रविवार, 18 अप्रैल 2021

कविता - गरमी की छुट्टियाँ - भारती परिमल

वो गरमी की छुट्टियाँ 
पुकारती हैं मुझे
वो बचपन का 
बेफिक्र समय
पुकारता है मुझे।

वो परीक्षा शुरू होते ही
उसके खत्म होने की बेताबी
और आखरी पेपर होते ही
स्कूल से घर न लौटने की बेफिक्री
नींद से टूटता रिश्ता
मस्ती से जुड़ता नाता
रिश्ते-नातों की ये 
भूल-भुलैया सताती है मुझे
वो गरमी की छुट्टियाँ 
पुकारती हैं मुझे...

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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

कॉमेडी के मसीहा-चार्ली चैप्लिन

 



चार्ली चैप्लिन//  वो जब रोता था, तो दुनिया हँसती थी https://pradeshvarta.com/?p=10148

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रविवार, 11 अप्रैल 2021

सकारात्मकता की उजास

 अमर उजाला दिल्ली में 11 अप्रैल 2021 को प्रकाशित 



दैनिक दावा राजनांदगाँव में 11 अप्रैल 2021 को प्रकाशित




दैनिक नवभारत रायपुर में 11 अप्रैल 2021 को प्रकाशित





दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 



दैनिक लोेकस्वर बिलासपुर में 1 अप्रैल 2021 को प्रकाशित


                                            दैनिक दावा राजनांदगांव में 1 अप्रैल 2021 को प्रकाशित



शिमला के दैनिक गिरिराज में प्रकाशित

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

बाल कविता - क्यों कवि - सोहनलाल द्विवेदी

क्यों बच्चों को नहीं सुहाता, 
पढ़ना-लिखना, शाला जाना?
खेल-कूद में मन लगता,
दिन भर घर में धूम मचाना?
क्यों भाती मन को रंगरेली?
सुलझाए यह कौन पहेली?

क्यों पतंग उड़ती है ऊपर?
क्यों न कभी नीचे को आती?
और गेंद फेंको जो ऊपर,
तो वह फौरन नीचे  आती।
चोट लगाते ठेला-ठेली
सुलझाए यह कौन पहेली?

कवि - सोहनलाल द्विवेदी




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कविता - करती हैं लहरें मधुर गान - ठाकुर गोपाल शरण सिंह

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

जगती के मन को खींच खींच
निज छवि के रस से सींच सींच
जल कन्यांएं भोली अजान

सागर के उर पर नाच नाच,करती हैं लहरें मधुर गान।

प्रातः समीर से हो अधीर
छू कर पल पल उल्लसित तीर
कुसुमावली सी पुलकित महान

सागर के उर पर नाच नाच, 

करती हैं लहरें मधुर गान।

संध्या से पा कर रुचिर रंग
करती सी शत सुर चाप भंग
हिलती नव तरु दल के समान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

करतल गत उस नभ की विभूति
पा कर शशि से सुषमानुभूति
तारावलि सी मृदु दीप्तिमान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

तन पर शोभित नीला दुकूल
है छिपे हृदय में भाव फूल
आकर्षित करती हुई ध्यान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

हैं कभी मुदित, हैं कभी खिन्न,
हैं कभी मिली, हैं कभी भिन्न,
हैं एक सूत्र से बंधे प्राण,

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

- ठाकुर गोपाल शरण सिंह

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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गीत - जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम - कवि - जयकृष्ण राय तुषार

जहाँ वंशी गूँजे हर शाम |
किशोरी जी का जो छवि धाम 
जहाँ पर कृष्ण रूप में राम !
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ भगवान भक्त के दास 
सूर ,वल्लभ ,स्वामी हरिदास ,
जहाँ राजा से रंक का मेल 
सुदामा कृष्ण का सुंदर खेल ,
जहाँ यमुना का क्रीड़ाधाम 
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ बस प्रेम है द्वेष न राग 
जहाँ हर मौसम होली ,फाग ,
जहाँ फूलों में इत्र सुवास 
जहाँ उद्धव जी का परिहास ,
जहाँ संतो का सुख हरिनाम 
वही है वृन्दावन का धाम |

जहाँ गीता का अमृत पान 
गोपियों का नर्तन -मधु गान ,
जहाँ मिट जाते दुःख -संताप 
पुण्य का उदय ,अस्त हो पाप ,
है जिसके वश में माया ,काम 
वही है वृंदावन का धाम |

जहाँ गिरि गोवर्धन का मान 
इन्द्र का टूटा था अभिमान ,
जहाँ गायों का पालनहार 
जहाँ भक्तों के मोक्ष का द्वार 
जहाँ सबसे सुन्दर रंग श्याम
वही है वृन्दावन का धाम |


कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

कविता - मुहावरों के रंग - भारती परिमल

उम्र पचपन में याद आता है बचपन
कैसे थाली के बैंगन थे, बिन पेंदे के लोटे थे
नाच ना जाने आँगन टेढ़ा मानकर
यहाँ-वहाँ भटकते हम भी सिक्के खोटे थे
खरबूजे को देख जैसे खरबूजा रंग बदलता है,
हम भी खरबूजे और गिरगिट से रंग बदलते थे
बाबूजी के आगे तो दाल गल नहीं पाती थी,
पर माँ को नाकों चने चबवाते थे।
मस्ती की पाठशाला में
तिल का ताड़, राई का पहाड़ बनाया करते थे
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