शुक्रवार, 24 जून 2022

इंटरनेट एक्सप्लोरर की विदाई

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 23 जून को प्रकाशित





हिमाचल प्रदेश जनसम्पर्क विभाग के अखबार गिरिराज में 22 जून 22 को प्रकाशित







 

मंगलवार, 21 जून 2022

झुर्रियों की अहमियत

 











फादर्स डे पर 19 जून को मेरा एक आलेख 3 अखबारों में ्रपकाशित हुआ। बिलासपुर के लोकस्वर, भोपाल के लोकोत्तर और रायपुर के चैनल इंडिया में 


झुर्रियों की अहमियत
मेरे एक बुजुर्ग साथी हैं, उनकी उम्र है 80 साल। वे आज भी पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त हैं। सेवानिवृत्ति के बाद पिछले 20 सालों से वे एक कॉलेज में कानून पढ़ा रहे हैं। बेडमिंटन-टेबल-टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हैं। बातचीत में जोशीले हैं। कई विषयों में अच्छा दखल रखते हैं। उनके पास आने वालों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जो जीवन के संघर्षों से जूझ तो रहे हैं, पर उन्हें कोई मंजिल नहीं मिल रही है। एक तरह से हताश-निराश लोगों के लिए वे एक वरदान हैं। हर समस्या का समाधान उनके पास है। अभी तक उनके पास से कोई निराश नहीं लौटा। भलाई के कई ऐसे काम उनके द्वारा हुए हैं, जिनकी जानकारी उनके अपनों को भी नहीं है। धाराप्रवाह हिंदी-अंगरेजी में अपनी बात कहने वाले मेरे बुजुर्ग साथी दिल के बहुत ही साफ हैं। आशा की एक छोटी-सी किरण पाने की आस में उनके पास आने वाला व्यक्ति विश्वास से भरा-पूरा एक सूरज अपने साथ ले जाता है। उनका प्रखर व्यक्तित्व हर किसी को आकर्षित करता है।
मेरे ये साथी पूरे 11 साल तक दूसरे शहर नहीं जा पाए। क्योंकि उनकी पत्नी इन वर्षों में व्हील चेयर पर रहीं। पिछले साल ही उनकी पत्नी का देहांत हो गया। अब उनके पास समय काफी था। कॉलेज में गर्मी की छुटि्टयां लगीं, तो उन्होंने अपने गृह राज्य जाने का फैसला किया। अभी उनकी यात्रा शुरू ही नही हुई थी कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने अपने पास आने की गुहार लगानी शुरू कर दी। हर कोई उन्हें अपने पास बुलाना चाहता था। सीमित अवकाश में सबके पास जाना संभव ही नहीं था। पहले तो वे सीधे अपने गृह राज्य पहुंचे। काफी बरसों बाद पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। बड़े परिवार के कई सदस्य उनसे मिलने आए। वे सभी से पूरे अपनेपन के साथ मिलते। चाहे छोटा हो या बड़ा, सभी उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे। उनके व्यक्तित्व में एक चुम्बकीय आकर्षण था। अपनी सहजता से वे कुछ ही पलों में सभी को अपना बना लेते।
इस दौरान एक बात देखी गई। उनके आने से शहर में ही रहने वाले परिवार के वे सदस्य जो साल में केवल दो-तीन बार मिल पाते, कुछ ही दिनों में बार-बार मिलने लगे। इससे उनके बीच तो थोड़ी-बहुत कटुता थी, वह दूर हो गई। गलतफहमियां का कुहासा छंट गया। लोग और करीब आने लगे। उनके पास जो भी आता, कुछ न कुछ सबक लेकर ही जाता। कई युवाओं को उन्होंने ऐसी समझाइश दी, जिससे उनके काम की बाधाएं दूर हो गई। वे परिवार के ऐसे सदस्यों से भी मिले, जो अपने परिवार वालों से दूर हो गए थे। स्वयं को परिवार में उपेक्षित महसूस करने वाले सदस्यों से जब वे बुजुर्ग मिले, तो उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। साथी जहां भी गए, अपनेपन की खुशबू बिखेर गए।
परिवार की तीसरी पीढ़ी के लिए वे किसी एलियन से कम नहीं थे। कोई उनके पोपले मुंह का मजाक उड़ाता, तो कोई उनके सफेद बालों का। ये पीढ़ी उन्हें पिज्जा-बर्गर खिलाना चाहती, जिसे वे सहजता से खा भी लेते। मोबाइल पर वीडियो बनाती, उनसे हुई बातचीत को रिकॉर्ड करती। इनसे मिलकर इस पीढ़ी ने उम्र के दायरे को भी पाट दिया। वे सभी के लिए अपने थे, प्यारे थे, अपनापन बिखेरने वाले एक दादा थे। उस परिवार में कुछ ऐसे भी थे, जो उनसे भी बड़े थे। अपने से तीन साल बड़ी बहन के लिए तो वे अभी भी छोटू ही थे। उनसे मिलने पर बहन कुछ कह तो नहीं पाईं, पर उनकी आंखों से सब-कुछ कह दिया। वे केवल अपने छोटू का हाथ पकड़कर सिसकती रही, यादों की जुगाली करती रहीं।
परिवार में उनके छोटे भाइयों के बेटे-बहू और उनके बच्चों के लिए बुजुर्ग का आना किसी उत्सव से कम नहीं था। हर कोई उन्हें अपने घर ले जाना चाहता था। सबके घर जाना संभव नहीं था, तो किसी एक घर में मजमा लग जाता। जहां खूब सारी बातें होती, मस्ती होती और कई बार गंभीर समस्याओं के समाधान तलाशे जाते। इन पूरे दिनों न तो वे किसी एक घर में एक से अधिक रात रूक पाए, न हीं एक घर में दूसरी बार भोजन कर पाए। अगली बार आने का पक्का वादा करने के बाद ही परिवार के सदस्यों ने उन्हें वापस जाने की अनुमति दी।
तो ऐसा था, एक बुजुर्ग के अपने परिवार के सदस्यों के बीच जाने का यह रोचक मामला। आज जहां परिवार टूट रहे हैं, लोग परस्पर बात करने को तैयार नहीं है। वहां इस बुजुर्ग साथी ने अपनों से बात की। उनसे बात कर परिवार के सदस्य निहाल हो गए। उन्हें इस बात का दिलासा मिला कि कोई तो है, जो उनकी बात सुनता है। आजकल किसी की बात को सुन लेना ही बहुत बड़ी बात है। क्योंकि दर्द की गठरी लिए हर कोई तैयार है अपनी सुनाने के लिए। कोई अपनी बात सुनाना शुरू की करता है, तो दूसरा अपनी बात शुरू कर देता है। इस तरह से कोई किसी की बात नहीं सुन पाता। मेरे बुजुर्ग साथी पेशे से वकील रह चुके हैं, इसलिए उन्हें दूसरों की बातें सुनना अच्छा लगता है। इसीलिए वे अपनों की बातें सुनकर लोगों के और करीब आ गए। 80 वसंत देखने वाले मेरे इस साथी के अनुभवों का पूरा एक संसार ही है। जहां वे अपने अनुभवों के आधार पर लोगों को अपनी राय देते हैं, जो सामने वालों को अच्छी लगती है।
घर में आजकल झुर्रियों की अहमियत घट रही है। खल्वाट चेहरे अब सहन नहीं हो रहे हैं। उनके अनुभवों के विशाल खजाने का कोई लाभ नहीं उठाना चाहता। उनके पोपले मुंह से निकलने वाली दुआओं को कोई समझने को तैयार नहीं है। अपने बच्चों का दादा से अधिक मिलना-जुलना अब किसी पालक को अच्छा नहीं लगता। इसलिए अनुभवों का यह चलता-फिरता संग्रहालय आजकल वृद्धाश्रमों में कैद होने लगा है। जहां उनकी तरह अन्य कई लोग रहते हैं। कुछ विशेष अवसरों पर यहां चहल-पहल बढ़ जाती है, जब मदर्स डे-फादर्स डे पर बच्चे सेल्फी लेने आते हैं। कुछ बच्चे यहां आकर यह भी देख लेते हैं कि जब मेरे मम्मी-पापा यहां रहने लगेंगे, तो कैसा लगेगा? इस सोच को अमलीजामा पहनाने के लिए कुछ बच्चे वृद्धाश्रम से विदा लेते हैं। आप बताएं...क्या उनकी सोच को किनारा मिलना चाहिए?
डॉ. महेश परिमल


शनिवार, 18 जून 2022

जिंदगी पर बाजार का कब्जा

कहा जाता है कि जब जिंदगी दांव पर लग जाए, तो वह एक निर्णायक मोड़ साबित होता है। अब तक इंसान बाजार पर हॉवी रहा, यह शायद पहली बार हो रहा है कि जिंदगी पर बाजार का कब्जा हो रहा है। हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। वैसे भी जिंदगी टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित हो रही थी, पर अब बाजार ने इस पर कब्जा जमाकर इंसान को उसकी जिंदगी से पूरी तरह से अलग कर दिया है। इस जिंदगी से हंसी-खुशी के पल गायब हो रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक की दिनचर्या में इंसान के अपने पल बहुत ही कम होते हैं। अब सारे लम्हें उन हाथों में पहुंच गए हैं, जिनकी नजर में पैसा ही सब कुछ है।

जीवन मूल्य अब तेजी से बदल रहे हैं। अपराध करने के बाद भी अपराधी को अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं होता। किसी की हानि पहुंचाकर लोग अब खुश होते हैं। रास्ते चलते किसी को भी परेशान करना अब आम हो गया है। कानून के रखवालों के सामने कई लोग कानून की धज्जियां उड़ाते हुए दिख जाएंगे, पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार वे ही इस काम में लिप्त दिखाई देते हैं। महिलाएं यदि सक्षम है, तभी वह सुरक्षित है। अन्यथा उसे नोंचने के लिए समाज का एक वर्ग तैयार बैठा है। इसे देखकर बुजुर्ग अपने पुराने दिनों की जुगाली करते दिखाई देते हैं। उनका मानना है कि देखते ही देखते काफी कुछ बदल गया है। पहले हम बाजार जाते थे, अब बाजार ही हमारे घर पर आ गया है। खाने की जो भी चीज़ चाहिए, वह आधे घंटे के भीतर आपके सामने होगी। घर में क्या सामान आएगा, यह बुजुर्ग नहीं, बच्चे तय करने लगे हैं। हां, उस सामान की राशि बुजुर्ग ही देंगे। सामान उनकी मर्जी का तो नहीं आएगा। वे क्या चाहते हैं, इसकी किसी को नहीं पड़ी है। उनकी पसंद-नापसंद का कोई मतलब ही नहीं है।

जीवन मूल्य ही नहीं, अब नैतिक मूल्यों का लगातार अवमूल्यन हो रहा है। देखते ही देखते चीजें बदलने लगी हैं। हालात बदलने लगे हैं। हम कुछ नया सोचें, इसके पहले ही कुछ ऐसा नया आ जाता है कि हम पिछला सब कुछ भूल जाते हैं। कई बार इस दौड़ में हम पीछे रह जाते हैं। हम थक जाते हैं, इसी अंधी दौड़ में। शहरों में हम आ तो गए हैं, पर गांवों में आज भी हमारा बचपन कहीं दुबका पड़ा है। चाहकर भी हम उस बचपन को अपना नाम नहीं दे सकते। कभी पूरा गांव हमारा था, आज शहर का एक कोना जिसे हम घर कहते हैं, वह भी हमारा नहीं है। आखिर हमारा क्या है, यह यक्ष प्रश्न हर बुजुर्ग के भीतर कौंधता रहता है। 

अब बाजार हमारे भीतर समाने लगा है। हम बाजार के होने लगे हैं। बाजार में क्या चीज बिकनी है, यह हम तय नहीं कर रहे हैं। इसके लिए कुछ विशेष शक्तियां लगातार काम कर रही हैं। बिचौलिए के बिना कोई काम संभव ही नहीं है। मूल रूप से चीजों की कीमतें बहुत कम हैं, पर एक सोची-समझी साजिश के तहत उन चीजों के दाम बिचौलियों के हाथों इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि साधारण इंसान को वह दोगुनी-तिगुनी कीमत पर मिल रहीं हैं। रोटी बनाने वाले और रोटी खरीदने वाले के बीच किसी तीसरे की भूमिका महत्वपूर्ण होने लगी है। यही तीसरा दोनों पर हावी है। अब वही आदेश देने लगा कि कितनी रोटी बननी है और कितनी रोटेी खरीदी जानी है। ऐसे में साधारण इंसान की कोई औकात ही नहीं है। वह लगातार पिस रहा है। उसकी सांसें उधार रखी हुई है। वह अपनी सांसों को लेने की भी ताकत नहीं रखता।

सरकारी आंकड़ों में आम आदमी की जिंदगी काफी आसान है। उसे हर तरह की सुविधाएं मिल रही हैं। तमाम सरकारी कार्यालय उसके काम के लिए तैयार बैठे हैं। हर कोई उसकी सुख-सुविधाओं का पूरा खयाल रख रहा है। पर हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। आम आदमी आज भी महंगाई की चक्की में पिस रहा है। रोजगार की संभावनाएं लगातार कम होती जा रही है। किसी भी काम के लिए सरकारी महकमा काम नहीं आता। उसके काम में अनेक बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं। इसके बाद भी कई लोगों के काम बहुत ही आसानी से हो जाते हैं। इसके पीछे का गणित हर कोई जानता है। ऐसे में आम आदमी की हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है।

सरकारी आंकड़े सदैव झूठ बोलते हैं, यह जानते हुए भी लोग उस पर विश्वास करते हैं। ठीक हमारे नेताओं की तरह। जनता जानती है, इन नेताओं की हकीकत, इसके बाद भी जब वह सामने होता है, तो विरोध नहीं कर पाती। दूसरी ओर विज्ञापनों की दुनिया है, जिसमें खूब दावे किए जाते हैं, लोग जानते हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला, फिर भी न जाने किस प्रेरणा से वशीभूत होकर वह उत्पाद खरीद ही लेते हैं। इस तरह से मायाजाल है, जिसमें सभी उलझे हुए हें। सरकार का अलग मायाजाल है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अलग। इसमें उलझना सभी की मजबूरी है। न चाहकर भी इसमें लोग उलझते ही रहते हैं। विरोध की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। विरोध करने वाला कुछ दिनों बाद विरोध के काबिल ही नहीं होता। ऐसे में बहाव के साथ चलना हम सबकी विवशता है।

डॉ. महेश परिमल


सोमवार, 23 मई 2022

हरियाला संस्कार



18 मई 2022 को जनसत्ता में प्रकाशित


 

बुधवार, 18 मई 2022

ब्रह्मास्त्र के रूप में उभरता बुलडोजर



इन दिनों देश में बुलडोजर संस्कृति का लगातार विस्तार हो रहा है। यह संस्कृति अब राज्यों की सीमाएं तोड़ने लगी हैं। एक सख्त कदम उठाने की ओर संकेत देने वाली यह संस्कृति कुछ लोगों को भा रही है, तो कुछ लोगों के लिए आंख की किरकिरी बन गई है। बरसों से अवैध रूप से बनी आलीशान इमारतों को देखते हुए ईर्ष्या होती थी, उसे ही जमींदोज होते देखना बड़ा सुकूनभरा लम्हा रहा। कई स्थानों पर इस बुलडोजर ने इमारतें जमींदोज कर वहां बागीचे बना दिए। अब उस बागीचे में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं। अच्छा लगता है यह सब देखकर। दूसरी ओर अवैध रूप से शान से इमारतें खड़ी करने वाले अब दहशत में हैं। बरसों तक उनका राज चलता रहा, एक पल में ही उनकी दुनिया ही बदल गई। लोगों तक यह संदेश पहुंचा कि बुरे दिन की शुरुआत ऐसे ही होती है। इसलिए कभी किसी का बुरा मत करो। बुलडोजर संस्कृति पनपने का एक कारण देश के नेता ही हैं, जो अपनी काली कमाई को इस तरह से सफेद करने में लगे हुए हैं। अवैध काम करने वालों पर हमेशा नेताओं का वरदहस्त होता है, तभी वे अवैध कामों को अंजाम दे पाते हेैं।

हमारे देश में बहुत की कम ऐसे नेता हैं, जिन्हें लोग सम्मान की दूष्टि से देखते हैं। कई नेता तो अपनी आदतों के कारण विभिन्न नामों से याद किए जाते हैं। लोगों ने नेताओं को कई नाम दे रखे हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि अब नेता भी कुछ विशेष नामों से बुलाए जाने लगे हैं। बुलडोजर बाबा, बुलडोजर मामा, बुलडोजर दादा। इस तरह से कुछ नेताओं के नए नाम उभरे हैं। बुलडोजर होने को तो एक मशीन ही है, पर आज यह विपक्ष के नेताओं की किरकिरी बना हुआ है। संभव है इस बार यह बुलडोजर किसी न किसी दल का चुनाव चिह्न बन जाए। अब तो किसी नेता के मुंह से बुलडोजर शब्द का निकलना ही विवाद को जन्म देने लगा है। यहां तक कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अपनी भारत यात्रा के दौरान गुजरात के दाहोद में जेसीबी बुलडोजर में क्या बैठ गए, लोगों ने उन्हें भी लपेट लिया। वे भी ट्रोल का शिकार हो गए। उधर दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ कि बुलडोजर की कार्यवाही को रोकने के लिए अदालत को दो बार स्टे ऑर्डर देना पड़ा। भारतीय राजनीति में पहली बार बुलडोजर इतना हावी दिखाई दिया। विपक्ष के लिए यह बुलडोजर आंख की किरकिरी बन गया है। क्योंकि जिसके भी खिलाफ बुलडोजेर का इस्तेमाल किया गया है, वह किसी न किसी रूप से विपक्षी दलों से सम्बद्ध है। ऐसे में कुछ भी कहना यानी एक नए विवाद को जन्म देना है। एक तरह से यह एक टॉकिंग पाइंट बन गया है।

बुलडोजर का इस्तेमाल पहले समृद्ध किसान किया करते थे। अब यह अवैध निर्माण को ढहाने के काम में आने लगा है। अब तो जो नेता जितना अधिक बुलडोजर का इस्तेमाल करता है, वह उतना ही अधिक लोकप्रिय भी होने लगा है। नेताओं के लिए यह एक तरह से ब्रह्मास्त्र के रूप में जाने जाना लगा है। सबसे पहले बुलडोजर का उपयोग रेत और पत्थरों को रास्ते से हटाने के लिए किया गया। उसके बाद इसका विस्तार होने लगा। अब यह निर्माण कार्यों, खनिज कार्यों, तालाब गहरीकरण, नहर निर्माण के लिए इस्तेमाल में आने लगा है। लेकिन अब इसका दावानल रूप सामने आने लगा है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने इसका इस्तेमाल अवैध रूप से बनी हुई इमारतों के लिए किया। तब से पूरे देश में असामाजिक तत्वों में हाहाकार मच गया है। इसके बाद मध्यप्रदेश और बिहार में इसका इस्तेमाल पूरी सूझबूझ के साथ किया जाने लगा। यहां भी पहले तो सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप लगे, उसके बाद बुलडोजर के अस्तित्व को सभी ने स्वीकार कर लिया। अब यह अवैध निर्माण एवं सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले रसूखदारों के खिलाफ  एक रामबाण साबित हो रहा है।

अब लगे हाथ बुलडोजर का इतिहास भी जान लें। जेम्स कमिंग्स और जे अर्ले ने 1923 में सबसे पहले केन्सास में इसका उपयोग पहली बार किया था। उन्होंने एक ट्रेक्टर के आगे बड़ी-सी आरीनुमा ब्लेड लगा दी। इससे मिट्टी को एक तरफ किया जाता था। तब उसके इस पेटेंट का नाम अटैचमेंट फॉर ट्रेक्टर्स दिया गया। उस समय बुलडोजर के लिए टायर व्हील का उपयोग किया गया। अब तो बुलडोजर युद्धक टैंक की तरह आने लगे हैं, जो चेन की सहायता से आगे बढ़ते हैं। सन 1800 में पिस्तौल में इस्तेमाल की जाने वाली लम्बी केलिबर को भी बुलडोजर्स कहा जाता था। इससे लोगों को धमकाने का काम किया जाता था। अब तो आधुनिक खेती का पर्याय बन गया है बुलडोजर। इसी का दूसरा रूप थ्रेशर है, जो खेतों से फसलों को कुछ ही देर में काट देता है। उसके बाद फसल के दाने-दाने अलग हो जाते हैं। ट्रेक्टर की तरह अब बुलडोजर को किराए पर लिया जा सकता है। इससे मानव रोजगार भी प्रभावित हुआ है। संभव है ताकत के प्रतीक इस बुलडोजर को अब कोई भी दल अपना चुनाव चिह्न बना सकता है।

अवैध निर्माण कार्यों को तोड़े जाने पर लोग अब भले ही योगी जी को याद किया जाने लगा है, पर लोग गोविंद खैरनार को नहीं भूले होंगे, जिसने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार के खिलाफ अपना परचम लहराया था। उसने पवार के बेटे की होटल पर बुलडोजर चला दिया था। तब उसके काफी प्रशंसा हुई थी। किरण बेदी को भी हम नहीं भूल सकते, जिसने दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पार्क किए हुए वाहन को टो कर दिया था। लेकिन इस बार हमें बुलडोजर के जिस रूप का दर्शन योगी जी ने करवाया है, वह सबसे अलग है। यह बुलडोजर जीपीएस टेक्नालॉजी से सुसज्जित है। सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बने निर्माण कार्यों पर बुलडोजर चलाकर योगी जी एक सख्त मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं। एक तरह से उन्होंने सभी असामाजिक तत्वों को हिलाकर रख दिया है। इस बुलडोजर शब्द ने इतनी अधिक लोकप्रियता बटोरी है कि निकट भविष्य में बनने वाले किसी राजनीतिक दल का नाम ही बुलडोजर हो सकता है।

अब लोगों की आस ही यह बुलडोजर है। इससे अपेक्षाएं भी बढ़ने लगी हैं। लोग चाहते हैं कि अब यह बुलडोजर हमारे नेताओं को मिलने वाली तमाम सुविधाओं पर भी चले। कुछ भी काम न करने वाले ये नेता देशभक्ति की आड़ में जिस तरह से मुफ्त का माल खा रहे हैं, उस पर इस बुलडोजर को चलना ही चाहिए। अब देशभक्ति की परिभाषा बदल गई है। सीमा पर तैनात सैनिक ही देशभक्त नहीं होता। एक किसान फसल ऊगाकर, एक सब्जी वाला सब्जी बेचकर, एक मोची जूते सिलकर, एक डॉक्टर इलाज कर, एक नौकरीपेशा अपनी नौकरी कर, एक अधिकारी अपने अधिकार का उपयोग कर जिस तरह से देश की सेवा कर रहा है, ठीक उसी तरह से ये नेता भी देश सेवा ही कर रहे हैं। फिर इन्हें इतनी अधिक सुविधाएं क्यों मिल रही हैं? जब इन नेताओं की पेंशन सुविधाओं पर बुलडोजर चलेगा, तब वास्तव में यह बुलडोजर हम सबके लिए हितकारी होगा। तब हम इसे एक विध्वंसकारी के रूप में नहीं देखेंगे। तब यह हमारा अपना साथी होगा। इन्हीं शुभ भावनाओं के साथ......

डॉ. महेश परिमल


शनिवार, 7 मई 2022

ध्वनि प्रदूषण की अनदेखी के खतरे



 

..जब शब्द साथ छोड़ देंगे

डॉ. महेश परिमल

शोर एक विचलन है। यह मानसिक स्थिति को बुरी तरह से प्रभावित करता है। अधिक शोर के बीच रहने वाले लोग चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। ऐसे लोग आक्रामक भी हो सकते हैं। शोर से कभी शांति नहीं मिल सकती, इसे गांठ बांधकर रख लें। शोर हमें व्यथित कर सकता है, विचलित कर सकता है, पर कभी भीतर की शांति प्रदान नहीं कर सकता। शोर का मुद्दा धार्मिक कतई नहीं है, यह एक सामाजिक मुद्दा है। शोर के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए। तेज आवाज वाले यंत्रों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देना चाहिए। डीजे और प्रेशर हार्न का उत्पादन ही बंद कर देना चाहिए। यदि अभी नहीं संभले, तो भावी पीढ़ी न तो अपने बच्चों की आवाज सुन पाएगी, न ही परिंदों की चहचहात को महसूस कर पाएगी। एक अंधेरी दुनिया में होंगे, हम सब, जहां सभी खामोश होंगे।

आजकल पूरे देश में लाउडस्पीकर को लेकर राजनीति हावी हो गई है। वास्तव में यह मामला शोर को होना था, पर इसे राजनीति का रंग दे दिया गया है। यदि शोर के खिलाफ आंदोलन चलाया गया होता, तो यह देश को एक नई दिशा देता। पर राजनीति के कारण भले ही यह मामला तूल पकड़ ले, पर मूल मुद्दे से भटक जाएगा। हम यदि शोर के खिलाफ शोर करते हैं, तो यह अनुचित होगा। पर शोर के खिलाफ अपनी खामोश मुहिम चलाएंगे, तो शायद यह बेहतर होगा। पर देश में खामोश मुहिम का कोई अर्थ ही नहीं है। इसलिए शोर के खिलाफ किया गया आंदोलन भी एक शोर में बदल जाता है। ऐसा ही इस मामले में हुआ है। महाराष्ट्र में लाउडस्पीकर विवाद को लेकर मामला उलझ गया है। राज ठाकरे ने एक बार फिर एक पत्र जारी कर लोगों से कहा है कि जिन स्थानों से अजान की आवाज लाउडस्पीकरों से आएगी, उसके खिलाफ वे हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। वे इसे एक सामाजिक मुद्दा बता रहे हैं। उन्होंने कहा है कि हम देश की शांति भंग नहीं करना चाहते, पर लाउडस्पीकर के मामले पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हम अपने बयान पर अडिग रहेंगे।

अब हम यदि पूरे विश्व में लगातार बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण की तरफ नजर डालें, तो स्पष्ट होगा कि ध्वनि प्रदूषण का असर केवल इंसानों ही नहीं, बल्कि जानवरों एवं पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है। बड़े शहरों से लेकर सुदूर गांव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इससे इकोसिस्टम तक प्रभावित हो रहा है। अधिक शोर के कारण मेटाबालिज्म से संबंधित रोग, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का खतरा बढ़ गया है। इससे हृदयाघात का भी खतरा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार तेज और लगातार होने वाले शोर से यूरोप में हर साल 48 हजार लोग हृदय रोग के शिकार हो रहे हैं। इससे करीब 12 हजार लोग असमय ही मौत का शिकार हुए हैं।

जर्मन संघीय पर्यावरणए एजेंसी के शोर विशेषज्ञ थॉमस माइक कहते हैं कि अगर कोई फ्लैट या घर मुख्य सड़क पर हे, तो कम किराया देना पड़ता है। इसका मतलब यह है कि जिन लोगों की आय कम है, उनके शोर-शराबे वाली जगहों पर रहने की संभावना अधिक है। शोर के केवल इंसान ही नहीं, बल्कि जानवर भी प्रभावित हो रहे हैं। ध्वनि प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा पक्षी प्रभावित हो रहे हैं। वे अब ऊंचे स्वर में अपनी आवाज निकाल रहे हैं। सड़क किनारों के कीड़ों, टिड्डों और मेढकों की आवाज में भी बदलाव देखा गया है। इसके अलावा अनिद्रा, अति तनाव, उच्च रक्तचाप, चिन्ता तथा अन्य बहुत से स्वास्थ्य संबंधी विकार शोर-प्रदूषण से उत्पन्न हो सकते हैं। लगातार प्रबल ध्वनि के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति की सुनने की क्षमता अस्थायी अथवा स्थायी रूप से कम हो जाती है। अधिक शोर में रहने वाले लोगों में कुछ नए रोगों का भी पता चला है। इसमें प्रमुख है रात में देखने की क्षमता में कमी आना, रंगों की पहचानने में दिक्कत, नींद का नियमित न होना, जल्दी थकान आना और मानसिक विक्षोम का उत्पन्न होना।

आजकल युवा जिस तरह से डीजे की आवाज के साथ थिरक रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि भविष्य में वे थिरकने के काबिल ही नहीं होंगे। क्योंकि उन्हें कुछ भी सुनाई ही नहीं देगा। ध्वनि प्रदूषण को नजरअंदाज करने वाले युवाओं का भविष्य बहुत ही अंधकारमय है। वे न केवल बहरे हो सकते हैं, बल्कि उनकी याददाश्त एवं एकाग्रता में भी कमी आ सकती है। यही नहीं चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, नपुंसकता, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के भी शिकार हो सकते हैं। यही हाल रहा, तो भावी पीढ़ी एक ऐसी अंधेरी दुनिया में होगी, जहां संवेदनाएं नहीं होंगी। लोग बहरे होंगे, संवेदनाएं केवल आंखों में ही दिखाई देगी। उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होंगे। यदि कोई कुछ कहेगा, तो सामने वाला उसे सुन नहीं पाएगा। सोचो कैसा होगा वह पल?

डॉ. महेश परिमल


सोमवार, 25 अप्रैल 2022

मुफ्तखोरी एक धीमा जहर


दैनिक जागरण में राष्ट्रीय संस्करण के संपादकीय पेज पर 25 अप्रैल 2022 को प्रकाशित



  


 मुफ्तखोरी एक धीमा जहर

डॉ. महेश परिमल

हाल ही में दिल्ली में एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं के कारण अब लोग पेट की आग बुझाने के लिए श्रम करने से कतराने लगे हैं। खाली समय का उपयोग वे अब अपराध में करते हैं। ऐसे लोग काम की तलाश में नहीं निकलते। इनका अधिकांश समय गप्पबाजी में निकल जाता है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे व्यक्ति की उत्पादकता पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि उसे अपना जीवन गुजारने के लिए अधिक धन की आवश्यकता ही नहीं होती। इसे ही यदि दूरदृष्टि से देखा जाए, तो यह कहा जा सकता है कि हमारे यहां जिस तरह का बीज अभी बोया जा रहा है, श्रीलंका में उसकी कटाई हो रही है। मुफ्त में तमाम सुविधाएं देने वाले राज्यों से यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर इसके लिए वे वित्तीय प्रबंध किस तरह से करेंगे? राज्य अगर किसी गृह उद्योग के लिए मुफ्त में शेड देता हे, या बिजनेस के लिए बिना ब्याज के कर्ज देता है, तो इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। किंतु जीवन के लिए आवश्यक चीजों को मुफ्त में देने की घोषणा की जाती है, तो व्यक्ति काम की तलाश में घर से ही नहीं निकलेगा। ऐसे में पूरी एक पीढ़ी को ही काहिल बना दिया जाएगा।

अभी पंजाब सरकार ने मतदाताओं के लिए कई घोषणाएं की हैं। इसमें प्रमुख है एक जुलाई से 300 यूनिट मुफ्त बिजली। अन्य कई घोषणाएं भी हैं, पर सभी जनोपयोगी हैं। यह तो होना ही चाहिए, पर मुफ्त बिजली देकर सरकार आम जनता को एक मायावी संसार में धकेल रही है। हम सब देख रहे हैं कि अधिकांश राज्य आज कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। आम जनता से करों से प्राप्त धन मुफ्त की चीजों को देने में खर्च हो रहा है। राज्य सरकारों को यदि मुफ्त की चीजें देना ही है, तो पार्टी फंड से दिया जाए, सरकारी धन का उपयोग मुफ्तखोरी के लिए देना उचित नहीं है। इससे सरकारी तिजोरी पर भार बढ़ता है। जनता को कितनी भी चीजें मुफ्त में दी जाए, उस कम ही लगेगी। इससे सरकारें बहुत ही जल्दी कर्ज में डूब जाएंगी। कर्ज के पहाड़ के नीचे दब श्रीलंका की हालत हम सभी देख रहे हैं। कर्ज लेते समय उसे यह आभास भी नहीं था कि इसे देना भी पड़ेगा। चीन ने जो जाल उस पर फेंका, उसमें वह उलझ गया है। अब उसे समझ में आ रहा है कि मुफ्त की चीजें देना उसके लिए जी का जंजाल बन गया है। आज वहां सभी आवश्यक चीजों के दाम आसमान छूने लगे हैं। लोगों का जीना ही दूभर हो गया है। वह दिन दूर नहीं जब वहां भुखमरी शुरू हो जाएगी। भारत का इससे सबक लेना चाहिए। आम जनता को मुफ्त में चीजें देने से अर्थतंत्र पर सीधा असर पड़ता है। एक तरफ देश में फैला भ्रष्टाचार तो दूसरी तरफ मुफ्तखोरी, इससे लोगों की उत्पादकता पर सीधा असर हुआ है। लोग काम करने से कतराने लगे हैं।

देश में इस समय जो प्रदूषण है, उसका मुख्य बिंदु राजनीति है। नेता अपने स्वार्थ के कारण लोगों को मुफ्त में अनाज आदि देने की घोषणा तो कर देते हैं, पर जब उस पर अमल करने का समय आता है, तो उनकी हालत खराब हो जाती है। सरकारें केंद्र से सहायता की गुहार लगाती है। केंद्र से मिलने वाली सहायता राशि का ब्याज ही इतना अधिक होता है कि राज्य सरकारें ब्याज भी नहीं चुका पाती। मूल धन वहीं का वहीं रहता है। वैसे देखा जाए, तो मुफ्त की सुविधाएं देने का सिलसिला तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के समय से शुरू हुआ था। उसके पदचिह्नों पर आजकल दिल्ली की सरकार चल रही है। अब तो चुनाव जीतने के लिए मुफ्त की सुविधाएं देना एक ब्रह्मास्त्र बन गया है। इसके बिना कोई भी चुनाव नहीं जीता जा सकता।

बहरहाल किसी भी दल में यह हिम्मत नहीं है कि वह दूसरे दल से यह कह सके कि मुफ्त में आवश्यक चीजें देने की घोषणा करना गलत है। सभी सत्ता पर काबिज होने के लिए इस तरह की घोषणाएं करते हैं। अभी फरवरी-मार्च महीने में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, उस दौरान गोवा में मुफ्त की चीजें देने की बहार ही आ गई। मतदाताओं को इतने अधिक प्रलोभन दिए गए कि यदि सभी को अमल में लाया गया, तो किसी को नौकरी करने की जरूरत ही न पड़े। मतदाताओं को जितना दो, उतना कम ही है। पर यह सब उन तक पहुंचता है, सरकारी तिजोरियों के माध्यम से। कुछ समय बाद ही यह तिजोरी खाली हो जाती है। फिर भीख मांगने की नौबत आ जाती है। उसके बाद भी मुफ्त में दी जाने वाली चीजों पर रोक नहीं लगती। 

इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार तल्ख टिप्पणी की है। पर नेता इससे बाज नहीं आते। प्रलोभन की यह राजनीति खत्म होनी चाहिए। इसके लिए सबसे बड़ी बात जागरूकता की है। आम जनता को यह समझना चाहिए कि मुफ्त की यह चीजें अभी भले ही अच्छी लग रही हों, पर भविष्य में इसका बुरा असर होगा। देश के सर पर कर्ज और बढ़ेगा, लोग महंगाई के बोझ तले दब जाएंगे। होना तो यह चाहिए कि मुफ्त की चीजें यदि पार्टी फंड से दी जाएं, तो नेताओं को समझ में आ जाएगा कि इसमें कितना धन लगता है। इस समय सभी दलों के पास बेशुमार राशि है, इसका उपयोग मतदाताओं को लुभाने के लिए किया जाए। यह फंड भी उन्हें देश के लोगों से ही प्राप्त हुआ है, तो क्यों न इसे वे देशवासियों के लिए ही उपयोग में लाएं।

यह सच है कि मुफ्तखोरी से किसी का भला नहीं होने वाला। अब यह लोगों की आदत में शामिल हो रही है। यह एक प्रदूषण है, जो हमारे शरीर के लिए धीमे जहर का काम कर रहा है। हमारे भीतर के मेहनतकश इंसान को खत्म कर रहा है। जब बिना काम के घर में राशन आ रहा हो, तो फिर काम करने की क्या जरूरत? यह सोच इंसान को बरबाद कर रही है। नेता शायद ही इसे समझ पाएं, पर जनता इसे समझ जाए, तो ही ठीक है, नहीं तो हम सभी को अपने अंधेरे भविष्य को देखने के तैयार होना होगा।

डॉ. महेश परिमल


बुधवार, 20 अप्रैल 2022

दूर करनी होगी पेड़ों की थकान

वायु प्रदूषण से अकाल मौतें चिंतनीय


कहा गया है कि वायु को शुद्ध करने में पेड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर लगता है कि अब हमारे देश के ही नहीं, बल्कि विदेशों के पेड़ भी थकने लगे हैं। वे हमें जो प्राणवायु दे रहे हैं, उसमें वह बात नहीं रही। हमारा पर्यावरण लगातार बिगड़ रहा है। हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं। शोध बताते हैं कि वायु प्रदूषण से जो लोग मौत के शिकार हुए हैं, वे समय से पहले मौत के आगोश में समा गए हैं। समय से पहले हुई मौत को अकाल मौत कहा जाता है। हमारे देश में रोज ही कई लोगों की अकाल मौतें होती हैं। इसमें कई कारण तो निजी हैं। पर वायु प्रदूषण से होने वाली मौत के लिए मौत का शिकार व्यक्ति अकेला ही जिम्मेदार नहीं है। एक पूरी पीढ़ी ही इसके लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है। इस देश में जिस दिन पेड़ों की संख्या इंसानों की संख्या से दोगुनी हो जाएगी, उस दिन से वायु प्रदूषण का नामो-निशान नहीं होगा।  

हाल ही में एक शोध से पता चला है कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों के आंकड़ों में बेतहाशा इजाफा हुआ है। शोध में देश के मुम्बई, बैंगलोर, कोलकाता, हैदराबाद, चैन्नई, सूरत, पुणे और अहमदाबाद को शामिल किया गया। इन शहरों में वायु प्रदूषण से करीब एक लाख लोगों की मौत हुई है। यह जानकारी चौंकाने वाली है। सरकार की तमाम कोशिशें इन आंकड़ों के आगे लाचार नजर आती हैं। पर्यावरणविद् लम्बे समय से सरकारों को आगाह कर रहे हैं कि इस दिशा में ठोस कदम उठाएं जाएं, पर उनकी कोई सुन ही नहीं रहा है। बर्मिघम विश्वविद्यालय और यूसीएल के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि तेजी से बढ़ते उष्णकटिबंधीय शहरों में 14 वर्षो में लगभग 1,80,000 परिहार्य मौतें वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ने के कारण हुई।

साइंस एडवांस में 8 अप्रैल को प्रकाशित, अध्ययन से वायु गुणवत्ता में तेजी से गिरावट और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक वायु प्रदूषकों के शहरी जोखिम में वृद्धि का पता चलता है। शोधकर्ताओं ने हवा की गुणवत्ता में इस तेजी से गिरावट के लिए उभरते उद्योगों और आवासीय स्रोतों- जैसे सड़क यातायात, कचरा जलाने और लकड़ी का कोयला और ईंधन लकड़ी के व्यापक उपयोग को जिम्मेदार ठहराया। बर्मिघम विश्वविद्यालय में यूसीएल भूगोल के छात्र कर्ण वोहरा   ने बताया कि भूमि निकासी और कृषि अपशिष्ट निपटान के लिए बायोमास के खुले में जलने के कारण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का अत्यधिक प्रभुत्व रहा है।

शोध के अनुसार, वायु प्रदूषण के संपर्क में आने पर समय से पहले मरने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि दक्षिण एशिया के शहरों में सबसे अधिक है, विशेष रूप से बांग्लादेश में ढाका में कुल 24 हजार लोग और मुंबई, बैंगलोर, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, सूरत, पुणे और अहमदाबाद जैसे भारतीय शहरों में कुल एक लाख लोग अकाल मौत के शिकार हुए हैं। देश के 125 प्रदूषित शहरों में मेरठ शहर का भी नाम आया। रविवार 10 अप्रैल  को एयर क्वालिटी इंडेक्स बढ़कर 364 पर पहुंच गया। जो यह बताता है कि हालात बहुत ही खराब हैं। लगातार खराब होती हवा के कारण लोगों को सांस लेने में भी दिक्कत हो रही है। 

हाल ही में किए गए अध्ययनों से कोविड-19 से होने वाली मौतों और वायु प्रदूषण के बीच संबंध का पता चला है। शोधकर्ताओं के अनुसार वैश्विक स्तर पर कोविड-19 से होने वाली 15 प्रतिशत मौतों का संबंध लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से है। इस डैटा में विशेषज्ञों ने वायु में सूक्ष्म कणों की उपग्रह से प्राप्त जानकारी के साथ पृथ्वी पर उपस्थित प्रदूषण निगरानी नेटवर्क का डैटा शामिल किया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कोविड-19 से होने वाली मौतों के पीछे वायु प्रदूषण का योगदान किस हद तक है। डैटा के आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि पूर्वी एशिया, जहां हानिकारक प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक है, में कोविड-19 से होने वाली 27 प्रतिशत मौतों का दोष वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर हुए असर को दिया जा सकता है। यह असर युरोप और उत्तरी अमेरिका में क्रमश: 19 और 17 प्रतिशत पाया गया। एक अनुमान है कि कोरोनावायरस से होने वाली कुल मौतों में से यू.के. में 6100 और अमेरिका में 40,000 मौतों के लिए वायु प्रदूषण को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। 

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि अब पूरे विश्व में वायु को शुद्ध करने का महाभियान चलाने का समय आ गया है। इस कार्य में बिना किसी भेदभाव के सभी देशों को एकजुट होना होगा। आपसी कटुता को दूर रखकर वायु प्रदूषण को दूर करने के सामूहिक प्रयास करने होंगे। यह सच है कि भविष्य भले ही ऑक्सीजन सिलेंडर रखकर चलने का हो, पर ऐसी नौबत आने ही क्यों दी जाए। भावी पीढ़ी को यह बताना होगा कि थके पेड़ों को नई ऊर्जा वही दे सकती है। जिस तरह से घर में बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है, ठीक उसी तरह हमारे आसपास के पेड़ों की भी उपेक्षा हो रही है। पेड़ों को अपना साथी मानने का समय आ गया है। उन्हें अब घर का प्रमुख सदस्य मान लेना होगा, क्योंकि भविष्य अंधकारमय है। इस अंधेरे को दूर करने में पेड़ अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं।

डॉ. महेश परिमल


शनिवार, 16 अप्रैल 2022

डिजिटल म्युजियम यानी भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों की जानकारी

 

14 अप्रैल 2022 को लोकस्वर में प्रकाशित





डिजिटल म्युजियम यानी भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों की जानकारी
देश में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उनमें से सबसे अधिक चर्चित यदि किोई रहे हैं, तो वे हैं जवाहर लाल नेहरू। शेष प्रधानमंत्रियों की चर्चा उतनी नहीं होती। आज की पीढ़ी नेहरू को बतौर प्रधानमंत्री जानती है, पर लाल बहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह, हरदन हल्ली डोड्‌डेगौड़ा देवगौड़ा को नहीं जानती। इन्हें यदि जान भी जाए, तो कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में दो बार कार्य करने वाले गुलजारी लाल नंदा को कोई नहीं जानता। ऐसे में युवा पीढ़ी हमारे देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को न भूले, उनके भाषण को याद रखे, इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्रियों की याद को संजोने के लिए नेहरू मेमोरियल म्युजियम एवं लायब्रेरी का निर्माण किया गया है, जिसका उद्घाटन 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। यह एक अच्छा प्रयास है, जिसकी सराहना की जानी चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस प्रयास की सराहना भले ही न हो, पर इसका विरोध निश्चित रूप से होगा, यह तय है। इसके पहले यह घोषणा की गई थी कि 25 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिन पर इस म्युजियम का उद्घाटन किया जाएगा। किंतु अब इसे बाबा साहेब अंबेडकर के जन्म दिवस पर सभी के लिए खोल दिया जाएगा। इस म्युजियम के माध्यम से यह बताने की कोशिश की जाएगी कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्रियों की क्या-क्या उपलब्धियां रहीं। उनके विचार कैसे थे। देश के बारे में उनकी क्या सोच थी आदि। केंद्र के सांस्कृतिक एवं पर्यटन मंत्री जी कृष्णा रेड्‌डी ने बताया कि म्युजियम अब पूरी तरह से तैयार है। इस प्रोजेक्ट की लागत 226.20 करोड़ है। इसका बजट 271 करोड़ रुपए था। इसमें कांटेक्ट जेनरेशन, डिस्पले, टेक्नालॉजी आदि का समावेश किया गया है। डिजिटल स्टोरी, थ्री डी मेपिंग टेकनिक, ऑडियो, विजुअल प्रोजेक्शन, होलोग्राम आदि आकर्षण का केंद्र होंगे।
तीन मूर्ति भवन के बाजू में ही स्थित है नेहरू मेमोरियल म्युजियम। दस हजार वर्गमीटर भूमि पर तैयार इस म्युजियम में पूर्व प्रधानमंत्रियों की तस्वीरें, स्पीच, वीडियो क्लीप, समाचार पत्र, साक्षात्कार आदि उपलब्ध हैं। इसके अलावा उनका जीवन चरित्र, उनके विदेश प्रवास की जानकारी भी होगी। पहले यह योजना थी कि इसका उद्घाटन 2020 में किया जाए, किंतु कोविड महामारी के कारण यह संभव नहीं हो पाया। तीन मूर्ति भवन 1930 में अंग्रेजों ने बनवाया था। बाद में यह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निवास स्थान हो गया। नेहरु जी वहां 1964 तक रहे। हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की किताब के विमोचन समारोह के प्रसंग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह टिप्पणी की थी कि कुछ विघ्नसंतोषियों ने यह प्रयास किया है कि देशवासी पूर्व प्रधानमंत्रियों को भूल जाएं। उनकी मंशा यह थी कि लोग हमारे किसी भी पूर्व प्रधानमंत्रियों को याद न करें। इस दौरान मोदी ने सभी प्रधानमंत्रियों के नामों का उल्लेख किया, किंतु उन्होंने जवाहर लाल नेहरू का नाम नहीं लिया।
हमारे देश में नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्रियों की गलतियों का जमकर प्रचार-प्रसार किया है। इससे वे वोट बटोरने में भी कामयाब हुए हैं। इसके बाद भी कई प्रधानमंत्रियों के नामों का उल्लेख तक नहीं किया जाता। लाल बहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह, एच.डी.देवगौड़ा आदि का नाम प्रधानमंत्री के रूप में नहीं लिया जाता। आज की पीढ़ी को हमारे पूर्व प्रधानमंत्रियों से रू-ब-रू कराने के लिए इस म्युजियम की स्थापना की गई है। इस म्युजियम के उद्घाटन के अवसर पर दो पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवगौड़ा और डॉ. मनमोहन सिंह को भी आमंत्रित किया गया है। देखा जाए, तो यह म्युजियम आज की पीढ़ी के लिए मील का एक पत्थर साबित होगा। युवा पीढ़ी हमारे पूर्व प्रधानमंत्रियों को अच्छी तरह से जानेगी, ऐसी आशा की जा सकती है।
डॉ. महेश परिमल 



मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

गिरते विचारों का मौसम

11 मार्च  2022 को जनसत्ता में प्रकाशित


10 अप्रैल 22 को नवभारत रायपुर में प्रकाशित



चिड़िया...कवि और व्यथा

समाज पर सांस्कृतिक हमले होते ही रहते हैं। इससे सबसे ज्यादा दु:खी कवि हृदय होता है। समाज का यही वर्ग सबसे अधिक संवेदनशील होता है। इसलिए ऐसे हमलों से इनका आहत होना लाजिमी है। इन दिनों छत्तीसगढ़ के रसखान कहे जाने वाले लोक कवि मीर अली मीर बुरी तरह से आहत हैं। उनकी पीड़ा हाल ही में जारी एक वीडियो से जारी हुई है। एक तरफ तो वे सुदूर गांवों में लगने वाले मोबाइल टॉवर से व्यथित हैं। इन टॉवर्स से निकलने वाले विकिरण से गांवों से चिड़ियों ने विदा ले ली है। अब गांवों में पखेरुओं का डेरा दिखाई नहीं देता। हर गांव-शहर की सुबह अब चिड़ियों की चहचहाट से नहीं, बल्कि मोबाइल ने निकलने वाली चिड़ियों की आवाज से होती है। कहते हैं समय परिवर्तनशील है, पर समय के साथ जीवन मूल्य भी इतनी तेजी से बदल जाते हैं, यह अब महसूस हो रहा है।

कवि मीर अली मीर लुप्त होती चिड़ियों को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि- उड़ा जाही का रे, उड़ा जाही का रे, उड़ा जाही का, कलरव करैया, फुदुर-फुदुर फुदके चिहुर परैया, मोर सोनचिरैया, उड़ा जाही का रे...यानी उड़ जाएगी क्या, उड़ जाएगी क्या, चहचहाने वाली, फुदकने वाली मेरी सोन चिरैया हमेशा-हमेशा के लिए उड़ जाएगी क्या? ये केवल एक कवि की ही पीड़ा नहीं है, बल्कि आज पर्यावरण के सभी साथियों के लिए चिंता का विषय है। आज मानवजाति पर संचार व्यवस्था के संसाधन बुरी तरह से हावी हो गए हैं। परस्पर सम्पर्क रखने की चाहत ने आज संपूर्ण मानव जाति को ही हिलाकर रख दिया है। कई बार ऐसा लगता है कि मानव निरक्षर था, तो ही ठीक था, कम से कम अपनी जिंदगी जी तो लेता था। आज अतिशिक्षित होकर वह न तो अपनी जिंदगी जी पा रहा है और न ही अपनों को अच्छी तरह से जीने की प्रेरणा दे पा रहा है। संशय का एक संजाल हमारे आसपास फैल गया है, जिसमें हर कोई उलझ गया है।

छत्तीसगढ़ के कवि का वीडियो आया, तो उसकी पीड़ा समझ में आई। इसके पहले उनकी यह कविता कहीं प्रकाशित भी हुई होगी, पर लोगों की नजरों से नहीं गुजरी। अब वीडियो के माध्यम से लोगों ने उसे जाना और उनकी पीड़ा को समझा। कवि मीर अली मीर की पीड़ा आज घनीभूत होकर हम सबको सोचने के लिए विवश कर रही है। वास्तव में यह आज देश के जन-जन की पीड़ा है। बस इसे अभिव्यक्त करने का माध्यम नया है। आज देश के कोने-कोने में लोग धरती की पीड़ा को शब्द देने का प्रयास कर रहे हैं, पर कितनों की पीड़ा इस तरह से सामने आई? वे सोन चिरैया की लुप्त होती प्रजाति के लिए चिंतित हैं। 

धूप दिनों-दिन तीखी होती जा रही है। शहरों के दूर वीरानों में इक्का-दुक्का चिड़ियाएं दिखाई दे जाती हैं। घर की मुंडेरों पर चिड़िया दिखाई नहीं देती। घरों की गैलरियों में आजकल नेट लगा दिए गए हैं, जहां चिड़ियों का प्रवेश वर्जित है। उनकी चहचहाट पर हम रोक लगा रहे हैं। हां, बाजारों में चिड़ियों को दाना देने के लिए कुछ उपकरण अवश्य दिखाई देने लगे हैं। ये उपकरण आजकल कुछ घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ध्यान से देखने पर उन उपकरणों में न तो दाना मिलता है और न ही पानी।

20 मार्च को हम गौरैया दिवस मनाते भी हैं। पर उस दिन के बाद कौन याद करता है चिड़ियों को? यदि थोड़ी-बहुत चिड़ियाएं शेष हैं, तो उनके दाना-पानी की व्यवस्था के लिए कितने लोग सचेत हैं? वैसे भी हमारे देश में दिवस केवल दिवस को ही याद किए जाते हैं। कई ऐसे दिवस भी हैं, जिस दिन उस दिवस के नाम पर केवल नाटकबाजी ही होती है। सच्चाई से उसका कोई वास्ता नहीं होता। बहरहाल हम सब महामारी के भीषण दौर से गुजर रहे हैं, जहां इंसानियत के नाम पर रोज ही नाटकबाजी हो रही है। ऐसे में इंसान की क्या औकात? जब इंसान की औकात नहीं है, तो फिर किसे फिक्र है, चिड़ियों को बचाने की? कवियों की पीड़ा, पर्यावरण प्रेमियों की पीड़ा के लिए आखिर किसके पास समय है़?


सोचता हूं भावी पीढ़ी को हम अपने पर्यावरण के बारे में कैसे और क्या बताएंगे? उन्हें चिड़ियों की चहचहाट सुनाने के लिए क्या हमें मोबाइल का सहारा लेना होगा? जंगली जानवरों की आवाज और उनकी आदतों के बारे में वे क्या केवल किताबों या फिर इंटरनेट के माध्यम से ही जान पाएंगे। हमने तो अपने बच्चों को बता दिया कि चिड़ियाएं कैसी होती हैं, उनकी आवाज कैसी होती है, पर वे अपने बच्चों को किस तरह से बताएंगे? हमारी भावी पीढ़ी हम पर किस तरह से गर्व करेगी? आज हम अपने माता-पिता या दादा-दादी, नाना-नानी को याद कर उनकी बातों पर गर्व कर सकते हैं। पर हम भावी पीढ़ी के लिए ऐसा क्या छोड़कर जाएंगे, जिससे उन्हें हम पर गर्व हो? हमने तो केवल बरबादियों का जश्न मनाते देखा है, तो फिर उन्हें कैसे बताएंगे कि चिड़िया कैसे फुदकती थी, कबूतर कैसे गुटरुं गूं करते थे। हिरण कैसे कुलांचे मारते थे, सिंहों का गर्जन कैसा होता था? अरे देखते ही देखते हमारे शब्दकोश से कांव-कांव वाला मुहावरा ही गायब हो गया। हम खामोश होकर शून्य में ताक रहे हैं। इस विजन में चारों तरफ अब हरियाली नहीं, बल्कि कंक्रीट के जंगल ही जंगल दिखाई दे रहे हैं। इन जंगलों में कहीं भी संवेदनाओं की हरी कोंपल तक दिखाई नहीं देती। भावनाओं की लहलहाती फसलों की बात ही छोड़ दो। किसान भरपूर निगाहों से अपने खेत को नहीं देख पाता, खलिहान खुद के लबालब होने का इंतजार कर रहे हैं। सुना है, नदी के पेट को चीरकर बांध बनाने की योजना बन रही है। शहरों के पेट में समाए गांव और बांधों के पेट में समा गई नदियां, ऐसे ही गुज़र जाएंगी सदियां….

डॉ. महेश परिमल




 

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

अकूत प्राकृतिक सम्पदा का स्वामी है यूक्रेन



10 मार्च 2022 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित

अकूत प्राकृतिक सम्पदा का स्वामी है यूक्रेन

डॉ. महेश परिमल

बचपन में सुनी गई कहानियों में तिलिस्मी खजाने की बात निकल ही आती थी। हम लगता था कि कैसा होगा, यह तिलिस्मी खजाना। जिज्ञासाओं की तरंगें दूर तक जाकर लौट आती थीं। हम कल्पना ही नहीं कर पाते थे कि उस तिलिस्मी खजाने में क्या-क्या हो सकता है। पर आज हम रोज ही रुस-यूक्रेन के बीच युद्ध की खबरें पढ़-सुन रहे हैं। वहां होने वाले कोहराम को लेकर हम सभी चिंतित भी हैं। पर यह किसी ने सोचा कि आखिर रुस के लिए यूक्रेन इतना महत्वपूर्ण क्यों है? वास्तव में ऐसा नहीं है, जैसा कि बताया गया है। नाटो की सदस्यता वाली बात तो एक भुलावा है। वास्तविकता यह है कि यूक्रेन के पास जो तिलिस्मी खजाना है, पुतिन की नजर उस पर है। यूक्रेन के पास 21 सदी का सबसे बडृा खजाना अनुपयोगी पड़ा हुआ है। उसके पास इतनी अधिक स्वच्छ ऊर्जा है कि वह भविष्य की औद्योगिक कहानी लिख सकता है। इस तिलिस्मी खजाने का नाम है, लिथियम। जी हां, यूक्रेन के पास लिथियम का सबसे बड़ा भंडार है। रुस की नजर इसी भंडार पर है।

पहले हम लिथियम की विशेषताओं के बारे में जानेंगे। लिथियम एक रासायनिक तत्व है। साधारण परिस्थितियों में यह प्रकृति की सबसे हल्की धातु और सबसे कम घनत्व-वाला ठोस पदार्थ है। रासायनिक दृष्टि से यह क्षार धातु समूह का सदस्य है और अन्य क्षार धातुओं की तरह अत्यंत अभिक्रियाशील (रियेक्टिव) है, यानी अन्य पदार्थों के साथ तेज़ी से रासायनिक अभिक्रिया कर लेता है। लकड़ी से भी हल्का होने के कारण लिथियम का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों में अधिक हो रहा है। क्योंकि भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों का है, इसलिए लिथियम की उपयोगिता बढ़ने लगी है। लिथियम का उपयोग वाहनों की बैटरी बनाने के लिए किया जाता है। यही नहीं मोबाइल फोन एवं लेपटॉप में भी इसका उपयोग होता है। इसकी उपयोगिता के कारण इसके दाम एक साल में चार गुना बढ़ गए हैं। यहां लीथियम ऑक्साइड 5 लाख टन से भी ज्यादा मौजूद है। यूक्रेन में लीथियम रिजर्व के साथ कॉपर, कोबाल्ट और निकेल के भी भंडार हैं। इसी सम्पदा के कारण ही केवल रुस ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों की नजर भी यूक्रेन पर है।

यूरोप में यूक्रेन ही ऐसा एकमात्र देश है, जहां सबसे अधिक यानी चार करोड़ दस लाख लोग शिक्षित हैं। ये लोग कर्मशील है, किसी भी तरह का काम करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। सबसे अधिक यूरेनियम का भंडार भी यूक्रेन के पास है। टाइटेनियम के भंडार के मामले में यूक्रेन दूसरे नम्बर पर है। इसी तरह मैगनीज भंडारके मामले में भी यूक्रेन विश्व में दूसरे नम्बर पर है।2.3 अरब टन यानी विश्व का 12 प्रतिशत मैगनीज यूक्रेन के पास है। लोहे के भंडार के मामले में भी यूक्रेन दूसरे नम्बर पर है। मर्करी यानी पारे के भंडार के मामले में भी यह दूसरे नम्बर पर है। इस समय विश्व की नजर क्रूड आइल पर है, पर इस समय यूक्रेन के पास 22 ट्रीलियन क्यूबिक मीटर्स जितना शेल गैस का भंडार है। इस भंडार के साथ वह पूरे यूरोप में तीसरे नम्बर पर और विश्व में 13 नम्बर पर है। कोयले के भंडार के मामले में यूक्रेन विश्व में सातवें नम्बर पर है। प्राकृतिक सम्पदा के नाम पर यह विश्व के चौथे क्रम में है। सूर्यमुखी तेल के निर्यात में यूक्रेन पहले नम्बर पर है। सबसे अधिक उपजाऊ जमीन भी यूक्रेन के पास ही है। खेतीबाड़ी के विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि यूक्रेन के पास इतनी क्षमता है कि वह 60 करोड़ लोगों का पेट भर सकता है।

यूक्रेन में सबसे अधिक जौ का उत्पादन होता है, इसलिए यहां बीयर विपुल मात्रा में बनाई जाती है। जौ का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक है यह छोटा-सा देश। मुर्गी के अंडों के मामले में यह नौवें क्रम में है। मक्के के उत्पादन में यह देश दुनिया में तीसरे क्रम में है। मक्के के निर्यात में यह चौथे नम्बर पर है। आलू के उत्पादन में भी पूरे विश्व में यह चौथे नम्बर पर है। मधुमक्खी पालन में यूक्रेन पांचवें नम्बर पर है। यहां गेहूं का उत्पादन भी विपुल मात्रा में होता है। गेहूं के निर्यात में यह विश्व में आठवें क्रम में है। अमोनिया गैस के उत्पादन में यूक्रेन यूरोप में सबसे पहले नम्बर पर है।रुस यदि यूक्रेन पर कब्जा कर लेता है, तो उसके अर्थतंत्र को बहुत बड़ा सहारा मिल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इसका उचित तरीके से दोहन किया जाए तो यूक्रेन दुनिया के सबसे बड़े लीथियम रिजर्व देशों में से एक होगा। 

यूक्रेन ने कई बार भारत से यह आग्रह किया है कि वह पुतिन को समझाए। पर भारत की ओर से उसे ठंडा प्रतिसाद मिला है। इसकी वजह भी है। वास्तव में यूक्रेन का रुख कई बार भारत विरोधी रहा है। चीन-पाकिस्तान मिलकर जिस तरह से भारत का परेशान कर रहे हैं, उस मामले में यूक्रेन भारत का साथ नहीं दे रहा है। यूक्रेन ने एक बार नहीं, कई बार भारत का विरोध किया है। कश्मीर मामले में यूक्रेन ने यूएनओ में भारत के विरोध में मतदान किया था। यूएनओ में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए यूक्रेन ने चीन के साथ मिलकर भारत का विरोध किया था। यूक्रेन पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार बेच रहा है। अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठन को यूक्रेन समर्थन दे रहा है। यह तो उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, इसलिए उसने भारत से अपील की है। इस दिशा में भारत ने अभी तक कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिससे यूक्रेन को लाभ मिले। भारत के ठंडे प्रतिसाद से ही यूक्रेन को समझ लेना चाहिए कि भारत उसका साथ पूरी तरह से क्यों नहीं दे रहा है।

डॉ. महेश परिमल


सोशल नेटवर्क:यूक्रेन की जीत-रूस की हार

साइबर वॉर में रूस की बदनामी

डॉ. महेश परिमल

रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध लगातार जारी है। दोनों तरफ से लगातार दावे-प्रतिदावे किए जा रहे हैं। युद्ध के मैदान में भले ही रूस का पलड़ा भारी हो, पर सोशल मीडिया में सहानुभूति बटोरने में यूक्रेन आगे रहा है। इसे उसकी जीत के रूप में देखा जा रहा है। रूस के सैनिक जब यूक्रेन पर हमला कर रहे हैं, तो रूसी सैनिकों को भी आत्मग्लानि हो रही है। उन्हें लगता है कि वे अपने ही भाइयों को मार रहे हैं। कई ऐसे भी देश हैं, जो खुलकर रूस का विरोध तो नहीं कर रहे हैं, पर यूक्रेन को गुप्तरूप से सहायता भी पहुंचा रहे हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन की धमकी का भी उन पर कोई असर नहीं हुआ है। इस तरह से देखा जाए, तो शक्तिशाली होते हुए भी रूस सोशल नेटवर्क पर हार रहा है और कमजोर यूक्रेन जीत रहा है।

रूसी सेनाओं ने यूक्रेन के दो बड़े शहरों पर कब्जा कर लिया है। युद्ध अब अपने आखिर पड़ाव पर है। रूस ने जितनी सैन्य तैयारी यूक्रेन को हराने के लिए की थी, उतनी तैयारी सोशल नेटवर्क पर सेना के हौसले बुलंद करने के लिए नहीं कर पाया। सोशल नेटवर्क के इस मैदान पर रूस की हार हो रही है, उधर कमजोर यूक्रेन अब तक जिस हौसले के साथ उसका मुकाबला कर रहा है, इससे वह लोगों की सहानुभूति बटोरने में कामयाब भी हो रहा है। उस पर सहानुभूति प्रकट करने वालों में रूसी नागरिक भी हैं। सच तो यह है कि युद्ध में सोशल नेटवर्क कहीं भी काम नहीं आता। परंतु लोग युद्ध के बारे में क्या सोचते हैं, इसकी जानकारी सोशल नेटवर्क से ही मिलती है। कुछ लोग इस पर बराबर अपनी नजरें रखते हैं और अपने विचार साझा करते रहते हैं। इस साइबर वॉर में यूक्रेन को सहानुभूति मिल रही है और रूस की लगातार बदनामी हो रही है।

यूक्रेन के विश्वसनीय ट्विटर हेंडल पर लगातार वॉर की जानकारी देखने को मिल रही है। लोगों की उस पर नजर है। परंतु रूव की प्रमुख ट्विटर हेंडल कई मामलों में अपडेट नहीं है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की अपने नागरिकों के साथ सोशल नेटवर्क के माध्यम से लगातार सम्पर्क में रहते हैं। उधर रूस के राष्ट्रपति पुतिन इस मामले में रुखे हैं। पूरे विश्व के रसूखदार लोग सोशल नेटवर्क पर रूस की निंदा करते दिखाई दे रहे हैं। कई लोग उससे नफरत भी करने लगे हैं। 50 लाख समर्थकों वाला रूस का ब्लॉगर यूरी डडे भी अपने देश के खिलाफ है। 

सोशल मीडिया में युद्ध का अवलोकन करने वाले लोगों को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- पहले तो वे लोग हैं, जो युद्ध के दृश्यों को देखते भर है, पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। दूसरे वे हैं, जो युद्ध के खिलाफ हैं और अपने विचार भी व्यक्त कर रहे हैं। तीसरे वर्ग में वे हैं, जो रूस का खुलेआम समर्थन कर रहे हैं और यूक्रेन के राष्ट्रपति को बेवकूफ मान रहे हैं। ये लोग पुतिन के अंधभक्त हैं। चौथे वर्ग में वे हैं, जो इस युद्ध के कारण पूरे विश्व में बढ़ने वाली महंगाई से चिंतित हैं। फरवरी में कई लोगों ने अभियान चलाया था कि रूस का ट्विटर हेंडल बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके बाद भी रूस ने अपने ट्विटर हेंडल पर किसी तरह का बचाव नहीं किया। ज्वाइंट सोशल नेटवर्क फेसबुक, ट्विटर, गूगल, यू-ट्यूब आदि रूस के खिलाफ हैं। रूसी मीडिया पर आने वाली तस्वीरें आदि को फेक्ट चेकिंग सिस्टम से अलग रखने की मांग रूस की अधिकृत मेटावर्स ने की थी, परंतु मेटावर्स ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब रूस में मेटावर्स की सर्विस बंद कर दी थी। गूगल के विज्ञापनों से रूस को होने वाली आय पर अंकुश लग गया। गूगल की अच्छी खासी आय रूस को प्राप्त होती थी। अब हालात यह हैं कि गूगल ऐड सर्विस के तहत मिलने वाले विज्ञापनों में अब रूस को किसी भी तरह का लाभ प्राप्त नहीं होगा।

उधर यू-ट्यूब ने रूसी चैनलों पर विज्ञापन प्रायोजित करना भी बंद कर दिया है। यूक्रेन ने यू-ट्यूब को वहां प्रकाशित रूसी विज्ञापनों को ब्लॉक करने के लिए  कहा है। यूक्रेन की मांगों के जवाब में, यू-ट्यूब ने यूक्रेन में सभी रूसी विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। रशिया टुडे नामक एप्लीकेशन पर भी प्रतिबंध लगाने की यूक्रेन की मांग को यू ट्यूब ने स्वीकार कर ली है। चीनी एप्लीकेशन टिकटॉक पर भारत में प्रतिबंध है, परंतु वह यूक्रेन में युद्ध की तस्वीरें डाल रहा है। चीन भले ही रूस का समर्थन कर रहा हो, इसके बाद भी यूक्रेन के राष्ट्रपति के अनुरोध को स्वीकारते हुए टिकटॉक ने युद्ध का विरोध करने वाले लोगों के संदेशों को भेजना शुरू कर दिया है। बीस लाख फालोअर्स वाले टिकटॉक ने रशिया “ओपन योर आइज’ लिखकर अपनी पोस्ट डाल रहा है। सोशल नेटवर्क पर कई लोग तो बकवास ही करते हैं। इस युद्ध में अमेरिका यूक्रेन को धोखा दिया, इस पर बहुत ही कम लोग अपने विचार रखते हैं। आखिर में यही कहा जा सकता है कि युद्ध के मैदान में भले ही रूस की जीत हो रही हो, पर सोशल प्लेटफार्म पर वही रूस हार रहा है। यूक्रेन लोगों की सहानुभूति बटोर रहा है। युद्ध की समाप्ति के बाद लोग रूस पर लानत-सलामत भेजने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे, यह तय है। उधर यूक्रेन हारकर भी विजेता की तरह अपना सिर ऊंचा रखेगा।

डॉ. महेश परिमल




 

मंगलवार, 8 मार्च 2022

सम्माननीय है नारी....




 



महिला दिवस पर सबेरा संकेत में प्रकाशित





महिला दिवस पर लोकस्वर में प्रकाशित









एक मार्च को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित





बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

"प्यार" जर्मी पर और "लव" आसमान पर



 14 फरवरी 2022 को लोकस्वर में प्रकाशित

14 फरवरी 2022 को लोकोत्तर में प्रकाशित

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

साइबर ठगी की तय हो जवाबदेही

 

5 फरवरी 2022 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित


लालच के कारण बढ़ रहे साइबर फ्रॉड

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश पूनम श्रीवास्तव के बैंक खाते से झारखंड के सायबर अपराधियों द्वारा 5 लाख रुपए की ठगी के सभी आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि सायबर ठगी के मामले में पैसे की सुरक्षा की जिम्मेदारी बैंक की होनी चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने नीरज मंडल उर्फ राकेश, तपन मंडल, शूबो शाह उर्फ शुभाजीत और तौसीफ जमा की जमानत अर्जी पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बैंक में पैसा जमा करने वाले देश के प्रति ज्यादा ईमानदार हैं। हर हाल में उनका पैसा सुरक्षित रहना चाहिए। गरीब और ईमानदार आदमी अपना पैसा बैंक में रखता है। इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। कालाबाजारी करने वाले सफेदपोश लोग पैसा तहखाने में रखते हैं। जो देश के विकास में काम नहीं आता। ऐसा करके वे विकास में रोड़ा उत्पन्न करते हैं। कोर्ट ने कहा कि बैंक यह कहकर नहीं बच सकती कि वह जिम्मेदार नहीं है। इसके साथ ही पुलिस भी यह कहकर नहीं बच सकती कि सायबर अपराधी उनकी पहुंच से दूर नक्सली क्षेत्रों में रहते हैं। सायबर अपराध की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

आखिर सायबर क्राइम क्या है? देखा जाए, तो यह एक ऐसा अपराध है, जिसमें कंप्यूटर या मोबाइल एक वस्तु के रूप में हमारे सामने होता है। हेकिंग, फिशिंग, स्पैमिंग को एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इस अपराध में किसी के कंप्यूटर या मोबाइल को हैक कर उससे उसकी सारी गोपनीय सूचनाएं निकाल ली जाती हैं। उसके बाद इन सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति को डरा-धमकाकर ब्लेकमेल किया जाता है। इस अपराध में अपराधी सामने नहीं होता, केवल उसकी आवाज ही होती है, इसलिए ठगी का शिकार व्यक्ति कुछ न कर पाने की स्थिति में होता है। इसके अलावा ठगी करने वाला अपने शिकार से कुछ इस तरह से बातचीत करता है, जिससे वह प्रभावित हो जाता है। बिना किसी परिश्रम के कुछ ही समय में वह लाखों रुपए का मालिक बन जाने का सपना देखना शुरू कर देता है। यही दीवास्वप्न उसे ठगी का शिकार बना देता है।

व्यापार-उद्योग तथा दैनंदिन जीवन में डिजिटल ट्रांजेक्शन और इंटरनेट का वर्चस्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में साइबर क्राइम या ऑनलाइन फ्रॉड की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। अकेले गुजरात में ही करीब 5 लाख औद्योगिक कारखाने हैं। इसमें से केवल 15 प्रतिशत से भी कम कंपनियां साइबर सिक्योरिटी का उपयोग कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे साइबर क्राइम के कारण साइबर सिक्योरिटी एक नई इंडस्ट्रीज के रूप में उभर रही है। अब देश भर में साइबर सिक्योरिटी का बाजार डेढ़ लाख करोड़ रुपए वार्षिक पार कर गया है।

सायबर ठगी के बढ़ते मामलों को देखते हुए सूचना एव प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के तहत इस पर नियंत्रण का काम शुरू किया। इधर जैसे-जैसे सख्ती बढ़ती गई, अपराधियों ने भी नए-नए पैंतरे लगाने शुरू कर दिए। अब तो ठगी के कई नए तरीके सामने आ गए हैं। इस दिशा में पुलिस अभी तक पूरी तरह से सजग नहीं हो पाई है। सायबर सेल का अलग विभाग बना देने के बाद भी वहां आज भी अपने मोबाइल के खो जाने की रिपोर्ट लिखवाने के लिए कई बार चक्कर लगवाया जाता है। कुल मिलाकर पुलिस इस दिशा में अभी तक सचेत नहीं हुई है। इसलिए सायबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। कोर्ट की फटकार के बाद भी पुलिस अपनी जवाबदेही से बचना चाहती है।

इस अपराध में सबसे बड़ी बात यह है कि लोग आधुनिक तकनीक की पूरी जानकारी नहीं रखते। थोड़ी-सी ही जानकारी के आधार पर लोग अपने डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड आदि का प्रयोग असावधानीवश करते रहते हैं। इस अपराध में अपराधी सामने नहीं होता। वह सुदूर क्षेत्रों में या फिर विदेशों में बैठकर भी यह अपराध कर लेता है। अधिकारियों की लापरवाही के कारण इन सायबर अपराधियों को मौका मिल जाता है। इसके अलावा दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों में लालच का भाव भरा हुआ है। मुफ्त में मिलने वाली किसी भी चीज के लिए वे इंकार नहीं करते। इसलिए वे प्रलोभन का शिकार हो जाते हैं। अपराधी उनकी इसी कमजोरी का पूरा फायदा उठाते हुए उन्हें ठग लेते हैं। सामान्य जनता आधुनिक संसाधनों का खूब इस्तेमाल करती है, पर सजगता नहीं होने के कारण वह अक्सर ठगी का शिकार हो जाती है। जनता यह नहीं सोचती कि आजकल कोई आपको मुफ्त में आधी कप चाय नहीं पिलाता, तो फिर वह क्यों केवल आपको लाखों रुपए यूं ही दे देगा। ये अपराधी मानव की भीतर की लालसा को जगाकर उनसे ठगी कर लेते हैं। बैंक द्वारा बार-बार यह आग्रह किया जाता है कि किसी अनजान को कभी अपना मोबाइल नम्बर, आधार नम्बर या ओटीपी न दें। बैंक कभी किसी से फोन पर किसी भी तरह की जानकारी नहीं मांगती। फिर भी लोग लालच में आकर ठगी का शिकार हो जाते हैं।

व्यापार में वेल्थ क्रिएट करने के लिए और अपने व्यापार को बनाए रखने के लिए साइबर सुरक्षा अनिवार्य हो गई है। वैश्विक स्तर पर कार्पोरेट बिजनेस में साइबर फ्रॉड की संख्या लगातार बढ़ रही है। हर साल 6 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान साइबर फ्रॉड से विश्व को हो रहा है। देश में औसतन 25 हजार करोड़ से अधिक का नुकसान साइबर फ्रॉड के कारण हो रहा है। इसमें लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। डिजिटल ट्रांजेक्शन में धोखाधड़ी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। साइबर क्राइम फ्रॉड में महाराष्ट्र और दिल्ली सबसे ऊपर हैं। सरकार इस दिशा में सक्रिय होकर लोगों को लगातार साइबर क्राइम की ओर जागरूक कर रही है। पर जब तक लोगों में जागृति नहीं आएगी, तब तक लोग साइबर फ्रॉड के शिकार होते रहेंगे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी इस संबंध में यह सोचने को विवश करती है कि सायबर अपराधियों पर किस तरह से रहम किया जाए। उनकी जमानत अर्जी को क्यों मंजूर की जाए? इन अपराधियों ने लोगों के सपनों को कुचलने का प्रयास किया है। लोगों की मेहनत की कमाई को एक झटके में झटक लेने का काम किया है। उनके सपनों को ऐसे ही चूर-चूर नहीं किया जा सकता। अब तो सरकार को भी इस दिशा में सख्त से सख्त कार्रवाई वाले प्रावधानों को जोड़ा जाना चाहिए। लोगों को भी यह कहना है कि अपनी मेहनत की कमाई को यूं ही लालच के कारण किसी के हाथों में न जाने दें। अपनी गोपनीयता को बनाए रखें। सरकार एवं बैंकों द्वारा जो भी निर्देश दिए जाएं, उनका पूरी ईमानदारी से पालन किया जाए। यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं, तो उन्हें अपने कर्तव्य के प्रति भी सजग होना होगा, तभी सायबर अपराध पर अंकुश लगाया जा सकता है।

डॉ. महेश परिमल



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