शनिवार, 7 जून 2014

नहीं भूलती वह भीगी आंखें!

डॉ. महेश परिमल
देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ होगा, जिसने संसद पर पांव रखने के पहले उसकी सीढ़ियों पर माथा टेका होगा। इस तस्वीर से यह संदेश जाता है कि संसद जिसमें देश भर के चुने हुए जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं और देश की समस्याओं पर चर्चा कर उसका समाधान ढृंढते हैं, वह संसद एक मंदिर की तरह है। संसद में बैठने वाला सांसद उस मंदिर का पुजारी है। वैसे भी यह परंपरा है कि जब कोई अपनी दुकान पर पहुंचता है, तो वह उसकी दहलीज को प्रणाम कर ही अंदर जाता है। संसद यदि मंदिर है, तो उसकी सीढ़ियों पर माथा टेकना भारतीय परंपरा है, जिसका निर्वाह देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। उसके बाद संसद को संबोधित करते हुए लोगों ने उन्हें पहली बार इतना भावुक होते हुए देखा। देश के प्रधानमंत्री पर अच्छा लगता है, ऐसे संबोधनों ने उन्होंने अपने मित्रों के लिए किया।  इसके पहले संसद को इतना गरिमामय आज की पीढ़ी ने नहीं देखा होगा। अब तक संसद में न जाने क्या-क्या होता रहा। लोगों ने अपशब्द कहे, कुर्सियां फेंकी, परस्पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया, संसद मानों एक अखाड़ा हो गई हो। पर अब संसद को गरिमा देने का काम शुरू हो गया है। देश को एक संवेदनशील प्रधानमंत्री मिला है। ऐसा प्रधानमंत्री, जिसने गरीबी देखी है, गरीबी झेली है और गरीबी में अपना गुजारा किया है। जमीन से जुड़ा एक ऐसा नेता, जिस पर पूरे देश को नाज हो सकता है। आज उनके सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं, पर उन्हें विश्वास है कि वह अपने साथियों के साथ उन सारी चुनौतियों का सामना कर लेंगे और जो वादे उन्होंने चुनावी रैलियों में किए हैं, उसे पूरा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे।
न जाने क्यों, देश के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद का ताज पहनने की दिशा में जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे अतिभावुक होते जा रहे हैं। पहले दिल्ली में संबोधन करते हुए करीब-करीब रो ही दिए, तो उसके दूसरे ही दिन गुजरात विधानसभा में उनका गला भर आया था। अब तब अपनी चुनावी रैलियों में वे गरजते थे, पर अब लगातार सौम्य होने लगे हैं। गुजरात के मणिनगर में सभा को भी अपनी गरिमा को देखते हुए प्रधानमंत्री पद के अनुरूप ही संबोधित किया। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद पर जमीन-आसमान का अंतर है। मुख्यमंत्री राज्य का प्रधान होता है और प्रधानमंत्री देश का प्रधान होता है। हाल ही में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए जब नरेंद्र मोदी ने 36 इंच की छाती शब्द का प्रयोग किया था, तब काफी बहस हुई थी। लोगों का कहना है कि क्या क36 इंच की छाती की बात करने वाले इंसान की आंखों में कभी आंसू आ सकते हैं? किसी के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करने में आंसू स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं और गला भर आता है। वैसे भी इंसान जब अपने अतीत में झांकता है, तो उस समय की भूली-बिसरी यादें ही उसकी आंखें भिगो देती है। उस क्षण उन्हें याद आया होगा, मां का दुलार, भाई-बहनों की ठिठोली और उसके बाद संघ के प्रचारक के रूप में गांव-गांव पैदल घूमना। यह सब याद कर वे अपने आप को रोक नहीं पाए। आंसुओं ने भी अपनी सीमाएं तोड़ दी और गीली कर गए आंखें। संवेदनशील लोगों को उनकी ये तस्वीरें हमेशा अपनेपन के साथ याद आएंगी। क्योंकि यहां पर वे एक नए रूप में दिखाई दिए। अब तक उन्हें रोबीली आवाज वाले और गुस्से से भरे चेहरे वाले के रूप में जाना जाता था। पर अब अश्रुपूरित आंखों वाले मोदी के रूप में देखना एक अलग ही अनुभव था। यह देखकर किसी ने यह टिप्पणी कर दी कि यह विजय समारोह है या विदाई समारोह। मोदी तो कुछ देर बाद पूर्ववत हो गए, पर सांसद काफी देर तक उस संवेदना भरे वातावरण से नहीं निकल पाए। देश का एक बड़ा नेता जब रोने के करीब हो, तो अच्छे-अच्छे लोग भी अपने आप को रोक नहीं पाते। जिन्होंने भी टीवी पर यह लाइव शो देखा, वह भी अपने आंसू रोक नहीं पाया। इसे कहते हैं संवेदना की लहर।
आंसुओं को दबाया नहीं जा सकता। आंसू हर्ष पर भी आते हैं और शोक पर भी। विश्वभर के नेता भी अपने आंसुओं को रोक पाने में विफल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तो कई बार इन हालात से गुजरे हैं। कई बार उनका गला भर आया है। सख्त माने जाने वाले रुसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन की बात करें, तो मार्च 2012 में चुनाव जीतने के बाद खुशी के मारे वे रो पड़े। वे इतना रोए कि आंसू उनके गाल तक आ गए। एक तरफ वे हंसते जाते, तो दूसरी तरफ उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। ओबामा भी चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं की प्रशंसा करते हुए रो पड़े थे। अमेरिकी नेताओं में अब यह बात सामान्य हो गई है कि अमुक नेता की आंखें भर आई, या फिर उनका गला भर आया। सन् 2007 में हिलेरी क्लिंटन अपने चुनाव प्रचार के दौरान सवालों के जवाब देते-देते रो पड़ीं थीं। जार्ज डब्ल्यू बुश भी एक सैनिक को मरणोपरांत मेडल देते हुए रो पड़े थे। क्लिंटन या बुश तो कोई एथलेटिक चेम्पियन या बॉडी बिल्डर नहीं थे, पर पुतिन तो जूउो चेम्पियन अपने शरीर का विशेष ध्यान रखने वाले माने जाते हैं, इसके बाद भी वे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते। जिन्हें हम आयरन लेडी के नाम से जानते हैं, वही मार्गरेट थ्रेचर भी जब 10 डाउनिंग स्ट्रीट से विदा हो रही थीं, तब भी वे रो पड़ीं थीं। 1072 में डेमोकेटिक पार्टी के एडमंड मस्की जीतेंगे, यह तय था, परंतु उसकी पत्नी के खिलाफ किसी अखबार में प्रकाशित किसी खबर को पढ़ते हुए रो पड़े, मतदाताओं पर इसका असर उल्टा हुआ और वे चुनाव हार गए। रिपब्लिकन जॉन बोहनर स्पीकर ऑफ द हाउस थे। अमेरिकी सरकार में इस पद को बहुत बड़ा माना जाता है। बोहनर के साथ यह होता कि वे बात-बात पर रो पड़ते, इसलिए लोग उन्हें ‘वीपर आफ द हाउस’ कहा करते। उनकी छबि रोने वाले नेता की हो गई। आखिरकार उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा।
अपनी चुनावी सभाओं को संबोधित करते समय नरेंद्र मोदी के चेहरे पर कभी संवेदनाएं नहीं झलकीं। तब उनके चेहरे पर कीलर इंस्टींकट का भाव छलकता। पर जैसे-जैसे वे प्रधानमंत्री पद के करीब पहुंचने लगे, वैसे-वैसे भावुक बनते गए। फिल्मों में मीना कुमारी की छवि रोने वाली अभिनेत्री की रही है। अधिक रोने वाली नायिकाएं तो फिल्मों में चल जाएंगे, पर अधिक रोने वाले अभिनेता अधिक नहीं चल पाते। इसलिए नरेंद्र मोदी को अधिक भावुक होना नहीं चाहिए। क्योंकि जिसे लोगों ने एक दम-खम वाले इंसान के रूप में देखा है, उसे इतने अधिक भावुक रूप में देखना बार-बार अच्छा नहीं लगता। इसलिए उन्हें अपनी इस छवि से दूर रहकर एक सख्त एवं दूरंदेशी व्यक्ति के रूप में छवि बनानी होगी।
डॉ. महेश परिमल

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