शनिवार, 7 मई 2022

ध्वनि प्रदूषण की अनदेखी के खतरे



 

..जब शब्द साथ छोड़ देंगे

डॉ. महेश परिमल

शोर एक विचलन है। यह मानसिक स्थिति को बुरी तरह से प्रभावित करता है। अधिक शोर के बीच रहने वाले लोग चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। ऐसे लोग आक्रामक भी हो सकते हैं। शोर से कभी शांति नहीं मिल सकती, इसे गांठ बांधकर रख लें। शोर हमें व्यथित कर सकता है, विचलित कर सकता है, पर कभी भीतर की शांति प्रदान नहीं कर सकता। शोर का मुद्दा धार्मिक कतई नहीं है, यह एक सामाजिक मुद्दा है। शोर के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए। तेज आवाज वाले यंत्रों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देना चाहिए। डीजे और प्रेशर हार्न का उत्पादन ही बंद कर देना चाहिए। यदि अभी नहीं संभले, तो भावी पीढ़ी न तो अपने बच्चों की आवाज सुन पाएगी, न ही परिंदों की चहचहात को महसूस कर पाएगी। एक अंधेरी दुनिया में होंगे, हम सब, जहां सभी खामोश होंगे।

आजकल पूरे देश में लाउडस्पीकर को लेकर राजनीति हावी हो गई है। वास्तव में यह मामला शोर को होना था, पर इसे राजनीति का रंग दे दिया गया है। यदि शोर के खिलाफ आंदोलन चलाया गया होता, तो यह देश को एक नई दिशा देता। पर राजनीति के कारण भले ही यह मामला तूल पकड़ ले, पर मूल मुद्दे से भटक जाएगा। हम यदि शोर के खिलाफ शोर करते हैं, तो यह अनुचित होगा। पर शोर के खिलाफ अपनी खामोश मुहिम चलाएंगे, तो शायद यह बेहतर होगा। पर देश में खामोश मुहिम का कोई अर्थ ही नहीं है। इसलिए शोर के खिलाफ किया गया आंदोलन भी एक शोर में बदल जाता है। ऐसा ही इस मामले में हुआ है। महाराष्ट्र में लाउडस्पीकर विवाद को लेकर मामला उलझ गया है। राज ठाकरे ने एक बार फिर एक पत्र जारी कर लोगों से कहा है कि जिन स्थानों से अजान की आवाज लाउडस्पीकरों से आएगी, उसके खिलाफ वे हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। वे इसे एक सामाजिक मुद्दा बता रहे हैं। उन्होंने कहा है कि हम देश की शांति भंग नहीं करना चाहते, पर लाउडस्पीकर के मामले पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हम अपने बयान पर अडिग रहेंगे।

अब हम यदि पूरे विश्व में लगातार बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण की तरफ नजर डालें, तो स्पष्ट होगा कि ध्वनि प्रदूषण का असर केवल इंसानों ही नहीं, बल्कि जानवरों एवं पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है। बड़े शहरों से लेकर सुदूर गांव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इससे इकोसिस्टम तक प्रभावित हो रहा है। अधिक शोर के कारण मेटाबालिज्म से संबंधित रोग, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का खतरा बढ़ गया है। इससे हृदयाघात का भी खतरा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार तेज और लगातार होने वाले शोर से यूरोप में हर साल 48 हजार लोग हृदय रोग के शिकार हो रहे हैं। इससे करीब 12 हजार लोग असमय ही मौत का शिकार हुए हैं।

जर्मन संघीय पर्यावरणए एजेंसी के शोर विशेषज्ञ थॉमस माइक कहते हैं कि अगर कोई फ्लैट या घर मुख्य सड़क पर हे, तो कम किराया देना पड़ता है। इसका मतलब यह है कि जिन लोगों की आय कम है, उनके शोर-शराबे वाली जगहों पर रहने की संभावना अधिक है। शोर के केवल इंसान ही नहीं, बल्कि जानवर भी प्रभावित हो रहे हैं। ध्वनि प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा पक्षी प्रभावित हो रहे हैं। वे अब ऊंचे स्वर में अपनी आवाज निकाल रहे हैं। सड़क किनारों के कीड़ों, टिड्डों और मेढकों की आवाज में भी बदलाव देखा गया है। इसके अलावा अनिद्रा, अति तनाव, उच्च रक्तचाप, चिन्ता तथा अन्य बहुत से स्वास्थ्य संबंधी विकार शोर-प्रदूषण से उत्पन्न हो सकते हैं। लगातार प्रबल ध्वनि के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति की सुनने की क्षमता अस्थायी अथवा स्थायी रूप से कम हो जाती है। अधिक शोर में रहने वाले लोगों में कुछ नए रोगों का भी पता चला है। इसमें प्रमुख है रात में देखने की क्षमता में कमी आना, रंगों की पहचानने में दिक्कत, नींद का नियमित न होना, जल्दी थकान आना और मानसिक विक्षोम का उत्पन्न होना।

आजकल युवा जिस तरह से डीजे की आवाज के साथ थिरक रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि भविष्य में वे थिरकने के काबिल ही नहीं होंगे। क्योंकि उन्हें कुछ भी सुनाई ही नहीं देगा। ध्वनि प्रदूषण को नजरअंदाज करने वाले युवाओं का भविष्य बहुत ही अंधकारमय है। वे न केवल बहरे हो सकते हैं, बल्कि उनकी याददाश्त एवं एकाग्रता में भी कमी आ सकती है। यही नहीं चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, नपुंसकता, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के भी शिकार हो सकते हैं। यही हाल रहा, तो भावी पीढ़ी एक ऐसी अंधेरी दुनिया में होगी, जहां संवेदनाएं नहीं होंगी। लोग बहरे होंगे, संवेदनाएं केवल आंखों में ही दिखाई देगी। उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होंगे। यदि कोई कुछ कहेगा, तो सामने वाला उसे सुन नहीं पाएगा। सोचो कैसा होगा वह पल?

डॉ. महेश परिमल


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