गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

कविता - पिता का समर्पण

पिता का समर्पण यह कन्या रूपी रत्न तुम्हें मैं आज समर्पित करता हूँ, निज हृदय का प्यारा टुकड़ा लो तुमको अर्पण करता हूँँ। मेरे हृदय के नील गगन का, यह चंदा-सा तारा था, मैं अब तक जान न पाया, इस पर अधिकार तुम्हारा था। लो अमानत यह अपनी, मैं करबद्ध निवेदन करता हूँ- यह कन्या रूपी रत्न तुम्हें मैं आज समर्पित करता हूँ। चाचा-चाची से भतीजी बिछड़ी, मौसा-मौसी से बिछड़ी बहनौैता, मामा-मामी से भाँजी बिछड़ी, नाना-नानी की आँखों का तारा। माँ की ममता का सागर, यह मेरी आँखों का तारा है, कैसे बताऊँ मैं तुमको, किस लाड़-प्यार से पाला है। लो आज तुम्हें इन नयनों की ज्योति अर्पण करता हूँ, यह कन्या रूपी रत्न तुम्हें मैं आज समर्पित करता हूँँ। इससे भूल बहुत-सी होंगी, यह भोली है सुकुमारी है, इसके अपराध क्षमा करना, यह माता की राजदुलारी है। माँ लक्ष्मी की शोभा, तुम्हें आज मैं अर्पण करता हूँ, यह कन्या रूपी रत्न तुम्हें मैं आज समर्पित करता हूँ। बुआ-फूफा से बेटी बिछड़ी, माँ से बिछड़ी उसकी क्षमता, भैया से आज बहन बिछड़ी, बहनों से प्यारी-सी ममता। यह बात समझकर मन में, यही सोचा करता हूँ- यह कन्या रूपी रत्न तुम्हें मैं आज समर्पित करता हूँ। यह जाएगी सब रोएँगे, छलकेंगे नयनों से तारे, माता, भैया, बहन, दादा सब रो देंगे आज हमारे। मैं आज पिता कहलाने का अधिकार समर्पित करता हूँ। यह कन्या रूपी रत्न तुम्हें मैं आज समर्पित करता हूँ। इसे ऑडियो की मदद से सुन‍िए...

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