूप ‘सेल्फी’ शब्द उपयोग में लाया गया। उसके बाद तो इसका बेपनाह प्रयोग होने लगा। सोशल मीडिया पर क्रिश्चियन धर्मगुरु  पोप के साथ यंगस्टर्स की एक तस्वीर खूब शेयर की गई। इस तस्वीर ने ‘सेल्फी’ शब्द के प्रयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस समय ‘सेल्फी’  के अलावा दो अन्य शब्द स्पर्धा में थे। इसमें से एक शब्द है ‘ट्वर्क’ और दूसरा है‘बिंगवाय’। यह शब्द ट्वर्क माइली सायरस के सेक्सी डांस के एक स्टेप का नाम है। बिंगवाय यानी अधिक समय तक टीवी देखना। इन दोनों शब्दों के साथ लड़ाई में ‘सेल्फी’  जीत गया। इस शब्द का समावेश अभी ऑक्सफोर्ड की ऑनलाइन डिक्शनरी में दिखाई नहीं दे रहा है, शायद कुछ समय बाद दिखाई देने लगे। 
पिछले साल का विजेता शब्द था ओम्नीशैबल्स
वष 2012 में ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईयर के रूप में जिस शब्द का चयन किया गया वह शब्द था ओम्नीशैबल्स। इस शब्द का अर्थ होता है ऐसी स्थिति, जिसमें कुछ भी सच्चई नहीं, शुरू से आखिर तक गड़बड़झाला। ए सिचुएशन विचइज सेम्बोलिक फ्राम एवरी पॉसिबल ऐंगल मिन्स ओम्नीशैबल्स। यह शब्द सबसे पहले 2009 में बीबीसी के पॉलिटिक्स सटायर के कार्यक्रम ‘द थिंक ऑफ इट’ में प्रयुक्त किया गया था। उसके बाद तो यह शब्द बोलचाल की भाषा में ही शामिल हो गया। ब्रिटिश पार्लियामेंट में विपक्ष के नेता एड मिलिबेड ने संसद की कार्यवाही के दौरान ओम्नीशैबल्स शब्द का इस्तेमाल किया था। इसे संसद के मिनिट्स में भी शामिल कर लिया गया। इसके बाद तो सरकार पर आरोप लगाने और उसकी बुराई करने के लिए यह शब्द खूब लोकप्रिय हुआ। इतना ही नहीं, इस शब्द को जोड़कर नए शब्द भी बनने लगे।  रोम की प्रेसिडेंट के चुनाव अमेरिका के मिट रोम प्रत्याशी थे, इस दौरान वे लंदन गए, तब उन्होंने आम सभाओं में कई तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया, इन सभी को रोम्नीशैवल्स के रूप में आज भी जाना जाता है। 2012 में कई अन्य शब्द भी स्पर्धा में थे। इसमें यूरोगेडॉन, ममीपोर्न, ग्रीन ऑन ब्ल्यू, गेम्समेकर, सेकंड स्क्रिनिंग आदि शामिल हैं। यूरोजोन को यूरोगेडोन कहा जाता है। यह शब्द 50 शेड्स नाम किताब से लिया गया। लंदन ओलिम्पिक वालेंटियर के रूप में काम करने वाले लड़कों-लड़कियों के लिए गेम्स मेकर जैसा शब्द काम में लाया गया। सेकंड स्क्रिनिंग शब्द का मतलब होता है टीवी देखते-देखते मोबाइल या टेबलेट का इस्तेमाल करना।
अंगरेजी के अन्य शब्दों की रोचक बातें
फेसबुक और दूसरे अन्य मीडिया साइट्स से किसी को हटा दिया जाता है, तो उसे हमें कहते हैं कि मैंने आपको अनफ्रेंड कर दिया। यह अनफ्रेंड शब्द भी बहुत पुराना नहीं है। 2009 में ऑक्सफोर्ड वर्ल्ड ऑफ द ईयर के रूप में इस शब्द का चयन किया गया था। उस समय डिक्शनरी में साइंटिस्ट क्रिस्टन लिंडबर्ग ने कहा था कि शब्द की दृष्टि से अनफ्रेंड शब्द धारदार है। हाल में हलो शब्द पर जो शोध सामने आया है, वह भी बहुत ही मजेदार है। हलो ग्राहम बेल की गर्लफेंड का नाम था, जब उन्होंने टेलिफोन का अविष्कार किया, तो सबसे पहले इसी शब्द का इस्तेमाल किया। आज यह शब्द सबसे अधिक बोला जाता है। हलो के बाद सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है ओ के। इस शब्द के बारे में यह कहा जाता है कि अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति एण्ड्रुज जेक्शन आल करेक्ट शब्द को संक्षिप्त रूप में ओके कहते। तभी से इस शब्द का प्रचलन शुरू हुआ। इस शब्द को लेकर अन्य कई कहानियां भी प्रचलित हैं। कहते है कि अमेरिका के रेल्वे स्टेशन में काम करने वाला एक क्लर्क ओबडिया केली सभी पार्सल की जांच के बाद अपने ही नाम का संक्षिप्त रूप ओके लिख देता था। इससे यह शब्द काफी प्रचलित हुआ। कई लोग इस शब्द को रेड इंडियन की देन मानते हैं।
इस तरह से देखा जाए, तो शब्दों की अपनी अलग ही दुनिया है, जहां वे प्रचलित होकर घिसते-पीसते हुए रसातल में समा भी जाते हैं। कुछ शब्द अमर हो जाते हैं। इसके पीछे किसी व्यक्ति विशेष का आग्रह भी हो सकता है। कुछ लोगों के तकिया कलाम भी नए शब्दों को जन्म देते हैं। पर सच तो यह है कि जहां शब्द हमें बेधकर रख देते हैं, वहीं यह राहत पहुंचाने वाले भी होते हैं। हर शब्द अपने आप में एक मुहावरा है। एक शब्द से युद्ध और शांति का सबक मिल सकता है। इसलिए इसका उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाए, तो ही बेहतर।
डॉ. महेश परिमल 

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

‘छिलपे’ का महत्व


डॉ. महेश परिमल
कुछ दिनों पहले ही पड़ोस के घर में बढ़ई ने कुछ काम किया। तब वहां कचरे के
रूप में ‘छिलपा’ दिखाई दिया। साथियों के लिए यह कुछ नया नाम हो सकता है।
लकड़ी पर जब रंदा चलता है, तो लकड़ी का जो ऊपरी भाग निकलता है, उसे ‘छिलपा’
कहा जाता है। छिलपा मुझे अतीत में झांकने के लिए विवश कर देता है। पिताजी
बढ़ई थे, घर पर भी कभी-कभी कुछ काम कर ही लेते थे। अतएव ‘छिलपा’ निकलता ही
था। यह ‘छिलपा’ हमारे कई काम आता। कई बार तो इसकी डिजाइन इतनी सुंदर होती
कि उससे कुछ आर्ट भी तैयार हो जाता। जिस तरह से शार्पनर से पेंसिल छिलते
हुए जो छिलन निकलती है, बच्चे उस पर फेविकोल लगाकर कुछ आकृति बनाते हैं,
ठीक उसी तरह उन छिलको से हम भाई-बहन भी कुछ न कुछ बना ही लेते थे। यही
नहीं, ‘छिलपा’ अन्य कई काम भी आता। चूल्हे पर लकड़ी जलाने के पहले उसे भी
साथ जलाया जाता। ‘छिलपा’  जल्दी जलता, इससे लकड़ी आग जल्दी पकड़ती।

‘छिलपा’ हम भाई-बहनों के जीवन से जुड़ा हुआ है। अनजाने में वह हमें यह
प्रेरणा देता है कि लकड़ी पर रंदा जितना अधिक चलेगा, उससे न केवल लकड़ी
चिकनी होगी, बल्कि ‘छिलपा’ भी उतना ही साफ-सुथरा निकलेगा। यानी जीवन में
जितना अधिक संघर्ष होगा, जीवन उतना ही चमकदार बनेगा। यह तय है। अब जीवन
के चमकदार बनने से क्या होगा? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि
चमकदार जीवन आखिर किसके लिए प्रेरणास्पद होगा? इसे समझने के लिए हमें
लकड़ी की तासीर समझनी होगी। लकड़ी के फर्नीचर कितने सुंदर दिखाई देते हैं?
बरसों-बरस तक वैसे ही बने रहते हैं। उनमें ज़रा भी परिवर्तन दिखाई नहीं
देता। कभी गंदे दिखाई दें, तो गीले कपड़े से पोंछ देने पर वह फिर चमकदार
बन जाता है। इसके पीछे लकड़ी पर रंदे का चलना ही पर्याप्त नहीं होता, उस
पर पॉलिश की जाती है। जिससे उसकी चमक बढ़ जाती है।
‘छिलपा’ इसे हम लकड़ी की चमड़ी कह सकते हैं। चमड़ी निकलती जाती है, लकड़ी
निखरती जाती है। जिस तरह से साँप की केंचुल निकलती है। ठीक उसी तरह मानव
अपनी बुरी आदतों को छोड़ता जाए, तो उसे इंसान बनने में देर नहीं लगेगी।
वास्तव में इंसान यदि सुधरना चाहे, तो उसकी प्रत्येक गलती ही उसे सुधार
सकती है। ‘छिलपा’ तो एक प्रतीक है। सफाई का, गरीबों के ईंधन का। उनका
चूल्हा इसी से जलता है। आजकल लकड़ियां मिलती कहां हैं? वैसे तो ‘छिलपा’ भी
नहीं मिलता। पहले बढ़ई लोगों से ‘छिलपा’ ले जाने के लिए कहते थे, आज उसे
ही बेचते हैं। पहले जो उनके लिए कचरा था, आज आय का साधन है। गरीबी में जो
चीजें गरीब को अनायास मिल जाती थीं, आज उसी के लिए उसे मशक्कत करनी पड़ती
है। उसके लिए दाम देने होते हैं। गरीब को हर चीज के लिए दाम देने होते
हैं, पर जब बात गरीब को दाम देने की होती है, तो हर कोई यही चाहता है कि
उसे कम से कम दाम देना पड़े। कैसा अर्थशास्त्र है यह? गरीब पर ऊंगली उठने
में देर नहीं लगती। मानों उसे ईमानदारी से जीना आता ही नहीं। पर अमीर यह
भूल जाते हैं कि गरीब के बिना उनका जीवन संभव ही नहीं। ‘छिलपा’ गरीबी का
प्रतीक भले ही हो, पर उसमें स्वाभिमान की झलक दिखाई देती है। गरीब का
चूल्हा ही नहीं जलाता ‘छिलपा’, बल्कि गरीब के पेट की आग बुझाने में भी
सहायक होता है। हम सब ‘छिलपे’ में अपने स्वर्गीय पिता के परिश्रम के रूप
में देखते हैं। पिता से यही सीख मिली है, जो आज तक काम आ रही है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

कुछ चिंतन

हमारी वनश्री
वनश्री का आशय होता है वनलक्ष्मी यानी वन संपदा। किसी भी देश के वन हों, सभी वन संपदा से परिपूर्ण होते हैं। ऐसा कोई वन होता ही नहीं, जहाँ वन संपदा न हो। वन का दूसरा आशय हरियाली भी है। भला किसे अच्छी नहीं लगती, हरी-हरी वसुंधरा, यहाँ से वहाँ तक हरितिमा की फैली हुई चादर, आँखों को राहत देने वाले लुभावने दृश्य। जब भी हम प्रकृति के संग होते हैं, एक अजीब सी राहत महसूस करते हैं। हमें ऐसा लगता है, जैसे हम प्रकृति की गोद में हैं। जहाँ वह हमें माँ की तरह दुलार कर रही है। प्रकृति की इस रंगत को वनों से सहारा दिया है। जहाँ वन होंगे, वहाँ भूमि का कटाव नहीं होगा। वहाँ सघन पेड़ होंगे। यही सघन पेड़ बादलों को लुभाते हैं और बारिश के लिए लालायित करते हैं। इसलिए यह पर्यावरण बचाना है, तो वनों को संरक्षित रखना होगा। वन सुरक्षित रहेंगे, तभी हमारी वन संपदाएँ भी सुरक्षित रहेंगी। वन संपदाओं पर ही मानव स्वास्थ्य निर्भर है।
वनों से हमें शुद्ध वायु ही नहीं, बल्कि कई जड़ी-बूटियाँ भी प्राप्त होती हैं। पूरा आयुर्वेद वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों पर आश्रित है। हमारे देश के वनों में वन संपदा के रूप में प्रचूर मात्रा में जड़ी-बूटियाँ हैं। इसी से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।् हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वनों में वायु होती है, यही वायु हमारी आयु में वृद्धि करती है। आज लोगों को स्वच्छ वायु ही नही मिल रही है, ऐसे में वन हमारे लिए बहुत ही आवश्यक हो जाते हैं। वन संपदा का संरक्षण एक समस्या है, क्योंकि लगातार घटते वन क्षेत्रों के कारण वन संपदा का भी दोहन हो रहा है। वनों को लेकर हमारी आवश्यकताएँ बढ़ रहीं हैं, इसलिए वन संपदा की रक्षा के लिए अधिक से अधिक पौधरोपण करना आज की महती आवश्यकता है। वन रहेंगे, तभी मानव जीवन संभव है। बिना वनों के मानव जीवन की कल्पना करना बेमानी है। दोनों ही परस्पर निर्भर हैं। वनों को लेकर अब हमारी चिंता बढ़ी है। सरकार ने भी इस दिशा में कुछ प्रयास किए हैं, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं। वन नीति के सख्ती से अमल में लाए जाने के कारण बन संपदा के दोहन पर रोक लगी है। यही नहीं औषधीय पौधों के संरक्षण और नए पौधे उगाने की दिशा में भी सार्थक प्रयास हो रहे हैं।
दुनिया भर में जंगलों की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल करने वाली नई तकनीक से पता चलता है कि भविष्य में वनों की हालत को लेकर जो चिंता जताई गई है, स्थिति उतनी भी ख़राब नज़र नहीं आती है। शोधकर्ताओं के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने कहा है कि उन्होंने जंगलों की पहचान के बारे में जो अध्ययन किया है उससे पता चलता है कि दुनिया भर में वनों की कमी वाली स्थिति से बेहतरी की तरफ अब कोई पड़ाव नजर आने वाला है। इस अध्ययन में दुनिया भर में लकड़ियों के भंडार और वन संपदा का अनुमान लगाने की कोशिश की गई है यानी अध्ययन में सिफऱ् उस इलाक़ों का अध्ययन भर ही नहीं किया गया जो पेड़ों से ढँके हुए हैं। इस अध्ययन के परिणाम अमरीकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल एकैडेमी ऑफ़ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं।
वनों को लेकर हमें अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। वन से हम जब भी कुद लें, तो उसे कुछ देने के बारे में भी सोचें। निश्चित रूप से वन को हम जो कुछ भी देंगे, वह दोगना होकर हमें मिलेगा। तपती गर्मी में किसी घने पेड़ की छाया मानव को जो राहत देती है, वह किसी संपदा से कम नहीं होती। वनों के आसपास निवास करने वाले आदिवासी वनों पर ही आश्रित होते हैं। कई मामलों में ये वन की रक्षा भी करते हैं। वनों से प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटियों का इन्हें ज्ञान होता है। अपना घरेलू इलाज वे वनों से प्राप्त औषधियों से ही कर लेते है।
अंत में यही कि जिस तरह से हम लक्ष्मी को लुभाने का यथासंभव प्रयास करते हैं। ठीक उसी तरह हमें हमारी वनश्री को भी बचाए रखने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।  वनों को नष्ट करने की हर कोशिश को नाकाम करें। तभी बच पाएगी हमारी वनश्री।

पानी को पानीदार रखें
देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसे प्रकृति उसके लायक पानी न देती हो, लेकिन आज दो घरों, दो गांवों, दो शहरों, दो राज्यों और दो देशों के बीच भी पानी को लेकर एक न एक लड़ाई हर जगह मिलेगी। मौसम विशेषज्ञ बताते हैं कि देश को हर साल मानसून का पानी निश्चित मात्रा में नहीं मिलता, उसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि प्रकृति पानी बांटने वाली पनिहारिन नहीं है। तीसरी-चौथी कक्षा से हम सब जलचR पढ़ते हैं। अरब सागर से कैसे भाप बनती है, कितनी बड़ी मात्रा में वह ‘नौतपा’ के दिनों में कैसे आती है, कैसे मानसून की हवाएं बादलों को पश्चिम से, पूरब से उठाकर हिमालय तक ला जगह-जगह पानी गिराती हैं, हमारा साधारण किसान भी जानता है। ऐसी बड़ी, दिव्य व्यवस्था में प्रकृति को मानक ढंग से पानी गिराने की परवाह नहीं रहती। फिर भी आप पाएंगे कि एकरूपता बनी रहती है। हमने विकास की दौड़ में सब जगह एक सी आदतों का संसार रच दिया है, पानी की एक जैसी खर्चीली मांग करने वाली जीवनशैली को आदर्श मान लिया है। अब सबको एक जैसी मात्रा में पानी चाहिए और जब नहीं मिल पाता तो हम सारा दोष प्रकृति पर, नदियों पर थोप देते हैं।
जल संकट प्राय: गर्मियों में आता था, अब वर्ष भर बना रहता है। ठंड के दिनों में भी शहरों में लोग नल निचोड़ते मिल जाएंगे। इस बीच कुछ हज़ार करोड़ रुपए खर्च करके जलसंग्रह, पानी-रोको, जैसी कई योजनाएं सामने आई हैं। वाटरशेड डेवलपमेंट अनेक सरकारों और सामाजिक संगठनों ने अपनाकर देखा है, लेकिन इसके खास परिणाम नहीं मिल पाए। हमें भूलना नहीं चाहिए कि अकाल, सूखा, पानी की किल्लत, ये सब कभी अकेले नहीं आते। अच्छे विचारों और अच्छे कामों का अभाव पहले आ जाता है। हमारी धरती सचमुच मिट्टी की एक बड़ी गुल्लक है। इसमें 100 पैसा डालेंगे तो 100 पैसा निकाल सकेंगे। लेकिन डालना बंद कर देंगे और केवल निकालते रहेंगे तो प्रकृति चिट्ठी भेजना भी बंद करेगी और सीधे-सीधे सज़ा देगी। आज यह सज़ा सब जगह कम या ज्यादा मात्रा में मिलने लगी है। पानी अभी भी हमारे लिए राशन जितना महत्वपूर्ण नहीं हो पाया है, लेकिन जब यही पानी पेट्रोल से भी महँगा मिलेगा, तब शायद हमें समझ में आएगा कि सचमुच यह पानी को हमारे चेहरे का पानी उतारने वाला सिद्ध हुआ। हमारे देखते-देखते ही पानी निजी हाथों में पहुँचने लगा। पानी का निजीकरण पहले यह बात हम सपने में भी नहीं सोच पाते थे, लेकिन आज जब सड़कों के किनारे पानी की खाली बोतलें, पॉलीथीन आदि देखते हैं, तब समझ में आता है कि यह पानी तो सचमुच कितना महँगा हो रहा है।
यह सच है कि पानी का उत्पादन कतई संभव नहीं है। कोई भी उत्पादन कार्य बिना पानी के संभव नहीं। जन्म से लेकर मृत्यु तक पानी की आवश्यकता बनी रहती है। पानी को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय वर्षा जल को रोकना। इसे रोकने के लिए पेड़ों का होना अतिआवश्यक है। जब पेड़ ही नहीं होंगे, तब पानी जमीन पर ठहर ही नहीं पाएगा। अधिक से अधिक पेड़ों का होना यानी पानी को रोककर रखना है। दूसरी ओर हमारे पूर्वजों ने जो विरासत के रूप में हमें नदी, नाले, तालाब और कुएँ दिए हैं, उन्हीं का रखरखाब यदि थोड़ी समझदारी के साथ हो, तो कोई कारण नहीं है कि पानी न ठहर पाए।
जल ही जीवन है, यह उक्ति अब पुरानी पड़ चुकी है, अब यदि यह कहा जाए कि जल बचाना ही जीवन है, तो यही सार्थक होगा। मुहावरों की भाषा में कहें तो अब हमारे चेहरें का पानी ही उतर गया है। कोई हमारे सामने प्यासा मर जाए, पर हम पानी-पानी नहीं होते। हाँ, मौका पड़ने पर हम किसी को भी पानी पिलाने से बाज नहीं आते। अब कोई चेहरा पानीदार नहीं रहा। पानी के लिए पानी उतारने का कर्म हर गली-चौराहों पर आज आम है। संवेदनाएँ पानी के मोल बिकने लगी हैं। हमारी चपेट में आने वाला अब पानी नहीं माँगता। हमारी चाहतों पर पानी फिर रहा है। पानी टूट रहा है और हम बेबस हैं।

वृक्ष बोलते हैं
सर जगदीश चंद्र बोस ने यह सिद्ध कर दिया है कि वृक्ष में भी जान होती है, वे भी सुख-दु:ख और संवेदनाओं को समझते हैं। यह भी तय हो गया कि वृक्ष इंसानों की भाषा समझते हैं। प्रयोगों से यह भी सिद्ध हो गया है कि मानव यदि रोज अपने बगीचे के पेड़-पौधों में पानी डालते हुए उनसे अच्छी-अच्छी, प्यारी-प्यारी बातें करे, तो वे उसकी बात मानते हैं। बस यह सिद्ध नहीं हो पाया है कि वृक्ष बोलते हैं। यह सिद्ध भी नहीं हो सकता, क्योंकि खामोशी की कोई आवाज नहीं होती। वृक्ष जो कुछ भी सोचते हैं, उसे हम तक पहुँचाने की पूरी कोशिश भी करते हैं। हम ही हैं, जो वृक्ष की भाषा नहीं समझ पाते। यहाँ आकर मानव पंगु बन जाता है कि जब वृक्ष हमारी भाष समझते हैं, तो मानव उनकी भाषा क्यों नहीं समझ पाता?
कभी किसी एकांत में या फिर जंगल में जाकर सुनो, एकांत का संगीत, इसी संगीत में कहीं आवाज आएगी कि कोई कुछ बोल रहा है। आवाज की गहराई पर जाकर पता चलेगा कि अरे! ये तो वृक्ष की आवाज है। कुछ समय तक लगातार इस तरह का प्रयोग जारी रहा, तब आप वृक्ष की आवाज पहचानने लग जाएँगे। तब आपको पता चलेगा कि वृक्ष आजकल दु:खी हैं। कई बार हमने पेड़ से लगातार पानी रिसते देखा होगा। लोग कहते हैं कि पेड़ रो रहा है। इसके वैज्ञानिक कारण जो भी हो, पर जब हम यह जानते हैं कि पेड़ों में जान होती है, तो फिर उनकी सारी प्रक्रियाएँ भी मानव की तरह होंगी। इसलिए जब पेड़ बोलते हैं, तब हमें उनसे बातें करनी चाहिए। आज यदि हम उनकी भाषा समझने लग जाएँ, तो उनकी पीड़ाओं को शब्द दे पाएँगे।
पेड़ उनसे सदैव प्रसन्न रहते हैं, जो प्रकृति प्रेमी होते हैं। क्योंकि यही तो हैं, जिनसे पेड़ बचे हुए हैं। पौधरोपण एक यज्ञ है, पेड़ों की संख्या बढ़ाने का। जो इस यज्ञ को करता है, वही वास्तव में पेड़ों का सच्च साथी है। अपने साथियों की लगातार कम होती संख्या से आजकल वृक्ष द़:खी हैं। देखते ही देखते उनके सामने से सागौन, बबूल, शीशम, देवदार, चीड़, आम आदि के पेड़ गायब हो गए। कुछ तो रातों-रात कट गए, कुछ बेमौते मारे गए। इनके दु:ख का कारण यही है। आलीशान घरों, हवेलियों में बनने वाले फर्नीचर के रूप में ये पेड़ ही हैं, जो हमारे सामने विभिन्न आकार में होते हैं।  कभी कुर्सी, कभी डायनिंग टेबल, कभी पलंग, कभी दीवान आदि रूप होते हैं, इन्हीं पेड़ों के। कभी हवाओं के साथ मस्ती से झूमने वाले आज यही पेड़ बंद कमरों में खामोश जिंदगी बिता रहे हैं।
यह मानव की भूख ही है, जो पेड़ों को इस तरह से बरबादी के कगार पर खड़े कर रही है। वृक्ष आज हमसे यही कह रहे हैं कि हमें मत काटो। हम आपको प्राणवायु देते हैं। यह प्राणवायु मानव कभी बना नहीं सकता। हम पर ही निर्भर है आपका जीवन। हम नहीं रहेंगे, तो खतरे में पड़ जाएगा मानव जीवन। हम जब मानव से कुछ नहीं लेते, तब फिर मानव हमारा नाश क्यों करना चाहता है? थोड़ी-सी सुख-शांति के लिए मानव हमारा ही नाश कर रहा है। हमारा उद्देश्य ही है मानव जीवन के लिए काम आना। पर आज मानव तेजी से हमारा ही नाश कर रहा है। इसे मानव ही रोक पाएगा। यदि उसमें वसुधवकुटुम्बकम् की भावना है, तो उसे हमारा संरक्षण करना ही होगा। इस तरह से वह हमारा नहीं अपना ही संरक्षण करेगा। हम मानव जाति के दुश्मन नहीं है, हमारी रक्षा से मानव की रक्षा है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 6 सितंबर 2014

जहर परोसती पाठ्यपुस्तकें

डॉ. महेश परिमल
इन दिनों पाठ्य पुस्तकों में कुछ ऐसा लिखा जा रहा है, जिससे बच्चे दिग्भ्रमित हो रहे हैं। उन्हें पालकों ने अब तो जो भी बताया, पाठ्य पुस्तकें उसे गलत बता रही हैं। बालपन में इस तरह की दिग्भ्रमण की स्थिति उनके मानसिक विकास को प्रभावित करती है। सरकार बदलने के साथ ही पाठ्य पुस्तकों में भी बदलाव लाया जाता है। पुस्तकों में यह बताया जाता है कि किन विद्वानों ने इसे तैयार करने में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहयोग प्रदान किया है। पर किताबें जब बाहर आती हैं, तब ऐसा नहीं लगता है कि ये किताबें विद्वानों की नजर से भी गुजरी हैं। किताबों का लेखन एक अलग ही विषय है, पर जब उसे बच्चों को पढ़ाया जाता है, तब उसमें निहित गलत जानकारी बच्चों के बालसुलभ मन में विकृतियां पैदा करती हैं। हाल ही में यह खबर आई है कि पश्चिम बंगाल में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है कि खुदीराम बोस आतंकवादी थे। बंगाल की पावन भूमि, जिसे रत्न प्रसविनी भी कहा जा सकता है, वहां के क्रांतिकारी को यदि आतंकवादी बताया जाए, तो यह पूरी बंगाल की विद्वता पर सवाल खड़े करता है। विद्वानों की भूमि से इस तरह का संदेश जा रहा है, यह देश के लिए खतरनाक है, साथ ही बच्चों के भविष्य के लिए उउसे भी अधिक खतरनाक है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पूरे भारत में पाठ्यपुस्तकों की संरचना विदेशी एजेंसियों की गाइड लाइन के अनुसार तैयार होती है। अंग्रेज भारत से चले गए, पर हमारी शिक्षा आज भी उनकी गुलाम है। इसका उदाहरण यही है कि हमने आज तक ऐसी शिक्षा नीति ही तैयार नहीं की, जिससे युवा आत्मनिर्भर बनें। यही कारण है कि आज नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) नाम की सरकारी एजेंसी द्वारा पहली से बारहवीं कक्षा के लिए जो पाठ्य पुस्तकें तैयार की गई हैं, उसमें यह पढ़ाया जा रहा है:-
-भगवान महावीर 12 वर्ष तक जंगल में भटकते रहे, इस दौरान उन्होंने कभी स्नान भी नहीं किया और न ही अपने कपड़े बदले।
-सिखों के गुरु तेगबहादुर आतंकवादी थे और लूटपाट करते थे।
-श्रीराम और श्रीकृष्ण हिंदुओं की कथाओं के हीरो हैं, इनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।
-सिखों के गुरु गोविंद सिंह मुगलों के दरबार में मुजरा करते थे।
-औरंगजेब जिंदाबाबा (पीर) था।
-लोकमान्य तिलक, बिपीन चंद्र पॉल, वीर सावकरकर, लाला लाजपतराय और अरविंद घोष चरमपंथी नेता थे।
-मां दुर्गा तामसिक प्रवृत्ति की देवी थी, वे शराब के नशे में चूर रहती थी, इसलिए उनकी आंखें हमेशा रक्तरंजित रहती थीं।
-प्राचीन काल में भारत की स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था, वे धार्मिक क्रियाओं में भी शामिल नहीं हो सकती थीं।
- आर्य भारत के मूल निवासी नहीं, पर मुस्लिम और ईसाई भी बाहर से आए हैं।
ये सभी बातें कपोल-कल्पित हैं और वह जैन, सिख और वैदिक धर्म के बाद भारत की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों के लिए भी अपमानजनक है। प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में आज की तारीख में भी विद्यार्थियों को जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसमें निम्नलिखित विकृत और कपोल-कल्पित बातों को भी पढ़ाया जाता है:-
-गांधीजी का धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का कोई मनोवैज्ञानिक आधार नहीं था। रामराज्य के रूप में स्वराज्य की उनकी व्याख्या भारत के मुस्लिमों को उत्साहित नहीं कर पाई।
-सरदार पटेल आरएसएस का साथ देकर सांप्रदायिकता को बढ़ाने में शर्मनाक भूमिका निभाई थी।
-हनुमान एक छोटा सा वानर था, वह कामुक व्यक्ति था, लंका के घरों का शयन कक्ष देखा करता था।
- ऋग्वेद में कहा गया है कि स्त्री का स्नान कुत्ते के समान है।
-स्त्रियों का एक वस्तु समझा जाता था, उसे खरीदा जा सकता था और बेचा भी जा सकता था।
इस प्रकार की विकृत मानसिकता को दर्शाने वाले तथ्य असावधानीवश पाठ्य पुस्तकों में शामिल नहीं किए गए हैं, इसे जानबूझकर पाठ्य पुस्तकों में शामिल गया है। ताकि देश का भविष्य हमारे क्रांतिकारी नेताओं, महापुरुषों आदि के बारे में अपने विचार हल्के रखें। इससे वे अपने धर्म-संस्कृति से विमुख होकर दूसरे धर्मो की तरफ आकर्षित हो। मेकाले का भी यही उद्देश्य था कि उनकी पद्धति के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने वाले हमेशा अंग्रेजों के गुलाम बनें रहें। वह सब कुछ इस तरह के विकृत तथ्यों वाली किताबों के माध्यम से ही हो सकता है। देश में जब अंग्रेजों का राज था, तब हमारी संस्कृति में सतियों की पूजा करना और बाल विवाह आम बात थी। इसके खिलाफ राजा राममोहन राय ने एक अभियान चलाया। उनके इसी अभियान के कारण ही लॉर्ड बेंटिक ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। आज शालाओं में पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से जो कुछ पढ़ाया जा रहा है, उसमें राजा राममोहन राय की प्रशंसा की जा रही है, पर उन्होंने भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने की कोशिश् की थी, यह नहीं पढ़ाया जाता।
वेस्ट बंगाल में आठवीं कक्षा के बच्चे देश के लिए जान देने वाले नौजवानों को आतंकवादियों के रूप में देख रहे है। दरअसल आठवीं कक्षा की इतिहास की किताबों में खुदीराम बोस, प्रफुल्ला चाकी और जतींद्र मुखर्जी जैसे अमर शहीदों को रिवॉल्यूश्नरी टेररिज्म चैप्टर के अंदर जगह मिली है। अगर रिवॉल्यूश्नरी टेरेरिज्म पाठ को हिंदी में अनुवाद किया जाए तो यह क्रांतिकारी आतंकवाद कहलाता है. क्या कहना है इतिहासकारों का। पश्चिम बंगाल सरकार के इस कदम की देश के प्रमुख इतिहासकारों ने घोर भत्र्सना की है। इतिहासकारों के अनुसार यह तथ्य ब्रिटिश शासन के हिंदुस्तानी Rांतिकारियों के प्रति रवैए को मान्यता देता है. गौरतलब है कि ब्रिटिश शासन ने हिंदुस्तानी देशभक्तों को आतंकवादी कहा था. इसके साथ ही इतिहासकारों ने कहा है कि अगर खुदीराम बोस एक क्रांतिकारी आतंकवादी हैं तो राज्य सरकार सुभाषचंद्र बोस को सरकार किस शब्द से पुकारेंगे? इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को पाठ्यपुस्तकों में शब्दों का चुनाव काफी देख समझ कर करना चाहिए. यहां पर यह बात भी देखने लायक है कि ममता बनर्जी ने सत्ता संभालने के 10 महीने के अंदर ही हायर सेकेंडरी एजुकेशन के पाठ्य क्रम से कार्ल मार्क्‍स से संबंधित पाठ हटवा दिए थे। समझ में नहीं आता कि बात-बात पर ब्रेंकिंग न्यूज देने वाला मीडिया इस बात को क्यों नही उठाता? इन विकृत तथ्यों का विरोध होना चाहिए। जन आंदोलन होने चाहिए, तभी हमारी भावी पीढ़ी बच पाएगी। अभी गुजरात की 42 हजार शालाओं में दीनानाथ बत्रा की 7 पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं। जब इन किताबों की खरीदी हुई, तो कई लोगों को झटका लगा। वे यह प्रचार करने लगे कि यदि विद्यार्थियों ने इन किताबों को पढ़ा, तो वे अंधश्रद्धा और वहम के कायल हो जाएंगे। वास्तविकता यह है कि दीनानाथ बत्रा की किताबें भारतीय संस्कृति कितनी भव्य और महान है, बच्चे इसे पढ़कर अपने जीवन में किस तरह का बोधपाठ ले सकते हैं, इसका वर्णन बहुत ही सरल भाषा में किया गया है।
1947 में जब देश आजाद हुआ, तब से लेकर अब तक शालाओं में अंग्रेजों और उनके चमचों द्वारा तैयार किया गया इतिहास ही पढ़ाया गया है। यह इतिहास अनेक विकृतियों से भरा पड़ा है। कई बार पाठ्य पुस्तकों के गलत और विकृत तथ्य हमारे सामने आते हैं, पर कुछ दिनों बाद सब कुछ भूला दिया जाता है। आखिर इस दिशा में मीडिया सचेत क्यों नहीं होता। यह भी एक तरह का अपराध ही है, जो बच्चों में देश के प्रति नफरत के बीज बो रहा है। यह सब कुछ एक सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। इस पर अंकुश आवश्यक है। अन्यथा संभव है बच्चों के मन में बचपन से ही देश के प्रति दुराग्रह फैल जाए और वह अपनी मातृभूमि को ही हर बात पर कोसने लगे?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 29 मई 2014

अब मोदी की रोज होगी परीक्षा

डॉ. महेश परिमल
मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण के साथ ही काम करना शुरू कर दिया है। अब यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनके सामने किस तरह की चुनौतियां हैं। वे उसका मुकाबला किस तरह से करेंगे। पर सच तो यह है कि अनेक चुनौतियों के साथ-साथ पूरा रास्ता अग्निपथ की तरह है। जहां कदम-कदम पर अंगारे दहक रहे हैं, पूरा रास्ता फिसलन भरा है। लोग ताकते बैठे हैं कि कब कौन-सा कदम गलत उठे, तो वे टोक सकें। आक्षेप लगा सकें। आरोपों के कठघरे में खड़ा कर सकें। अब तक जनसभाओं में प्रधानमंत्री बहुत बोले, पर अब उन्हें कम बोलकर काम अधिक कर दिखाना होगा। तभी उनका व्यक्तित्व निखरकर सामने आ पाएगा। वैसे लोगों ने उन पर पूरा भरोसा किया है, पर सभी जानते हैं कि भरोसा जीतने में काफी वक्त लगता है, पर खोने में कुछ पल। इसलिएा प्रधानमंत्री एवं उनके मंत्रिमंडल के साथियों के शपथ ग्रहण समारोह में देश-विदेश के अनेक लोगों ने अपनी उपस्थिति देकर स्वयं को गौरवान्वित समझा। मोदी मंत्रिमंडल ने अपना काम शुरू कर दिया है। अब तक मोदी एक राज्य को चलाते थे, अब उनके सामने पूरा देश है। देश ही नहीं विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश को चलाने की जिम्मेदारी है। लोगों ने उनसे काफी अपेक्षाएं पाल रखी हैं, इसलिए उनके एक-एक कदम की समीक्षा होगी।
आज मोदी के सामने सबसे बड़ी समस्या आर्थिक क्षेत्र की है। दूसरी है विदेशी मामलों की। तीसरी है सुरक्षा और चौथी उत्तर-पूर्व के राज्यों की समस्या। पांचवें क्रम में है आंतरिक सुरक्षा और छठी है कुछ नया कर दिखाने की। रोटी-कपड़ा-मकान और बिजली आदि आर्थिक क्षेत्र की समस्याओं में समाहित की जा सकती है। सबसे पहले बात आर्थिक क्षेत्र की, तो मोदी ने गुजरात और मध्यप्रदेश में सफल रूप से बनाई गई ज्योतिग्राम योजना को देश भर में लागू करनी होगी। दाल और तिलहन के समर्थन मूल्यों पर विचार करना होगा। चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी ने कई बार गेहूं की आयात-निर्यात नीति आदि पर अपने विचार व्यक्त किए। अब वे सत्ता पर काबिज हैं, तो अपने आइडियों को अमल में लाना चाहिए। फारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट भी एक सुलगता प्रश्न है। सरकारी सस्ते अनाज की दुकानों की बदहाली पर भी उन्हें विचार करना होगा। विदेशी मामलों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। पिछले दस वर्षो से यूपीए शासन के दौरान विदेश नीति में काफी खोट थी। चीन के साथ व्यवसाय, आंतरिक-बाहरी सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ डांवाडोल संबंध, पाकिस्तान की बार-बार बदनामी, पाक प्रेरित आतंकवाद आदि के संबंध में नए सिरे से विदेश नीति तैयार करनी होगी। शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों को आमंत्रित कर भारत ने चीन को यह संकेत दे दिया है कि भारत एक परिवर्तन के मोड़ पर है। अमेरिका के साथ भी कड़ा व्यवहार दर्शाना होगा। अमेरिका में अवैधानिक रूप से रहने वाले गुजरातियों को स्थायी करने का काम हाथ में लेना होगा। दस वर्ष पहले एनडीए शासन में केपिटल गुड्स का आयात दस अरब डॉलर का था, जो यूपीए सरकार के दस वर्ष के शासन में 587 अरब डॉलर पर पहुंच गया। फ्रेंडली इंडस्ट्रियल पॉलिसी तैयार करनी होगी। कोल इंडिया जैसी अनेक निजी क्षेत्र की कंपनियों को और अधिक व्यावसायिक बनाना होगा। 2014 का फोब्र्स की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय विद्यार्थी जब विदेश पढ़ने जाते हैं, तब उन पर 27 हजार करोड़ का खर्च होता है, इस खर्च की जीडीपी पर मामूली असर होता है। उद्योगों के लिए अटकी हुई फाइलों की भी समीक्षा करनी होगी।
सुरक्षा के क्षेत्र में कहा जाता है कि भारतीय सेना महत्वपूर्ण हथियारों की कमी से जूझ रही है। 155 एम अल्ट्रा लाइट वेट फिल्ड होवीत्जर और लाइट यूटीलिटी हेलिकाप्टर आदि के बिना अधिक समय तक नहीं रहा जा सकता। भारत में ही ये शस्त्र बनाए जाए, इसकी तैयारी करनी होगी। शस्त्रों की आयात नीति को विदेशी नीति के साथ जोड़ना होगा। ऐसा हमारे विशेषज्ञ मानते हें। ये सारे बातें तो रुटीन की है। पर मोदी को कुछ ऐसा नया कर दिखाना होगा, जिसमें लोगों की दिलचस्पी हो। यह भी सच है कि मोदी के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि जिसे घुमाते ही परिवर्तन दिखाई देने लगे। लोगों की यह अपेक्षा है कि यूपीए सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले नरेंद्र मोदी के सामने चुनौतियों के अभी कई गड्ढे और कई पर्वत हैें। अभी कई जम्प आने हैं। उन्हें देश की राजनीति के बदले विदेशी मामलों की राजनीति पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। कितने ही समीक्षक यह मानते हैं कि सीएम से पीएम की दिशा में टर्न लेना बहुत ही मुश्किल है। मोदी ने गुजरात में जिस तरह से स्व केंद्र शासन चलाया, वैसा शासन चलाना केंद्र शासन में संभव ही नहीं है। सबको साथ लेकर चलने की बात कहना आसान है, पर उसे अमल में लाना बहुत ही मुश्किल है। अब मोदी को यह पता चल जाना चाहिए कि ह्यूमन हेप्पीनेस अर्थात सभी के जीवन में खुशहाली हमेशा कायम रहे, वैसे प्रयास किए जाने चाहिए। यह तब संभव है, जब लोगों को सरकार द्वारा लिए गए निर्णय का सीधा असर उनकी निजी जिंदगी पर पड़े।
जो भी हो, पर सच यही है कि भाजपा को इस बार अपेक्षाओं के वोट मिले हैं। लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को नहीं देखा, उन्होंने केवल नरेंद्र मोदी को ही देखा। उन्हीं को वोट दिया। तीस वर्ष बाद देश गठबंधन की राजनीति से मुक्त हुआ है। इसका श्रेय मतदाता को दिया जाना चाहिए। वह भी आजिज आ चुका था, गठबंधन की राजनीति से। क्षेत्रीय दल अब तक देश के विकास में रोड़ा ही अटकाते रहे हैं। कई बार तो सीधी ब्लेकमेलिंग ही दिखाई दी है। ममता और जया तो इसी में महारत हासिल कर चुकी हैं। इसलिए लोगों ने इस बार भाजपा को गठबंधन की राजनीति से दूर रखा है, ताकि देश का संपूर्ण विकास हो। बिना किसी मजबूरी के सरकार अपने ठोस निर्णय ले सके। इन पूरी अपेक्षाओं के केंद्र में केवल नरेंद्र मोदी ही हैं।
  डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 12 मार्च 2014

प्रत्याशी चयन बनाम आग का दरिया

डॉ. महेश परिमल
लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। इसी के साथ शुरू हो गई है, टिकटों के लिए रस्साकशी,मतभेद और विवाद। वास्तव में प्रत्याशियों का चयन एक अग्निपरीक्षा ही है, जिसमें अपनों के आक्षेपों एवं कटाक्षों को सुनना पड़ता है। कोई बेहद अपना थोड़ी ही देर में बेहद पराया हो जाता है। बरसों तक पार्टी के लिए समर्पित एक कार्यकर्ता केवल टिकट न मिलने या मिल जाने के बाद कटने से वह जिस तरह से बिखर जाता है, उससे उसकी मानसिक स्थिति का पता चलता है। कई बार हालात इतने अधिक बेकाबू हो जाते हैं कि पार्टी प्रमुख को भी कुछ सोचने के लिए विवश कर देते हैं। टिकट वितरण का कार्य तलवार की तीखी धार पर चलने जैसा है। हर किसी को टिकट की आस होती है। पर मिलता उसे ही है, जो रसूखदार होता है। कई बार उपेक्षा का शिकार सही प्रत्याशी टिकट न मिलने के कारण निर्दलीय खड़ा हो जाता है और जीतकर दिखाता है। इससे यह संदेश जाता है कि कई बार पार्टी प्रमुख भी टिकट देने में पक्षपात करते हैं। अपने चहेतों को आगे बढ़ाने के चक्कर में वे अपनी एक सीट ही खो देते हैं। इसलिए सही प्रत्याशियों का चयन एक ऐसी परीक्षा है, जिसमें सभी उत्तीर्ण नहीं होते।
लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही प्रत्याशियों के चयन का सिलसिला शुरू हो गया है। सभी दल हर स्तर पर अपने प्रत्याशियों की सूची जारी कर रहे हैं। प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया में इतनी अधिक सावधानी बरती जा रही है कि किसी को भी कानो-कान खबर न हो और प्रत्याशी की घोषणा हो जाए। उसके बाद भी विवाद और मतभेदों को नहीं रोका जा सकता। इस समय आम आदमी पार्टी भी लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोंक चुकी है। दिल्ली विधानसभा में इस पार्टी को मिली सफलता से हर कोई हैरत में था। अब भले ही उसकी लोकप्रियता में कमी आ गई हो, पर उनका खौफ बरकरार है। स पार्टी ने अभी यह तय नहीं किया है कि कौन व्यक्ति किस सीट का प्रत्याशी होगा। अभी तक उसने अपने सौ प्रत्याशियों की सूची जारी की है। अगले सप्ताह तक सभी दल अपने-अपने प्रत्याशी घोषित कर देंगे। अभी प्रादेशिक दलों के प्रत्याशियों के लिए कशमकश जारी है। लालू यादव ने अपने बेटी और पत्नी को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। कुछ दल भले ही प्रादेशिक हों, पर उसके प्रत्याशी अन्य राज्यों में भी चुनाव लड़ते हैं। इसके मद्देनजर प्रादेशिक दलों को अपने प्रत्याशी घोषित करने पर काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। क्योंकि कई बार अन्य दलों से समझौते भी होते हैं। वैसे सभी प्रादेशिक दल यही चाहते हैं कि उनके कम से कम दस प्रत्याशी तो जीत ही जाएं। ऐसी धारणा है कि दस सांसदों वाले दलों का भी रुतबा होता है, वे भी सरकार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सपा-बसपा ने अपने सांसदों के बल पर केंद्र में सरकार बनाने में मदद की और उसे काफी परेशान भी किया।
सभी दलों की यही कोशिश होती है कि उनका प्रत्याशी जीत हासिल करे। कई बार टिकट खरीदे भी जाते हैं। यदि प्रत्याशी मालदार है, तो वह वोट खरीदने की भी क्षमता रखता है, इसलिए उसे टिकट मिल जाता है। इससे कई संभावित प्रत्याशी नाराज हो जाते हैं, वे बागी हो जाते हैं। उसके बाद शुरू होता ह्रै, उन्हें मनाने का सिलसिला। प्रत्याशियों का चयन एक सरदर्द प्रक्रिया है। बड़े दलों ने अपने प्रत्याशियों की सूची पहले ही तैयार कर ली है। पर उसे घोषित करने में हिचक रहे हैं। यह भी सच है कि जिस प्रत्याशी का चयन हो, उसकी जीत सुनिश्चित हो। चयनकर्ता के पास पहले तो एक ही सीट के लिए कई प्रत्याशी होते हैं, उसके बाद उनमें से फिर चयन होता है, यह प्रक्रिया काफी समय तक चलती रहती है, आखिर में केवल दो पर आकर सिलसिला खत्म हो जाता है। इसके बाद उन दो में से एक का काफी जद्दोजहद बाद चयन होता है। जो दल केंद्र सरकार के समर्थक होते हैं, उनके प्रत्याशियों के चयन में अक्सर कोई फेरफार नहीं होता। समर्थक दल के प्रत्याशी बार-बार अपने क्षेत्र से जीतते ही रहते हैं। इसमें व्यतिक्रम नहीं आता। कई बार मतदाताओं के सामने आयातित प्रत्याशी को खड़ा कर दिया जाता है। ऐसे प्रत्याशियों को लालू यादव ‘हेलीकाप्टर ’ कहते हैं, जो ऊपर से आते हैं और ऊपर ही चले जाते हैं। कभी आम जनता या अपने संसदीय क्षेत्र में दिखाई नहीं देते। ऐसे प्रत्याशी यदि पार्टी में किसी महत्वपूर्ण पद पर होते हैं, तो उनकी जीत में कोई बाधा नहीं आती, पर क्षेत्र के लिए प्रत्याशी नया हो, तो काफी मुश्किलें आती हैं। कई बार ऐसे प्रत्याशी जीत ही नहीं पाते हैं। कई बार मतदाता अपनी समझदारी का परिचय देते हुए ऐसे आरोपित प्रत्याशियों को एक सिरे से ही नकार दते हैं। पार्टी को अपनी इस गलती का अहसास बहुत बाद में होता है।
जिन प्रत्याशियों को नागरिकों के बीच रहना आता है, वे जमीन से जुड़े होते हैं, ऐसे लोग मतदाताओं का विश्वास बहुत ही जल्द प्राप्त कर लेते हैं। पर कुछ प्रत्याशियों को मतदाता आखिर तक अपना नहीं मान पाते। राहुल गांधी और डॉ. मनमोहन को लेकर लोग ऐसा ही सोचते हैं कि वे अपने नहीं हैं, पर सोनिया गांधी को लेकर मतदाताओं में अपनापा देखा जाता है। इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए रोटी-कपड़ा और मकान का नारा दिया था, अरविंद केजरीवाल सड़क-बिजली और पानी के नारे के साथ जनता के सामने आए। रोटी-कपड़ा और मकान के नारे में इंदिरा गांधी का अनुभव काम आया। पर अरविंद केजरीवाल ज्वलंत मुद्दों के साथ भले ही सामने आएं हों, पर उनमें अनुभव की कमी के कारण उनका सड़क पर आना भी लोगों को नागवार गुजरा। जनता क्या चाहती है, उसकी नब्ज पर हाथ रखकर प्रत्याशी आगे बढ़ें, तो जीत सुनिश्चित होती है। पिछले दस वर्षो में हम सबने देखा कि इतनी अधिक चलनियों से गुजरने के बाद भी प्रत्याशी जीत तो जाते हैं, पर बाद भी उनमें सत्ता का मोह ऐसा जागता है कि वे भ्रष्टाचारी, सेक्सकांड में उलझने वाले या फिर दलाली के चक्कर में फंस जाते हैं। इससे पार्टी बदनाम होती है। कई सांसद तो संसद में प्रश्न पूछने के लिए भी रिश्वत लेते हैं। यह भी जगजाहिर हो चुका है। इसके लिए होना तो यह चाहिए कि सांसद के काम की हर साल समीक्षा होनी चाहिए। यदि इसमें वह फिट नहीं बैठते, तो पार्टी को उसके खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए, ताकि दूसरे सांसदों को सबक मिले। टिकट देने में जितनी उदारता बरती जाए, उतने ही सख्त उनके कार्यकलापों के लिए भी होना चाहिए, तभी पार्टी और उसके द्वारा चयनित प्रत्याशियों की छवि बेदाग होती है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

रोज लाखों लीटर पानी बरबाद होता है

एक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन औसतन 30 से 50 लीटर स्वच्छ तथा सुरक्षित जल की आवश्यकता होती है लेकिन 88.4 करोड़ लोगों को इस जरूरत का 10 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं मिल पाता। एक रिसर्च के मुताबिक विश्व में सिर्फ 20 प्रतिशत व्यक्तियों को ही पीने का शुद्ध पानी मिल पाता है। नदियां पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जहां एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं, वहीं कल कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाती, अधिक से अधिक लोगों को दूषित पानी पीने का समय आ सकता है। अपनी आदतों और उपयोग के तरीको के अलावा उद्योगों के चलते दुनिया में प्रतिवर्ष 1,500 घन किलोमीटर गंदा जल निकलता है। इस गंदे जल को ऊर्जा तथा सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, पर ऐसा होता नहीं है। आइए जानें हर रोज कितना पानी बरबाद कर देते हैं हम।

पानी की बरबादी
 मुंबई और दिल्ली जैसे दो महानगरों में वाहन धोने में ही प्रतिदिन 1.20 करोड़ लीटर से ज्यादा पानी खर्च हो जाता है।दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वॉल्व की ख़राबी के कारण रोज़ 17 से 44 प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पाँच मिनट में क़रीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है।
बाथ टब में नहाते समय 300 से 500 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में 100 से 150 लीटर पानी खर्च होता है।
बिन पानी सब सून
पीने के लिए मानव को प्रतिदिन तीन लीटर और पशुओं को 50 लीटर पानी चाहिए।
एक लीटर गाय का दूध पाने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है।
एक किलो गेहूं उगाने के लिए एक हज़ार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए 4 हज़ार लीटर पानी चाहिए।
भारत में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
भारतीय गावों में आज भी स्त्रियां पीने के पानी के लिए प्रतिदिन औसतन चार मील पैदल चलती है।
कहां पर कितना है पानी
पृथ्वी का 70% से अधिक हिस्सा जल से भरा है। जिस पर 1 अरब 40 घन किलो लीटर पानी है। इसका 97.3
प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष 2.7% मीठा जल है।
इस पानी का 75.2 प्रतिशत भाग ध्रुवीय क्षेत्रों में और 22.6 प्रतिशत भूमि जल के रूप में है। शेष भाग झीलों,
नदियों, कुओं, वायुमंडल में, नमी के रूप में तथा हरे पेड़-पौधों में उपस्थित होता है।
उपयोग आने वाला जल का हिस्सा थोड़ा ही है, जो नदियों, झीलों, तथा भूमि जल के रूप में मौजूद है।
उपयोगी पानी का 60 प्रतिशत हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खर्च होता है, बाकी 40 प्रतिशत हिस्सा पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं सफ़ाई में खर्च होता है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

प्रजा के मिजाज के सामने सरकार लाचार

डॉ. महेश परिमल
वास्तव में देखा जाए, तो 2013 का प्रारंभ यूपीए सरकार के लिए फ्लॉप शो साबित हुआ। दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार का मामला सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। एक तरफ बिना किसी नेतृत्व के जमा हुए आक्रोशित युवा थे, दूसरी तरफ बंधे हाथों में सरकार थी। सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी। सरकार भले ही विरोधियों के खिलाफ खुलकर सामने न पाई हो, फिर भी उसने कड़े निर्णय लेने के लिए कदम उठाया है। सरकार ने मेट्रो स्टेशन बंद करने और मीडिया को समझाने के प्रयास में सफलता पाई। प्रदर्शनकारियों को अधिक हाइलाइट न करने के लिए सरकार के मौखिक निर्देश को मीडिया ने मान भी लिया्र।
आज सरकार की हालत बहुत ही खराब है। चारों तरफ उसकी निंदा हो रही है। पिछले 15 दिनों से खासकर पिछले चार-पांच दिनों से दिल्ली में हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन से सरकार पसोपेश में है। युवाओं का गुस्सा आसमान पर है। सरकार युवाओं की बात तो मान रही थी, उनके प्रदर्शन को भी सही बता रही थी, फिर भी कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही है। इस दौरान सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे प्रदर्शनकारी युवाओं को किसी तरह का संतोष हो। सरकार तो संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए भी राजी नहीं हो पाई है। एक तरफ तो यही सरकार फांसी न देने वाले देशों का समर्थन कर रही है। दूसरी तरफ कसाब को फांसी देने में जल्दबाजी करती है। और जब बलात्कारियों को फांसी देने के लिए कहा जाता है, तो उससे बचने की कोशिश करती है। सरकार दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को भी बदलने के लिए तैयार नहीं है। सरकार इतनी अधिक भयभीत है कि वह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी थोड़ी सी झिड़की भी नहीं दे पा रही है। पुलिस कमिश्नर संदीप दीक्षित की बदली का संकेत देकर भी वह ऐसा नहीं कर पाई। यह सरकार की विवशता है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी बलात्कारियों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग कर रहे हैं, पर सरकार इतनी भयभीत कि न तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर पा रही है और न ही कोई ऐसा निर्णय ले पा रही है, जिससे प्रदर्शनकारी संतुष्ट हो पाएं। यह सरकार का दुर्भाग्य है कि उसने जो भी काम किए, वह प्रजा की दृष्टि में पारदर्शक नहीं रहे। सरकार में इतनी हिम्मत भी नहीं है कि अपने द्वारा किए गए कार्यो को सही भी बता पाए। उसका कोई भी खुलासा जनता को रास नहीं आ रहा है। सरकार तो कसाब की फांसी में की गई जल्दबाजी में उठे सवालों का जवाब भी देने को तैयार नहीं है। केवल गुजरात चुनाव के मद्देनजर उसने वोट बटोरने के लिए यह किया, यह वह बताना नहीं चाहती, पर जनता अच्छी तरह से समझती है। इसलिए गुजरात चुनाव में उसने किस तरह से मुंह की खाई है, वह सभी जानते हैं। लोग तो यह भी कह रहे हैं कि कसाब की मौत तो डेंग्यू से ही हो गई थी, फांसी तो उसके मृत शरीर को दी गई है। सरकार पसोपेश में तो थी ही, पर सभी चाहते थे कि कसाब को फांसी पर लटकाया जाए, इसलिए यह मामला ठंडा पड़ गया। विवाद अधिक लम्बा नहीं चल पाया।
इसी तरह गेंगरेप की शिकार युवती की हालत तो दिल्ली में ही खराब हो गई थी, उसके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था, उसके बाद भी उसे सिंगापुर ले जाया गया। सरकार यह अच्छे से जानती थी कि यदि पीड़ता की मौत भारत में होती है, तो प्रदर्शनकारियों को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए उसे देर रात सिंगापुर ले जाया गया। सिंगापुर से भी पीड़िता के स्वास्थ्य के बारे में कई जानकारियां मिलती रहीं, पर उसका भी अधिक खुलासा नहीं किया गया। उसकी मौत की खबर तब सामने आई, जब लोग अहमदाबाद में हुए पाकिस्तान के खिलाफ टी-20 में भारत की जीत की खुशी में लोग झूम रहे थे। सरकार की चालाकी काम आ गई। सरकार को यह विश्वास था कि प्रदर्शनकारी अब तक ठंडे पड़ चुके होंगे, इसलिए पीड़िता की मौत की घोषणा देर रात की गई। मौत की खबर सुनते ही इंडिया गेट और जंतर-मंतर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। रविवार को दस मेट्रो स्टेशन बद होने के बाद भी लोग उमड़ पड़े। ये सभी अपनी भीगी आंखों से दामिनी या फिर निर्भया को अपनी भावभीनी श्रद्धाजंलि देने के लिए आए थे।
पिछले 15 दिनों में देश भर में बलात्कार की कई घटनाएं सामने आई। लेकिन सभी दिल्ली के गेंगरेप के मामले में फीके साबित हुए। देश में जब भी महिला सशक्तिकरण की बात भाषणों और आलेखों के माध्यम से आती है, तब लोगों का भरोसा सरकार से उठने लगता है। देश भर में एक तरह से हिस्टीरिया जैसी स्थिति थी। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी शांत थे। पर इंडिया गेट पर थोड़े उग्र। पीड़िता की पीड़ा से लोग देश में ही नहीं, बल्कि सात समुंदर पार विदेशों में भी भारतीय लोग आहत थे। मलाला ने अपना बयान देकर सरकार को मुश्किल में डाल दिया। वह कहती रहीं कि बलात्कारियों ने पीड़िता को सड़क पर फेंका और सरकार ने उसे सिंगापुर में फेंका, दोनों में क्या फर्क रहा? भयभीत सरकार आखिर तक भयभीत ही बनी रही। वह न तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर पा रही थी और न ही कोई ऐसी घोषणा कर पा रही थी, जिससे लोगों का गुस्सा थोड़ा शांत हो। देश की राजनीति ही उलझन में थी। राजनेता संज्ञाशून्य। वे क्या कहते। हालात ऐसे हैं कि वे जो भी कहते, उसका अर्थ उल्टा ही निकल सकता था। भारत को हमेशा उदारवादी ही माना गया है। पर जनता ने सड़क पर आकर यह बता दिया कि अब उदारवादी बनने का समय नहीं है। कानून का ही सहारा लेकर लोग बलात्कार करके बच निकलते हैं। वे न्याय प्रक्रिया की धीमी गति से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। सरकार की ढिलाई भी इस काम में अनजाने में ही मदद भी करती है। जो सरकार स्वयं महिला आरक्षण विधेयक को बरसों तक लटकाए रख सकती है, उससे यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वह महिलाओं के लिए कुछ ऐसा करेगी, जो महिलाओं के लिए हितकारी हो। इस बार जनता इतनी अधिक नाराज है कि वह बलात्कारियों को सरे आम फांसी देने की मांग कर रही है। पर क्या इस ढीली सरकार से यह अपेक्षा की जा सकी है? जनता से भयभीत होने वाली सरकार कभी सफल नहीं हो सकती, यह सच है। सरकार अपनी करतूतों के कारण भयभीत है। वह जनता के सवालों का जवाब देना नहीं चाहती। जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इसलिए कुछ नहीं कर सकती कि वे कतई गलत नहीं हैं। इसलिए सरकार ने प्रदर्शनकारियों के गुस्से को जायज ठहराया।
इतना बड़ा कांड हो गया, पर सरकार अभी तक उलझन से बाहर नहीं आ पाई है। हां यह बात ठीक हुई कि इस बार नए वर्ष को उल्लास और खुशी के साथ आने देने में आगे रही। लोग उतने उत्साह से नए साल का स्वागत नहीं कर पाए। पर इसके पीछे जनता की भावना ही थी। कई लोगों ने स्वयं ही यह फैसला ले लिया कि वे नए वर्ष पर खुशी नहीं मनाएंगे। बॉलीवुड भी पूरी तरह से शांत रहा। यह सरकार के लिए सोचने का समय है कि वह कुछ ऐसा करे, जिससे लोग सरकार की प्रशंसा करे, सरकार के कार्यों को सराहें। यदि पहला कदम वह यही उठाए कि जो भी बलात्कार के आरोपी सांसद हैं, उन्हें बर्खास्त करे, यह पहला कदम ही उसे जनता के करीब ला सकता है। पर अल्पमत वाली सरकार से भला ऐसी उम्मीद कैसे की जा सकती है? भयभीत सरकार, डरी-सहमी सरकार, अपनों से ही घिरी और अपनों में ही उलझी सरकार से किसी अच्छे की उम्मीद करना ही बेकार है।
  डॉ. महेश परिमल

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