गुरुवार, 29 मई 2014

अब मोदी की रोज होगी परीक्षा

डॉ. महेश परिमल
मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण के साथ ही काम करना शुरू कर दिया है। अब यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनके सामने किस तरह की चुनौतियां हैं। वे उसका मुकाबला किस तरह से करेंगे। पर सच तो यह है कि अनेक चुनौतियों के साथ-साथ पूरा रास्ता अग्निपथ की तरह है। जहां कदम-कदम पर अंगारे दहक रहे हैं, पूरा रास्ता फिसलन भरा है। लोग ताकते बैठे हैं कि कब कौन-सा कदम गलत उठे, तो वे टोक सकें। आक्षेप लगा सकें। आरोपों के कठघरे में खड़ा कर सकें। अब तक जनसभाओं में प्रधानमंत्री बहुत बोले, पर अब उन्हें कम बोलकर काम अधिक कर दिखाना होगा। तभी उनका व्यक्तित्व निखरकर सामने आ पाएगा। वैसे लोगों ने उन पर पूरा भरोसा किया है, पर सभी जानते हैं कि भरोसा जीतने में काफी वक्त लगता है, पर खोने में कुछ पल। इसलिएा प्रधानमंत्री एवं उनके मंत्रिमंडल के साथियों के शपथ ग्रहण समारोह में देश-विदेश के अनेक लोगों ने अपनी उपस्थिति देकर स्वयं को गौरवान्वित समझा। मोदी मंत्रिमंडल ने अपना काम शुरू कर दिया है। अब तक मोदी एक राज्य को चलाते थे, अब उनके सामने पूरा देश है। देश ही नहीं विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश को चलाने की जिम्मेदारी है। लोगों ने उनसे काफी अपेक्षाएं पाल रखी हैं, इसलिए उनके एक-एक कदम की समीक्षा होगी।
आज मोदी के सामने सबसे बड़ी समस्या आर्थिक क्षेत्र की है। दूसरी है विदेशी मामलों की। तीसरी है सुरक्षा और चौथी उत्तर-पूर्व के राज्यों की समस्या। पांचवें क्रम में है आंतरिक सुरक्षा और छठी है कुछ नया कर दिखाने की। रोटी-कपड़ा-मकान और बिजली आदि आर्थिक क्षेत्र की समस्याओं में समाहित की जा सकती है। सबसे पहले बात आर्थिक क्षेत्र की, तो मोदी ने गुजरात और मध्यप्रदेश में सफल रूप से बनाई गई ज्योतिग्राम योजना को देश भर में लागू करनी होगी। दाल और तिलहन के समर्थन मूल्यों पर विचार करना होगा। चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी ने कई बार गेहूं की आयात-निर्यात नीति आदि पर अपने विचार व्यक्त किए। अब वे सत्ता पर काबिज हैं, तो अपने आइडियों को अमल में लाना चाहिए। फारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट भी एक सुलगता प्रश्न है। सरकारी सस्ते अनाज की दुकानों की बदहाली पर भी उन्हें विचार करना होगा। विदेशी मामलों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। पिछले दस वर्षो से यूपीए शासन के दौरान विदेश नीति में काफी खोट थी। चीन के साथ व्यवसाय, आंतरिक-बाहरी सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ डांवाडोल संबंध, पाकिस्तान की बार-बार बदनामी, पाक प्रेरित आतंकवाद आदि के संबंध में नए सिरे से विदेश नीति तैयार करनी होगी। शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों को आमंत्रित कर भारत ने चीन को यह संकेत दे दिया है कि भारत एक परिवर्तन के मोड़ पर है। अमेरिका के साथ भी कड़ा व्यवहार दर्शाना होगा। अमेरिका में अवैधानिक रूप से रहने वाले गुजरातियों को स्थायी करने का काम हाथ में लेना होगा। दस वर्ष पहले एनडीए शासन में केपिटल गुड्स का आयात दस अरब डॉलर का था, जो यूपीए सरकार के दस वर्ष के शासन में 587 अरब डॉलर पर पहुंच गया। फ्रेंडली इंडस्ट्रियल पॉलिसी तैयार करनी होगी। कोल इंडिया जैसी अनेक निजी क्षेत्र की कंपनियों को और अधिक व्यावसायिक बनाना होगा। 2014 का फोब्र्स की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय विद्यार्थी जब विदेश पढ़ने जाते हैं, तब उन पर 27 हजार करोड़ का खर्च होता है, इस खर्च की जीडीपी पर मामूली असर होता है। उद्योगों के लिए अटकी हुई फाइलों की भी समीक्षा करनी होगी।
सुरक्षा के क्षेत्र में कहा जाता है कि भारतीय सेना महत्वपूर्ण हथियारों की कमी से जूझ रही है। 155 एम अल्ट्रा लाइट वेट फिल्ड होवीत्जर और लाइट यूटीलिटी हेलिकाप्टर आदि के बिना अधिक समय तक नहीं रहा जा सकता। भारत में ही ये शस्त्र बनाए जाए, इसकी तैयारी करनी होगी। शस्त्रों की आयात नीति को विदेशी नीति के साथ जोड़ना होगा। ऐसा हमारे विशेषज्ञ मानते हें। ये सारे बातें तो रुटीन की है। पर मोदी को कुछ ऐसा नया कर दिखाना होगा, जिसमें लोगों की दिलचस्पी हो। यह भी सच है कि मोदी के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि जिसे घुमाते ही परिवर्तन दिखाई देने लगे। लोगों की यह अपेक्षा है कि यूपीए सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले नरेंद्र मोदी के सामने चुनौतियों के अभी कई गड्ढे और कई पर्वत हैें। अभी कई जम्प आने हैं। उन्हें देश की राजनीति के बदले विदेशी मामलों की राजनीति पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। कितने ही समीक्षक यह मानते हैं कि सीएम से पीएम की दिशा में टर्न लेना बहुत ही मुश्किल है। मोदी ने गुजरात में जिस तरह से स्व केंद्र शासन चलाया, वैसा शासन चलाना केंद्र शासन में संभव ही नहीं है। सबको साथ लेकर चलने की बात कहना आसान है, पर उसे अमल में लाना बहुत ही मुश्किल है। अब मोदी को यह पता चल जाना चाहिए कि ह्यूमन हेप्पीनेस अर्थात सभी के जीवन में खुशहाली हमेशा कायम रहे, वैसे प्रयास किए जाने चाहिए। यह तब संभव है, जब लोगों को सरकार द्वारा लिए गए निर्णय का सीधा असर उनकी निजी जिंदगी पर पड़े।
जो भी हो, पर सच यही है कि भाजपा को इस बार अपेक्षाओं के वोट मिले हैं। लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को नहीं देखा, उन्होंने केवल नरेंद्र मोदी को ही देखा। उन्हीं को वोट दिया। तीस वर्ष बाद देश गठबंधन की राजनीति से मुक्त हुआ है। इसका श्रेय मतदाता को दिया जाना चाहिए। वह भी आजिज आ चुका था, गठबंधन की राजनीति से। क्षेत्रीय दल अब तक देश के विकास में रोड़ा ही अटकाते रहे हैं। कई बार तो सीधी ब्लेकमेलिंग ही दिखाई दी है। ममता और जया तो इसी में महारत हासिल कर चुकी हैं। इसलिए लोगों ने इस बार भाजपा को गठबंधन की राजनीति से दूर रखा है, ताकि देश का संपूर्ण विकास हो। बिना किसी मजबूरी के सरकार अपने ठोस निर्णय ले सके। इन पूरी अपेक्षाओं के केंद्र में केवल नरेंद्र मोदी ही हैं।
  डॉ. महेश परिमल

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