मंगलवार, 23 जून 2026

धधकती धरती से दूर भागता मानसून





 

बुधवार, 17 जून 2026

स्पर्श की अनुभूति

 












बुधवार, 22 अप्रैल 2026

सबक देती सजाएँ




सबेरा संकेत 22 अप्रैल 2026 

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

बेशुमार दौलत आखिर किसके लिए?



 




सोमवार, 16 मार्च 2026

साइबर अपराध:- डाल-डाल...हम पात-पात

















 

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

मिठाई से मोहभंग और मेवों का उभरता बाजार

 




 




सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

हाइवे बन सकता है पिकनिक स्पॉट






 सबेरा संकेत के 12 अक्टूबर 2025 के अंक में प्रकाशित

बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

कुछ कहता है हर शहर


 




बुधवार, 17 सितंबर 2025



अमर उजाला 7 सितम्बर 2025


सबेरा संकेत 17 अगस्त 2025

 

सोमवार, 16 जून 2025

वात्सल्य के स्रोत

 



















गुरुवार, 15 मई 2025

खत्म होती प्याऊ की परंपरा








 




शनिवार, 3 मई 2025

दम तोड़ती प्याऊ की परंपरा




एक परंपरा की मौत
डॉ. महेश परिमल
किसी समाज या समूह में लंबे समय से चली आ रही किसी परंपरा का अंत हो जाना कई बार खुशियां देता है, पर कई बार यह भीतर से रुला देता है। कई परंपराएं या तो किसी कारण से धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं या अचानक किसी घटना के कारण समाप्त हो जाती हैं। समाज में कई परंपराएं जन्म लेती हैं और कई टूट जाती हैं। परंपराओं का प्रारंभ और अंत विकासशील समाज के लिए आवश्यक भी है। परंपराएं टूटने के लिए ही होती हैं। पर कुछ परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका टूटना मन को दु:खी कर जाता है। पर जो अच्छी परंपराएं हमारे देखते ही देखते समाप्त हो जाती हैं, उसे परंपरा की मौत कहा जा सकता है। कुछ ऐसा ही अनुभव तब हुआ, जब पाऊच और बोतल संस्कृति के बीच प्याऊ की परंपरा को दम तोड़ते देख रहा हूं।
पहले गांव, कस्बों और शहरों में कई प्याऊ देखने को मिल जाते थे। जहां टाट से घिरे एक कमरे में रेत पर रखे पानी से भरे लाल रंग के घड़े होते थे। बाहर एक टीन की चादर को मोड़कर पाइपनुमा बना लिया जाता था। पानी कहते ही भीतर कुछ हलचल होती और उस पाइपनुमा यंत्र से ठंडा पानी आना शुरू हो जाता था। प्यास खत्म होने पर केवल अपना सर हिलाने की जरूरत पड़ती और पानी आना बंद। जरा अपने बचपन को टटोलें, इस तरह के अनुभवों का पिटारा ही खुल जाएगा। अब यदि आपको उस पानी पिलाने वाली बाई का चेहरा याद आ रहा हो, तो यह भी याद कर लें कि कितना सुकून हुआ करता था, उसके चेहरे पर। एक अजीब-सी शांति के दर्शन होते थे, उसके चेहरे पर। इसी शांति और सुकून को कई बार मैंने उन मांओं के चेहरे पर देखा है, जब वे अपने बच्चे को दूध पिलाती होती हैं।
कई बार रेल्वे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता है। पानी पिलाने वालों की केवल यही प्रार्थना होती, जितना चाहे पानी पीयें, चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बरबाद न करें। उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हों, पर आज जब उन्हीं रेल्वे स्टेशनों में पानी बोतलें खरीदनी पड़ती हैं, तब समझ में आता है कि सचमुच उनकी प्रार्थना का कोई अर्थ था।  अब तो रेल्वे स्टेशनों में नल के पास पानी की बोतलें बेचने वाला वेंडर होता है। लोग नल तक पानी लेने पहुंचते हैं, पर नल से पानी नहीं आता। उसे खराब कर दिया जाता है, उसी वेंडर द्वारा। ताकि लोग नल के करीब आएं और नल से पानी न आने पर उससे पानी की बोतलें खरीदें। छलावे का यह खेल अब हर स्टेशन में देखने को मिल जाता है।
मुहावरों में 'पानी पिलाना' यानी भले ही मजा चखाना होता हो, पर यह सनातन सच है कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। अच्छी भावना के साथ किसी प्यासे को पानी पिलाना तो और भी पुण्य का काम है। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। कार्यालयों में उस चपरासी या पानी वाली बाई को ही देख लें, जो पूरे समर्पण भाव से लोगों को पानी पिलाने का पुण्य कार्य करते हैं। हालांकि वे इस कार्य को अपनी डयूटी समझते हैं। पर यह सच है कि जब वे हमें गिलास में पानी देते हैं, तब उनके चेहरे पर एक सुकून होता है। वह सुकूनभरा चेहरा अब आपको और कहीं नहीं मिलेगा। अब यह परिदृश्य धीरे-धीरे बदल रहा है। अब तो टेबल पर पानी की एक बोतल और एक गिलास रखा होता है, जब प्यास लगे, आप स्वयं पी सकते हैं।
समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, पर अच्छी परंपराएं जब देखते ही देखते दम तोड़ने लगती है, तब दु:ख का होना स्वाभाविक है। पुरानी सभी परंपराएं अच्छी थीं, यह कहना मुश्किल है, पर कई परंपराएं जिसके पीछे किसी तरह का कोई स्वार्थ न हो, जिसमें केवल परोपकार की भावना हो, उसे तो अनुचित नहीं कहा जा सकता। उस प्याऊ परंपरा में यह भावना कभी हावी नहीं रही कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। मात्र कुछ लोग चंदा करते और एक प्याऊ शुरू हो जाता। अब तो कहीं-कहीं प्याऊ के उद्धाटन की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं, पर कुछ दिनों बाद वह या तो पानी बेचने का व्यावसायिक केंद्र बनकर रह जाता है या मवेशियों का आश्रय स्थल...
कल्पना करें, कोई राहगीर दूर से चलता हुआ किसी गांव या शहर में प्रवेश करता है, उसे प्यास लग रही है। वह पानी की तलाश में है, तब उसे कहीं प्याऊ दिखाई देता है। जहां वह छककर ठंडा पानी पीता है, उसकी आत्मा ही तृप्त हो जाती है। वह आगे बढ़ता है, बहुत सारी दुआएं देकर। यही दुआएं जो उसके दिल से निकली, कभी बेकार नहीं गई। आज एक गिलास पानी भी बड़ी जद्दोजहद के बाद मिलता है। ऐसे में कहां की दुआ और कहां की प्रार्थना? देखते ही देखते पानी बेचना एक व्यवसाय बन गया। यह हमारे द्वारा किए गए पानी की बरबादी का ही परिणाम है। आज भले ही हम पानी बरबाद करना अपनी शान समझते हों, पर सच तो यह है कि यही पानी एक दिन हम सबको पानी-पानी कर देगा, तब भी हम शायद समझ नहीं पाएंगे, एक-एक बूंद पानी का महत्व।
डॉ. महेश परिमल










मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

गर्मी में तपिश से राहत के उपाय


















 














गुरुवार, 20 मार्च 2025

प्रकृति का राग पतझड़ हमारे लिए एक सीख

 


शनिवार, 15 मार्च 2025

बचपन को जीने का दिन है होली

















 

शुक्रवार, 31 जनवरी 2025

...और मौत कुचलते हुए निकल गई...

हम सब उत्सवप्रेमी हैं। उत्सव मनाना हमें अच्छा लगता है। उत्सव के लिए हमें चाहिए व्यक्ति और इससे अपने आप ही जुड़ जाता है शोर। जैसे ही एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मिलता है, तो खामोशी वहां से विदा ले लेती है। रह जाता है केवल शोर। यह व्यक्तियों के आपस में मिलने का एक उपक्रम है। कहा गया है कि भीड़ के पास विवेक नहीं होता। भीड़ में केवल सिर ही होते हैं। इनसे किसी अच्छी चीज की कल्पना ही नहीं करनी चाहिए। यही कारण है कि आज जहां देखो, वहां भीड़ है। ये भीड़ कुछ भी कर सकती है। क्योंकि ये व्यक्तियों की नहीं, बल्कि अज्ञानियों की भीड़ होती है। अज्ञानी कहीं भी कुछ भी कर अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं। यही प्रदर्शन आजकल कई स्थानों पर देखा जा रहा है। इस बार हमने देखा और जाना कि किस तरह से आस्था का सैलाब उमड़ा, भक्ति के रंग में रमा भीड़ तंत्र एक बार फिर मौत का सामना करता हुआ दिखाई दिया। लोगों को कुचलते हुए निकल गई मौत। बेबस इंसान कुछ नहीं कर पाया। प्रबंधन वह भी ई प्रबंधन के सारे प्रयास निष्फल साबित हुए। भीड़ नाम की मौत आई और शायद 30 लोगों को लील गई। कई घायल हैं, जो इलाज के लिए अस्पतालों में कैद हैं। इसके पहले भी देश में भीड़ तंत्र ने कई बार तबाही मचाई है। इस बार भी वही हुआ, जिसका अंदेशा था। आखिर भीड़ में कहां चली जाती है इंसानियत? भीड़ में व्यग्रता होती है। उतावलापन दिखाई देता है। धैर्य से इसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता। इसलिए धक्का-मुक्की भीड़ के लिए साधारण-सी बात है।

इस भीड़तंत्र में भी एक चीज सदैव सक्रिय रहती है, वह है अफवाह। इस अफवाह के हाथ-पांव नहीं होते, इसलिए यह तुरंत ही एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंच जाती है। इस दौरान यह कई रूपों में परिवर्तित हो जाती है। इसका स्वरूप हर बार बदल जाता है। आश्चर्य इस बात का है कि इस पर कोई अविश्वास भी नहीं करता। सहसा विश्वास करके भीड़ के अंदर घुसकर यह अफवाह कई जानें ले लेती है। कई को बेसहारा कर देती हैं। कई को विकलांग बना देती है। लोग दबे और कुचले जाते हैं। यह हर स्थान पर सक्रिय होती है। फिर चाहे वह रेल्वे स्टेशन हो, मंदिर हो या फिर किसी गुरु-महाराज का प्रवचन स्थल हो। हर स्थान पर इसकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि यह कहीं भी पहुंच जाती है।
अफवाह के चलते यदि किसी का नुकसान होता है, तो वह है आम आदमी। आज तक भीड़ तंत्र ने कभी किसी वीआाईपी को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसका शिकार हमेशा आम आदमी ही होता है। इस बार भी महाकुंभ में करोड़ों लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई। इन्होंने समझा कि उनके सारे पाप धुल गए। गंगा मैया ने उनके सारे पाप धो दिए। अब जब भीड़ ने कई मौतें दे दी, तब समझ में आ रहा है कि उनके पाप धुले नहीं थे। वे भी आम इंसान ही थे। कुछ वहां पहुंचकर तो कुछ वहीं कुचले गए और मारे गए। इसके पहले मीडिया में रोज ही प्रायोजित खबरें आ रहीं थीं। सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था, पर अचानक ये क्या हो गया? कहां चली गई मानवता? कहां था विवेक और कहां था ई मैनेजमेंट? सब कुछ एक झटके में ही तबाह हो गया। इस भीड़ तंत्र में एक बात है कि लोग भीड़ देखने के लिए निकल पड़ते हैं। अनजाने में वे भी भीड़ का एक हिस्सा ही बन जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता कि वे भी भीड़ का एक हिस्सा ही हैं। भीड़ तंत्र इसी एक हिस्से को अपना शिकार बना लेता है। मौत उन्हें कुचलती हुई निकल जाती है। भीड़तंत्र में एक अजीब-सा दीवानापन होता है। लोग एक-दूसरे पर चढ़कर भी अपने लिए सुरक्षित स्थान तलाशने में कोताही नहीं करते। उन्हें कोई मतलब नहीं कि उसके पांव के नीचे कौन आ रहा है? इस भीड़ को केवल रौंदना ही आता है। भीड़ रौंदते हुए आगे बढ़ती है। इसका सजीव चित्रण हमने टीवी में देखा ही होगा।
महाकुंभ में भीड़ बढ़ाने के पीछे आस्था के साथ-साथ कई कारक काम कर रहे हैं। भक्ति में डूबे लोग ट्रेन से जाना पसंद करते हैं। हमारे देश में ट्रेन का सफर अब पहले से अधिक कष्टदायक हो गया है। पहले बिना आरक्षण के किसी भी तरह से जगह मिल ही जाती थी। अब आरक्षण के बाद भी यह संशय होता है कि जगह मिलेगी या नहीं? कब किन हालात में कौन-सी ट्रेन रद्द हो जाए, कहा नहीं जा सकता। आजकल ट्रेनों के रद्द होने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। महाकुंभ के लिए सैकड़ों स्पेशल ट्रेनें चलीं, फिर भी यात्रियों की संख्या में कोई कमी दिखाई नहीं दी। लोग बढ़ते गए, आस्था का सैलाब उमड़ता रहा। भक्ति में लीन भीड़ तंत्र भी सक्रिय होता रहा। आजकल अखबारों में अक्सर पढ़ने को मिलता है कि इतनी ट्रेनें रद्द हुई। इसे पढ़ते ही वे लोग अधिक परेशान होते हैं, जिन्होंने दो महीने पहले से अपना रिजर्वेशन कराया होता है। वे अब क्या करें? इसके लिए रेल्वे के पास कोई विकल्प नहीं होता। रेल्वे का इस बारे में यही कहना होता है कि विकास के लिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ रहा है। पर ऐसे विकास को कौन स्वीकार करेगा, जो उन्हें परेशान कर दुविधा में डाल दे।
इस बार महाकुंभ में जो कुछ हुआ, उसके पीछे वीआईपी कल्चर भी जिम्मेदार है। विशेष लोगों को दी जा रही विशेष सुविधा से आम आदमी की सुविधा में कटौती होती है। हर बार आम आदमी ही भीड़ का शिकार होता है। वीआईपी अक्सर बच ही जाते हैं। आम आदमी बार-बार भीड़ तंत्र का शिकार होता है। वही भीड़, जिसके पास सिर तो होते हैं, पर विवेक नहीं होता।  क्या शासन के पास कोई ऐसी योजना है, जिससे वह भीड़तंत्र का सामना कर सके।
डॉ. महेश परिमल

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