मंगलवार, 29 नवंबर 2022

 



29 नवम्बर 2022 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित आलेख




मंगलवार, 22 नवंबर 2022

डेटिंग एप के धोखे से बचना आवश्यक

22 नवम्बर 2022 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित





 

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2022

जानलेवा साबित होती निष्क्रिय जीवनशैली

 

17 अक्टूबर 2022 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संसकरण में प्रकाशित




शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

गायब होती कुदरत की छाँव


एक अक्वृटूबर वृद्धजन दिवस पर जनसत्ता और सबेरा संकेत में आलेखों का प्रकाशन






 

बुधवार, 28 सितंबर 2022


सबेरा संकेत राजनांदगाँव में 25 सितम्प्रबर 22 को काशित




 




                                                                30 सितम्बर 22 को प्रकाशित




30 सितम्बर 22 को प्रकाशित

रविवार, 18 सितंबर 2022

बिखरती भावनाएँ, लुप्त होते कौवे

 


दैनिक सबेरा संकेत राजनांदगांव में 18 सितम्प्रबर 22 को प्रकाशित









लाकस्वर बिलासपुर में 18 सितम्बर 2022 को प्रकाशित


शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

जानलेवा साबित होती लापरवाही











 

रविवार, 28 अगस्त 2022

राम की तरह वापस आना....

 



सबेरा संकेत में 28 अगस्त 2022 को प्रकाशित


दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 27 अगस्त 2022 को प्रकाशित

बुधवार, 20 जुलाई 2022

तंगहाली में दिन काटता हर्षद मेहता का परिवार

 



बदहाल हर्षद मेहता का परिवार कहते हैं कि चढ़ते सूरज को हर कोई सलाम करता है। आज जिसके पास धन-दौलत और प्रसिद्धि है, उसके साथ हजारों की भीड़ है। एक समय ऐसा भी था, जब बिगबुल के नाम से प्रसिद्ध हर्षद मेहता के साथ हजारों लोग थे। शेयर बाजार में उसकी तूती बोलती थी। मंत्री से लेकर संत्री तक उसके गुणगान करते थे। उसके साथ अनेक चाटुकार भी थे। पर समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। आज हर्षद मेहता का परिवार तंगहाली और बदहाली में जी रहा है। पिछले दो दशक से उनका परिवार बिना बैंक एकाउंट के जी रहा है। हाल ही उनकी पत्नी ज्योति मेहता ने एक वेबसाइट शुरू की है, जिसमें उसने बताया कि हर्षद मेहता को एक घपलेबाज के रूप में प्रचारित किया गया है। उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। उन पर फिल्म और वेबसीरीज भी बन गई। उनके नाम पर लाखों रुपए भी कमा लिए गए। पर किसी ने मेहता परिवार की सुध नहीं ली। ज्योति मेहता ने यहां तक कहा है कि हर्षद मेहता को जब जेल में अटैक आया, तो उन्हें समुचित इलाज नहीं मिला। हमने कई बार इस दिशा में सरकार का ध्यान आकृष्ट किया, पर न तो उनकी मौत की जांच हुई, न ही उनके शव का पोस्टमार्टम किया गया। शेयर बाजार से किस तरह कमाई की जा सकती है, इसे सिखाया हर्षद मेहता ने। एक समय उन्हें बिगबुल की रूप में पहचाना जाता है, आज उसे घपलेबाज बताया जा रहा है। आज भी जब कभी शेयर बाजार औंधे मुंह गिरता है, तो लोग हर्षद मेहता को ही याद करते हैं। उसके शाही ठाठ के खूब चर्चे थे। आज उनके परिवार की सुध लेने वाला कोई नहीं है। देश में आर्थिक उदारीकरण के दौर में सन 1990 के दशक में अरबों रुपयों का आर्थिक घोटाला प्रकाश में आया, तो उसके सूत्रधार के रूप में हर्षद मेहता का नाम सामने आया। बैंकों की असावधानी उसकी कमजोरी का पूरा लाभ उठाते हुए हर्षद मेहता ने बैंक के रुपए को बाजार में चलाया। जब यह घपला सामने आया, तब शेयर बाजार बुरी तरह से औंधे मुंह गिरा। इसका असर यह हुआ कि छोटे निवेशकर्ताओं की हालत ही खराब हो गई। इसके लिए हर्षद मेहता को दोषी माना गया। इसके बाद हर्षद मेहता अतीत का हिस्सा हो गए। बीस साल बाद उनकी पत्नी ज्योति ने एक वेबसाइट शुरू की। जिसमें उसने पति हर्षद मेहता की छवि को जानबूझकर खराब करने का आरोप लगाया। वेबसाइट में ज्योति ने लिखा है कि जब से हर्षद मेहता की मौत हुई है, तब से हमारी जिंदगी को मानों लकवा मार गया है। वेबसाइट में सुचेता दलाल का भी जिक्र किया गया है। सुचेता ने ऐसी तकनीक अपनाई थी कि उसका नाम कहीं भी न आए आए, तो घोटाले का पूरा ठीकरा हर्षद मेहता के सर पर फोड़ा जाए। वेबसाइट में ज्योति मेहता ने लिखा है कि मेरे पति हर्षद मेहता को 47 की उम्र में हार्ट अटैक से मौत हो गई। उन्हें पहली बार जब अटैक आया, तब डॉक्टर ने उन्हें सार्बीट्रेट के सिवाय और कोई दवा नहीं दी थी। उन्हें हॉस्पिटल में भी शिफ्ट नहीं किया गया। चार घंटे बाद जब उन्हें दूसरा अटैक आया, तब उन्हें थाणे के हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। जब उन्हें थाणे के हॉस्पिटल में लाया गया, तब उन्हें उनके कमरे तक चलाते हुए ले जाया गया। उन्हें व्हील चेयर मुहैया नहीं कराई गई। जब वे बुरी तरह से थक गए, तब उन्हें व्हील चेर पर बिठाया गया। वहीं उनकी मौत हो गई। तब हमने इसकी जांच कराने और शव का पोस्टमार्टम करने की मांग की। पर हमारी किसी ने नहीं सुनी। उनकी मौत की जानकारी उसी जेल में उसके बाजू वाली कमरे में कैद उनके भाई को भी नहीं दी गई। अब मेहता परिवार यह कहता है कि 1993 से हम टैक्स टेरिज्म के शिकार बने हैं। हमें बलि का बकरा बनाया गया है। जांच के दौरान हमने सरकार और जांच एजेंसी को पूरा सहयोग दिया है। इसके बाद भी हमें बदनाम किया गया है। अदालत द्वारा हर्षद मेहता को अपराधी साबित करने के पहले मीडिया ने उन्हें अपराधी घोषित कर दिया। उन्हें स्केम मास्टर के रूप में प्रचारित किया गया। उनकी मौत के बाद उन पर क्रिमिनल केस नहीं चलाना संभव नहीं था, उन पर कोई आरोप भी सिद्ध नहीं हो पाए थे। इसके बाद भी उन पर केंद्रित वेबसीरीज बनाई गई। जिसका टाइटल ही गलत है। हर्षद मेहता की पत्नी ज्योति ने 20 साल बाद मुंह खोला है। तब तक हर्षद मेहता के नाम पर बहुत कुछ बिक गया है। देश को आर्थिक रूप खोखला करने वाले बहुत से लोग हुए हैं। पर किसी के साथ हर्षद मेहता जैसा व्यवहार नहीं हुआ है। देश को बहुत से लोगों ने अपने-अपने तरीके से नुकसान पहुंचाया है। पर आज वे सभी सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे हैं। पर हर्षद मेहता का परिवार आज किस हालत में है, इसे कोई जानना नहीं चाहता। उनके नाम पर बनने वाली फिल्म और वेबसीरीज को सभी ने सराहा, पर मूल पात्र के परिवार की हालत कैसेी है, यह जानने की फुरसत किसी को नहीं है। देश में एक से एक भ्रष्ट लोग हैं, जिसमें अधिकांश राजनीति में हैं, पर सभी बेदाग माने जाते हैं। जिसने बैंकों की कमजोरी का फायदा उठाकर उसकी राशि से अपना बिजनेस बढ़ाया, आज उसका परिवार तंगहाली और बदहाली में जी रहा है। इसे क्या कहा जाए? डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

व्यक्तित्व में छिपा आभामंडल

 



12 जुलाई 2022 को जनसत्ता में प्रकाशित


11 जुलाई 2022 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित



व्यक्तित्व दर्शाता है आभामंडल

आपने कभी ध्यान दिया कि कोई व्यक्ति हमें बहुत अच्छा लगता है। कोई बिलकुल भी नहीं सुहाता। किसी के पास बैठना ही बहुत भला लगता है, तो किसी के चेहरा ही हमारे भीतर वितृष्णा जगा देता है। कभी किसी की आवाज ही सुन लो, तो मन को शांति मिलती है। कभी अचानक ही कोई याद आ जाए, तो मन में बुरे विचार आने लगते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? यह जानने की कोशिश की आपने? नहीं ना? इसका सीधा-सा संबंध है, सामने वाले की मानसिकता पर। अगर हमें कोई अच्छा लगता है, तो इसका आशय यही है कि उसके शरीर से निकलने वाली ऊर्जा हमें कुछ नया करने के लिए प्रेरित कर रही है। कुछ लोग हमें बिलकुल भी नहीं भाते, तो इसका आशय यही है कि उसके भीतर की पूरी नकारात्मकता हमारे भीतर प्रवेश करने लगती है।

मनुष्य का चेहरा उसके व्यक्तित्व का आईना होता है। उसके चेहरे के पीछे होता है आभामंडल। यह आभामंडल व्यक्ति का लेखा--जोखा होता है। इसे हम बैंलेंस सीट भी कह सकते हैं। व्यक्ति के प्रत्येक अच्छे कार्य से आभामंडल का निर्माण होता है। इसके विपरीत प्रत्येक बुरे कार्य से वह कमजोर होता है। जो लोग निरंतर प्रेम, दया और स्नेह भाव से दुनिया को चालते हैं, उनके आभामंडल की ज्योति लागतार बढ़ती जाती है। ऐसे लोगों से मिलकर हमें असीम शांति की प्राप्ति होती है। बुरे आचारण वाले व्यक्ति का आभामंडल होता तो है, पर उसमें किसी भी तरह का आकर्षण नहीं होता।  हमने अपने देवी-देवताओं की तस्वीरें देखीं होंगी। जिसमें उसके सिर के पीछे एक चमकता हुआ गोला दिखाई देता है। इसे हम आभामंडल कहते हैं। हमारे आराध्यों के साथ ही ऐसा कई महापुरुषों के साथ भी देखा गया है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरुनानक की तस्वीर देख लो, तो वे हमें आशीर्वाद देते दिखाई देते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानों उनका एक हाथ हमें आशीर्वाद दे रहा हो। वास्तव में यह आभामंडल ही है, जो हमें सदैव कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है। यह आभामंडल केवल देवी-देवताओं, संतों में ही नहीं, बल हम सबके साथ होता है। देवी-देवताओं से हमारी भावनाएं जुड़ी होती हैं, इसलिए उनका आभामंडल हमें दिखाई देता है, पर जिन व्यक्तियों का सान्निध्य पाकर हम निहाल हो जाते हैं, निश्चित रूप से उनका आभामंडल हमें प्रेरित करता है, अच्छे कार्यों के लिए। यह कहा गया है कि जिस व्यक्ति का आभामंडल जितना तेजस्वी होता है, वह व्यक्ति उतना ही समर्थ माना जाता है। 

ज़रा अपने बचपन की ओर लौटे, जब हमें सात रंगों के बारे में समझाया जाता था। इसका हमें एक सूत्रशब्द रटाया जाता था। "बैनीआहपीनाला" इसका आशय यह हुआ कि बैंगनी, नीला, आसमानी, पीला, नारंगी और लाल। इस सूत्र को यदि विस्तार से देखें, तो यह सीधे अध्यात्म से जुड़ जाता है। अध्यात्म के उपासकों के अनुसार हम सभी के शरीर में सात चक्र स्थित हैं। इस सातों चक्रों के साथ ये सात रंग सम्बद्ध हैं। इसीलिए सच्चे साधु-संतों के सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति एक प्रकार की मानसिक शांति प्राप्त करता है। इसकी वजह यही है कि संतों की ऊर्जा इतनी सघन होती है कि वे यदि केवल आशीर्वाद की मुद्रा में अपना हाथ सिर पर रख दें, तो हमारे सारी पीड़ाओं का अंत हो जाता है। 

सवाल यह उठता है कि व्यक्ति अपनी आभामंडल का विस्तार किस तरह से कर सकता है? तो इसका सीधा-सा उपाय है, ध्यान, सकारात्मक विचार, सत्साहित्य का अध्ययन, सात्विक आहार और निर्व्यसन से हम अपने आभामंडल को शक्तिशाली बना सकते हैं। एक बार यह आभा सशक्त हो जाए, तो उसके बाद जीवन के हर क्षेत्र में इसका प्रभाव बढ़ता है। वह जिस क्षेत्र में हो, वहां उपलब्धियां हासिल करता रहता है। मेडिकल साइंस में होने वाले शोध से यह पता चला है कि इस आभामंडल के माध्यम से भविष्य में होने वाली बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है। अध्यात्म में रचे-बसे व्यक्तियों के अनुसार हर व्यक्ति के आसपास चार से आठ इंच तक की आभा फैली होती है। मस्तक के नीचे ब्रह्मरंध्र में सहस्रार चक्र का रंग बैंगनी होता है। तो सबसे नीचे जननांगों के पास मूलाधार चक्र का रंग लाल होता है। हर आभा के साथ गूढ़ अर्थ जुड़ा है। उदाहरण के लिए संतों या देवी-देवताओं के आभामंडल का रंग आसमानी होता है। जिनकी आभा का रंग पीला होता है, ऐसे लोगों में नेतृत्व क्षमता होती है। नारंगी रंग के आभामंडल वाले लोग संवेदनशील होते हैं। लंबवत आकार वाली आभा में एक दरार दिखाई देती है। यह आभा खंडित होती है। इस भविष्य मउसे होने वाली बीमारी का जानकारी मिलती है। हाल ही में एक दक्षिण भारतीय किशोरी के बारे में पता चला है, जो सामने वाले व्यक्ति की आभा को देख सकती है। यह उसके लिए प्रकृति से प्राप्त वरदान है। किशोरी यह बता सकती है कि सामने वाले व्यक्ति की आभा कैसी है। बहुत ही कम लोगों में यह क्षमता होती है। यदि इस शक्ति का उपयोग सकारात्मक रूप से हो, तो यह समाज के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हो सकती है। बहरहाल किशोरी के माता-पिता अपनी बेटी की इस क्षमता का अधिक प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहते। उनका मानना है कि बेटी अभी केवल पढ़ाई करे, ताकि उसका भविष्य संवर सके।

समय के साथ--साथ आभामंडल में लगातार अभिवृद्धि होती रहती है। जो व्यक्ति जितना अधिक अतीत का हिस्सा होगा, उसका आभामंडल उतना ही सघन होता है। हमारी जिसमें असीम श्रद्धा होगी, तभी हम उनका आभामंडल देख पाएंगे। हृदय की शुद्धता का आभामंडल का सीधा संबंध है। यह धार्मिक व्यक्तियों पर अधिक लागू होता है। एक सघन आभामंडल वाले व्यक्ति के सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों का भी आभामंडल तैयार होता रहता है। वे भी धीरे--धीरे अपने क्षेत्र में विकास करते रहते है। कुल मिलाकर आशय यही है कि यदि हम अपने आसपास के व्यक्तियों पर एक दृष्टि डालें, तो हमें समझ में आ जाएगा कि किस व्यक्ति का आभामंडल कैसा है? फिर हम अपनी दिनचर्या पर ध्यान दें कि किसके करीब होने से हमें सब-कुछ अच्छा लगता है। ऐसे लोगों के बीच जाकर उनसे लगातार सम्पर्क करेंगे, तो हमें उनसे ऊर्जा मिलेगी। हम जीवन की चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाएंगे। जिनके पास बैठकर हमें कुछ भी अच्छा न लगता हो, जिनके पास जाने की इच्छा ही न हो, ऐसे लोगों से दूर ही रहा जाए। जब दो व्यक्ति मिलते हैं, तो वास्तव में उनकी आभाएं मिलती हैं। जो परस्पर प्रेरणा लेती हैं। दो आभामंडल का मिलन यह दर्शाता है कि शक्ति का प्रकाशपुंज अब और विस्तार पाकर शक्तिशाली हो रहा है।

डॉ. महेश परिमल



रविवार, 10 जुलाई 2022

कंगना-अमृता की 'हाय' से डूबी सरकार

 



लोकाेत्तर भोपाल में 9 जुलाई 2022 को प्रकाशित




लोकस्वर बिलासपुर में 8 जुलाई 2022 को प्रकाशित


दो महिलाओं की बद्दुआओं से डूबी महाराष्ट्र सरकार

हमें बचपन से यही सिखाया गया है कि कभी किसी की "हाय" मत लो। यह "हाय" उस समय तो असर नहीं दिखाती, पर कालांतर में उसका असर होता है, तो बहुत ही बुरा होता है। जब भी कोई किसी की मजबूरी का भरपूर फायदा उठाता है, तो वह दिल से उसे बद्दुआ देता है। बद्दुआ देने वाला जानता है कि उसकी बद्दुआ का असर अभी नहीं होगा, फिर भी वह उसके बारे में खूब बुरा बोलता है। उसकी इस हरकत पर कोई ध्यान नहीं देता। पर कुछ समय बाद जब वक्त बोलता है, तब उस मजबूर की बद्दुआ असर दिखाती है। उस समय लोग कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। वह अपने होने का असर दिखा ही देता है। आखिर उस मजबूर की बद्दुआ ने अपना काम कर दिखाया।

हम सभी को याद होगी 9 सितम्बर 2020 की वह घटना, जब फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौट के कार्यालय पर बुलडोजर चला दिया गया था। तब कंगना ने उद्धव ठाकरे को संबोधित करते हुए कहा था कि आज मेरी ऑफिस टूटी है, कल तेरा शासन(घमंड) टूटेगा। उस समय किसने सोचा था कि कंगना की यह बात सच साबित हो जाएगी। तब तो हालात यह थे कि उद्धव ठाकरे के खिलाफ कुछ बोलना भी अपराध था। पूरी मायानगरी में अकेली कंगना ही वह मर्द थी, जिसने जो भी कहा, खुलकर कहा। अब हालात बदल गए हैं। उस समय उद्धव पर कांग्रेस और राजजीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार का वरदहस्त था। आज वहां इन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं है।

महाराष्ट्र के बागी नेता एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में जब सूरत पहुंचे थे, तब महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की पत्नी अमृता फड़नवीस ने ट्विट किया था, जिसमें परोक्ष रूप से उसने लिखा था कि एक था कपटी राजा। अमृता ने यह ट्विट उस घटना को लेकर उद्धव ठाकरे पर कटाक्ष करते हुए किया था, ढाई साल पहले जब उनके पति एक बार फिर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे ही थे, कि सब कुछ बदल गया। भारतीय राजनीति में सत्ता पलट की यह कोई पहली घटना नहीं है। हर राज्य में कोई एकनाथ शिंदे, एकाध ज्योतिरादित्य सिंधिया या सचिन पायलट होते ही हैं। इन सबके भीतर महत्वाकांक्षाओं का सागर उमड़ता रहता है। जो किसी ने किसी तरीके से बाहर आता है। वास्तव में उन्हें सत्ता का नशा होता है। वे मंत्री या मुख्यमंत्री पद के पीछे के ऐश्वर्यशाली जीवन को जीना चाहते हैं। उनकी यही चाहत उन्हें ऐसा करने को विवश करती है। दो महिलाओं की "हाय" ही है, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति को एक नई दिशा दी।

आज एकनाथ शिंदे भले ही यह कहते रहे कि उन्होंने हिंदुत्व को सामने रखकर बगावत की है। परंतु सभी जानते हैं कि उनका निशाना उद्धव ठाकरे ही थे। अनजाने में वे भी मुख्यमंत्री पद की लालसा रखते थे। जिसे उन्होंने भाजपा को साथ लेकर पूरा कर दिया। महाराष्ट्र की राजनीति की उपजाऊ जमीन पर शिदे ने अपने सपने को बोकर उसे साकार कर दिखाया। बाला साहब ठाकरे भले ही सक्रिय राजनीति में न हो, उन्होंने अपने जीवन में कोई राजनीतिक पद भी स्वीकार नहीं किया। पर अपने विशाल व्यक्तित्व के कारण उन्होंने माहौल ही ऐसा बनाया कि बड़े से बड़े नेता उनके घर पहुंचकर उन्हें प्रणाम करते थे।

सत्ता का हाथ से अचानक फिसल जाना बहुत ही विस्मयकारी होता है। नेताओं के लिए यह किसी हादसे से कम नहीं है। इसे बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे होंगे उद्धव ठाकरे और उनके मंत्री। महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार की भूमिका सुपर चीफ मिनिस्टर के रूप में होती रही है। कई लोगों ने उन्हें राजनीति का चाणक्य भी कहा है। किंतु इस बार हुई उथल-पुथल में उन्होंने एक दांव भी नहीं चला। सभी की नजर शरद पवार पर थी। पर उन्होंने अपनी तरफ से ऐसी एक भी कोशिश नहीं की, जिससे उद्धव ठाकरे की सरकार बच पाती। इधर उद्धव की सरकार डूबी, उधर शरद पावर की सुपर चीफ मिनिस्टर की भी नाव डूब गई।

अब शरद पवार कितना भी कह लें कि यह सरकार अधिक नहीं टिक पाएगी, महाराष्ट्रवासी मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहें, तो उनकी इस बात को कोई मानने वाला भी नहीं है। ये बात वे खुद को राजनीति में टिके रहने के लिए कह रहे हैं। सोमवार को जो कुछ हुआ, वह फड़नवीस के अनुसार ही हुआ। उद्धव सरकार में जो हैसियत शरद पवार की थी, अब वही हैसियत एकनाथ शिंदे सरकार में देवेंद्र फड़नवीस की होगी, इसमें कोई दो मत नहीं। इस तरह से देखा जाए, तो दो महिलाओं की "हाय" और सरकार में अपनों की ही उपेक्षा से उद्धव सरकार का पतन हो गया, जो नई सरकार बनी है, उसे अभी कई चुनौतियों का सामना करना है। यह विश्वास किया जा सकता है कि ये सरकार न तो अपनों की अनदेखी करेगी और न ही किसी की "हाय" लेगी।

डॉ. महेश परिमल


शनिवार, 2 जुलाई 2022

दबे पाँव आती महँगाई की पदचाप


लोकोत्तर में 2 जुलाई 2022 को प्रकाशित





 लोकस्वर में 2 जुलाई 2022 को प्रकाशित


दबे पांव आती महंगाई की पदचाप

रूठ गई बारिश, बढ़ी महंगाई की आशंका

जुलाई का महीना शुरू हो गया है, अभी तक देश के कई हिस्सों में बारिश का नामो-निशान नहीं है। कुछ राज्यों ने मानसून ने दस्तक दी, उसे भिगोया, पर बाद में न जाने कहां चला गया। महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश के कई हिस्सों में दलहन की बुवाई तक नहीं हुई है। ऐसे में महंगाई बढ़ेगी, यह तो तय है, साथ ही दलहन की फसल कम होने पर दलहन के भावों में और तेजी आएगी। यह सब ऋतुचक्र के बिगड़ने के कारण हुआ है। ऋतुचक्र लगातार टूट रहा है, इसे समझने को कोई तैयार नहीं है। पानी की बचत को लेकर सरकार के सारे दावे खोखले नजर आ रहे हैं। किसान आशाभरी दृष्टि से आकाश की ओर देखते हैं, फिर निराश हो जाते हैं। निराशा के इस अंधेरे में आशा की कोई एक हल्की-सी किरण भी दिखाई नहीं दे रही है। अब हम सब सुनने लगे हैं दबे पांव आती महंगाई की पदचाप।

बारिश के आने में हर साल देर होने लगी है। कुछ साल पहले तक जून में ही ठंडी हवाएं शुरू हो जाती थीं। दस जून तक बारिश सभी को भिगो देती थी। फिर यह तारीख 15 जून हो गई। धीरे-धीरे 30 जून तक बारिश के आसार नहीं दिखने लगे हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। मानसून कहीं अटक जाता है, तो कभी भटक जाता है। सब कुछ सामान्य रहा, तो कोई न कोई चक्रवात उसे ऐसी जगह पर ले जाता है, जहां से आना कुछ सप्ताह तक संभव नहीं हो पाता। इस तरह से आकाश से काले बादलों की आवाजाही बंद हो जाती है। लोग उमस से परेशान होने लगते हैं। किसान बुवाई की पूरी तैयारी में होते हैं। पर बारिश ऐसी रूठती है कि उसे मनाया भी नहीं जा सकता। इस हालत ने कई राज्यों को चिंतित कर दिया है, यदि इस बार बारिश ने जल्द ही नहीं भिगोया, तो संभव है हालात बेकाबू होने लगे।

अब बाजार में आवश्यक जिंसों के भाव बढ़ने लगे हैं। पिछले एक सप्ताह में अरहर की दाल के भाव में 5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। उड़द दाल में चार प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखी गई है। 24 जून तक देश के 36 प्रतिशत हिस्से में दलहन की बुवाई हुई है। पिछले साल इन्हीं दिनों तक 55 प्रतिशत हिस्से में बुवाई हुई थी। दलहन का उत्पादन मध्य और उत्तर भारत में अधिक होता है। इन स्थानों में बारिश न होने के कारण दलहन के भावों में तेजी आना स्वाभाविक है। सरकारी बांध भी अब सूख चुके हैं। वे भी खेतों की प्यास बुझाने में नाकाम साबित हुए हैं। ऋतु चक्र टूटने को लेकर विश्वव्यापी चिंताएं तो होती हैं, पर उसके कुछ अच्छे परिणाम सामने नहीं आते। 

इधर किसानों की आंखें तरस रही हैं, उधर असम में बाढ़ के हालात है। वहां के 17 जिलों में जलप्लावन की स्थिति है। इन हालात में देश की नदियों को जोड़ने वाली परियोजना की याद आती है। नदियों की आपस में जोड़ने का आइडिया अंगोजों के जमाने से चला आ रहा है। पहली बार इस पर 109 साल पहले 1919 में चर्चा हुई थी। स्वतंत्रता के बाद हुई राजनीतिक उथल-पुथल के कारण इस पर ध्यान नहीं दिया गया। इस समय इस विषय पर कभी-कभी चर्चा हो जाती है, पर उसके परिणाम सामने नहीं आते। एक महत्वाकांक्षी योजना किस तरह से हाशिए पर चली जाती है, यह इस योजना से जाना जा सकता है। अभी भी न तो सरकार और न ही नागरिकों ने बारिश के पानी के संग्रह की दिशा में गंभीरता से कुछ सोचा है।

हालात दिनों-दिन बेकाबू होते जा रहे हैं। लोग उमस से त्रस्त हैं। मानसून हर साल धोखा दे रहा है। अकेले मानसून में ही वह ताकत है, जो समृद्ध राष्ट्र के बजट को एक झटके में प्रभावित कर सकता है। देश के राज्यों की हालत भी इतनी अच्छी नहीं है कि देर से होने वाली बारिश के पहले कुछ विकल्प की तलाश कर ले। गलती हमारी ही है, हमने ही मानसून का स्वागत करना नहीं सीखा। उसके आने के संकेत से ही हमें बहुत कुछ जान लेना चाहिए। मानसून क्या चाहता हे, इसे जानने की कोशिश हमने कभी नहीं की। अब तो लगता है कि मानसून नहीं, बल्कि आज मानव ही भटक गया है। मानसून देर से ही सही आएगा ही, धरती को सराबोर कर देगा। पर यह जो मानव है, वह कभी भी अपने सही रास्ते पर अब नहीं आ सकता। इतना पापी हो गया है कि धरती भी उसे स्वीकार नहीं कर पा रही है। हमारे पूर्वजों का जो पराक्रम रहा, उसके बल पर हमने जीना सीखा, हमने हरे-भरे पेड़ पाए, झरने, नदियां, झील आदि प्रकृति के रूप में प्राप्त किया।आज हम भावी पीढ़ी को क्या दे रहे हैं, कांक्रीट के जंगल और हरियाली से बहुत दूर उजाड़ स्थान। देखा जाए, तो मानसून ही महंगाई का बड़ा स्वरूप है। ये भटककर महंगाई को और अधिक बढ़ाएगा। इसलिए हमें और भी अधिक महंगाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इसलिए मानसून को मनाओ, महंगाई दूर भगाओ। मानसून तभी मानेगा, जब धरती का तापमान कम होगा। धरती का तापमान कम होगा, पेड़ो से पौधों से, हरियाली से और अच्छे इंसानों से। यदि आज धरती से ये सब देने का वादा करते हो, तो तैयार हो जाओ, एक खिलखिलाते मानसून का, हरियाली की चादर ओढ़े धरती का, साथ ही अच्छे इंसानों का स्वागत करने के लिए। 

डॉ. महेश परिमल



शुक्रवार, 24 जून 2022

इंटरनेट एक्सप्लोरर की विदाई

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 23 जून को प्रकाशित





हिमाचल प्रदेश जनसम्पर्क विभाग के अखबार गिरिराज में 22 जून 22 को प्रकाशित







 

मंगलवार, 21 जून 2022

झुर्रियों की अहमियत

 











फादर्स डे पर 19 जून को मेरा एक आलेख 3 अखबारों में ्रपकाशित हुआ। बिलासपुर के लोकस्वर, भोपाल के लोकोत्तर और रायपुर के चैनल इंडिया में 


झुर्रियों की अहमियत
मेरे एक बुजुर्ग साथी हैं, उनकी उम्र है 80 साल। वे आज भी पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त हैं। सेवानिवृत्ति के बाद पिछले 20 सालों से वे एक कॉलेज में कानून पढ़ा रहे हैं। बेडमिंटन-टेबल-टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हैं। बातचीत में जोशीले हैं। कई विषयों में अच्छा दखल रखते हैं। उनके पास आने वालों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जो जीवन के संघर्षों से जूझ तो रहे हैं, पर उन्हें कोई मंजिल नहीं मिल रही है। एक तरह से हताश-निराश लोगों के लिए वे एक वरदान हैं। हर समस्या का समाधान उनके पास है। अभी तक उनके पास से कोई निराश नहीं लौटा। भलाई के कई ऐसे काम उनके द्वारा हुए हैं, जिनकी जानकारी उनके अपनों को भी नहीं है। धाराप्रवाह हिंदी-अंगरेजी में अपनी बात कहने वाले मेरे बुजुर्ग साथी दिल के बहुत ही साफ हैं। आशा की एक छोटी-सी किरण पाने की आस में उनके पास आने वाला व्यक्ति विश्वास से भरा-पूरा एक सूरज अपने साथ ले जाता है। उनका प्रखर व्यक्तित्व हर किसी को आकर्षित करता है।
मेरे ये साथी पूरे 11 साल तक दूसरे शहर नहीं जा पाए। क्योंकि उनकी पत्नी इन वर्षों में व्हील चेयर पर रहीं। पिछले साल ही उनकी पत्नी का देहांत हो गया। अब उनके पास समय काफी था। कॉलेज में गर्मी की छुटि्टयां लगीं, तो उन्होंने अपने गृह राज्य जाने का फैसला किया। अभी उनकी यात्रा शुरू ही नही हुई थी कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने अपने पास आने की गुहार लगानी शुरू कर दी। हर कोई उन्हें अपने पास बुलाना चाहता था। सीमित अवकाश में सबके पास जाना संभव ही नहीं था। पहले तो वे सीधे अपने गृह राज्य पहुंचे। काफी बरसों बाद पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। बड़े परिवार के कई सदस्य उनसे मिलने आए। वे सभी से पूरे अपनेपन के साथ मिलते। चाहे छोटा हो या बड़ा, सभी उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे। उनके व्यक्तित्व में एक चुम्बकीय आकर्षण था। अपनी सहजता से वे कुछ ही पलों में सभी को अपना बना लेते।
इस दौरान एक बात देखी गई। उनके आने से शहर में ही रहने वाले परिवार के वे सदस्य जो साल में केवल दो-तीन बार मिल पाते, कुछ ही दिनों में बार-बार मिलने लगे। इससे उनके बीच तो थोड़ी-बहुत कटुता थी, वह दूर हो गई। गलतफहमियां का कुहासा छंट गया। लोग और करीब आने लगे। उनके पास जो भी आता, कुछ न कुछ सबक लेकर ही जाता। कई युवाओं को उन्होंने ऐसी समझाइश दी, जिससे उनके काम की बाधाएं दूर हो गई। वे परिवार के ऐसे सदस्यों से भी मिले, जो अपने परिवार वालों से दूर हो गए थे। स्वयं को परिवार में उपेक्षित महसूस करने वाले सदस्यों से जब वे बुजुर्ग मिले, तो उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। साथी जहां भी गए, अपनेपन की खुशबू बिखेर गए।
परिवार की तीसरी पीढ़ी के लिए वे किसी एलियन से कम नहीं थे। कोई उनके पोपले मुंह का मजाक उड़ाता, तो कोई उनके सफेद बालों का। ये पीढ़ी उन्हें पिज्जा-बर्गर खिलाना चाहती, जिसे वे सहजता से खा भी लेते। मोबाइल पर वीडियो बनाती, उनसे हुई बातचीत को रिकॉर्ड करती। इनसे मिलकर इस पीढ़ी ने उम्र के दायरे को भी पाट दिया। वे सभी के लिए अपने थे, प्यारे थे, अपनापन बिखेरने वाले एक दादा थे। उस परिवार में कुछ ऐसे भी थे, जो उनसे भी बड़े थे। अपने से तीन साल बड़ी बहन के लिए तो वे अभी भी छोटू ही थे। उनसे मिलने पर बहन कुछ कह तो नहीं पाईं, पर उनकी आंखों से सब-कुछ कह दिया। वे केवल अपने छोटू का हाथ पकड़कर सिसकती रही, यादों की जुगाली करती रहीं।
परिवार में उनके छोटे भाइयों के बेटे-बहू और उनके बच्चों के लिए बुजुर्ग का आना किसी उत्सव से कम नहीं था। हर कोई उन्हें अपने घर ले जाना चाहता था। सबके घर जाना संभव नहीं था, तो किसी एक घर में मजमा लग जाता। जहां खूब सारी बातें होती, मस्ती होती और कई बार गंभीर समस्याओं के समाधान तलाशे जाते। इन पूरे दिनों न तो वे किसी एक घर में एक से अधिक रात रूक पाए, न हीं एक घर में दूसरी बार भोजन कर पाए। अगली बार आने का पक्का वादा करने के बाद ही परिवार के सदस्यों ने उन्हें वापस जाने की अनुमति दी।
तो ऐसा था, एक बुजुर्ग के अपने परिवार के सदस्यों के बीच जाने का यह रोचक मामला। आज जहां परिवार टूट रहे हैं, लोग परस्पर बात करने को तैयार नहीं है। वहां इस बुजुर्ग साथी ने अपनों से बात की। उनसे बात कर परिवार के सदस्य निहाल हो गए। उन्हें इस बात का दिलासा मिला कि कोई तो है, जो उनकी बात सुनता है। आजकल किसी की बात को सुन लेना ही बहुत बड़ी बात है। क्योंकि दर्द की गठरी लिए हर कोई तैयार है अपनी सुनाने के लिए। कोई अपनी बात सुनाना शुरू की करता है, तो दूसरा अपनी बात शुरू कर देता है। इस तरह से कोई किसी की बात नहीं सुन पाता। मेरे बुजुर्ग साथी पेशे से वकील रह चुके हैं, इसलिए उन्हें दूसरों की बातें सुनना अच्छा लगता है। इसीलिए वे अपनों की बातें सुनकर लोगों के और करीब आ गए। 80 वसंत देखने वाले मेरे इस साथी के अनुभवों का पूरा एक संसार ही है। जहां वे अपने अनुभवों के आधार पर लोगों को अपनी राय देते हैं, जो सामने वालों को अच्छी लगती है।
घर में आजकल झुर्रियों की अहमियत घट रही है। खल्वाट चेहरे अब सहन नहीं हो रहे हैं। उनके अनुभवों के विशाल खजाने का कोई लाभ नहीं उठाना चाहता। उनके पोपले मुंह से निकलने वाली दुआओं को कोई समझने को तैयार नहीं है। अपने बच्चों का दादा से अधिक मिलना-जुलना अब किसी पालक को अच्छा नहीं लगता। इसलिए अनुभवों का यह चलता-फिरता संग्रहालय आजकल वृद्धाश्रमों में कैद होने लगा है। जहां उनकी तरह अन्य कई लोग रहते हैं। कुछ विशेष अवसरों पर यहां चहल-पहल बढ़ जाती है, जब मदर्स डे-फादर्स डे पर बच्चे सेल्फी लेने आते हैं। कुछ बच्चे यहां आकर यह भी देख लेते हैं कि जब मेरे मम्मी-पापा यहां रहने लगेंगे, तो कैसा लगेगा? इस सोच को अमलीजामा पहनाने के लिए कुछ बच्चे वृद्धाश्रम से विदा लेते हैं। आप बताएं...क्या उनकी सोच को किनारा मिलना चाहिए?
डॉ. महेश परिमल


शनिवार, 18 जून 2022

जिंदगी पर बाजार का कब्जा

कहा जाता है कि जब जिंदगी दांव पर लग जाए, तो वह एक निर्णायक मोड़ साबित होता है। अब तक इंसान बाजार पर हॉवी रहा, यह शायद पहली बार हो रहा है कि जिंदगी पर बाजार का कब्जा हो रहा है। हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। वैसे भी जिंदगी टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित हो रही थी, पर अब बाजार ने इस पर कब्जा जमाकर इंसान को उसकी जिंदगी से पूरी तरह से अलग कर दिया है। इस जिंदगी से हंसी-खुशी के पल गायब हो रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक की दिनचर्या में इंसान के अपने पल बहुत ही कम होते हैं। अब सारे लम्हें उन हाथों में पहुंच गए हैं, जिनकी नजर में पैसा ही सब कुछ है।

जीवन मूल्य अब तेजी से बदल रहे हैं। अपराध करने के बाद भी अपराधी को अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं होता। किसी की हानि पहुंचाकर लोग अब खुश होते हैं। रास्ते चलते किसी को भी परेशान करना अब आम हो गया है। कानून के रखवालों के सामने कई लोग कानून की धज्जियां उड़ाते हुए दिख जाएंगे, पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार वे ही इस काम में लिप्त दिखाई देते हैं। महिलाएं यदि सक्षम है, तभी वह सुरक्षित है। अन्यथा उसे नोंचने के लिए समाज का एक वर्ग तैयार बैठा है। इसे देखकर बुजुर्ग अपने पुराने दिनों की जुगाली करते दिखाई देते हैं। उनका मानना है कि देखते ही देखते काफी कुछ बदल गया है। पहले हम बाजार जाते थे, अब बाजार ही हमारे घर पर आ गया है। खाने की जो भी चीज़ चाहिए, वह आधे घंटे के भीतर आपके सामने होगी। घर में क्या सामान आएगा, यह बुजुर्ग नहीं, बच्चे तय करने लगे हैं। हां, उस सामान की राशि बुजुर्ग ही देंगे। सामान उनकी मर्जी का तो नहीं आएगा। वे क्या चाहते हैं, इसकी किसी को नहीं पड़ी है। उनकी पसंद-नापसंद का कोई मतलब ही नहीं है।

जीवन मूल्य ही नहीं, अब नैतिक मूल्यों का लगातार अवमूल्यन हो रहा है। देखते ही देखते चीजें बदलने लगी हैं। हालात बदलने लगे हैं। हम कुछ नया सोचें, इसके पहले ही कुछ ऐसा नया आ जाता है कि हम पिछला सब कुछ भूल जाते हैं। कई बार इस दौड़ में हम पीछे रह जाते हैं। हम थक जाते हैं, इसी अंधी दौड़ में। शहरों में हम आ तो गए हैं, पर गांवों में आज भी हमारा बचपन कहीं दुबका पड़ा है। चाहकर भी हम उस बचपन को अपना नाम नहीं दे सकते। कभी पूरा गांव हमारा था, आज शहर का एक कोना जिसे हम घर कहते हैं, वह भी हमारा नहीं है। आखिर हमारा क्या है, यह यक्ष प्रश्न हर बुजुर्ग के भीतर कौंधता रहता है। 

अब बाजार हमारे भीतर समाने लगा है। हम बाजार के होने लगे हैं। बाजार में क्या चीज बिकनी है, यह हम तय नहीं कर रहे हैं। इसके लिए कुछ विशेष शक्तियां लगातार काम कर रही हैं। बिचौलिए के बिना कोई काम संभव ही नहीं है। मूल रूप से चीजों की कीमतें बहुत कम हैं, पर एक सोची-समझी साजिश के तहत उन चीजों के दाम बिचौलियों के हाथों इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि साधारण इंसान को वह दोगुनी-तिगुनी कीमत पर मिल रहीं हैं। रोटी बनाने वाले और रोटी खरीदने वाले के बीच किसी तीसरे की भूमिका महत्वपूर्ण होने लगी है। यही तीसरा दोनों पर हावी है। अब वही आदेश देने लगा कि कितनी रोटी बननी है और कितनी रोटेी खरीदी जानी है। ऐसे में साधारण इंसान की कोई औकात ही नहीं है। वह लगातार पिस रहा है। उसकी सांसें उधार रखी हुई है। वह अपनी सांसों को लेने की भी ताकत नहीं रखता।

सरकारी आंकड़ों में आम आदमी की जिंदगी काफी आसान है। उसे हर तरह की सुविधाएं मिल रही हैं। तमाम सरकारी कार्यालय उसके काम के लिए तैयार बैठे हैं। हर कोई उसकी सुख-सुविधाओं का पूरा खयाल रख रहा है। पर हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। आम आदमी आज भी महंगाई की चक्की में पिस रहा है। रोजगार की संभावनाएं लगातार कम होती जा रही है। किसी भी काम के लिए सरकारी महकमा काम नहीं आता। उसके काम में अनेक बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं। इसके बाद भी कई लोगों के काम बहुत ही आसानी से हो जाते हैं। इसके पीछे का गणित हर कोई जानता है। ऐसे में आम आदमी की हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है।

सरकारी आंकड़े सदैव झूठ बोलते हैं, यह जानते हुए भी लोग उस पर विश्वास करते हैं। ठीक हमारे नेताओं की तरह। जनता जानती है, इन नेताओं की हकीकत, इसके बाद भी जब वह सामने होता है, तो विरोध नहीं कर पाती। दूसरी ओर विज्ञापनों की दुनिया है, जिसमें खूब दावे किए जाते हैं, लोग जानते हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला, फिर भी न जाने किस प्रेरणा से वशीभूत होकर वह उत्पाद खरीद ही लेते हैं। इस तरह से मायाजाल है, जिसमें सभी उलझे हुए हें। सरकार का अलग मायाजाल है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अलग। इसमें उलझना सभी की मजबूरी है। न चाहकर भी इसमें लोग उलझते ही रहते हैं। विरोध की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। विरोध करने वाला कुछ दिनों बाद विरोध के काबिल ही नहीं होता। ऐसे में बहाव के साथ चलना हम सबकी विवशता है।

डॉ. महेश परिमल


सोमवार, 23 मई 2022

हरियाला संस्कार



18 मई 2022 को जनसत्ता में प्रकाशित


 

बुधवार, 18 मई 2022

ब्रह्मास्त्र के रूप में उभरता बुलडोजर



इन दिनों देश में बुलडोजर संस्कृति का लगातार विस्तार हो रहा है। यह संस्कृति अब राज्यों की सीमाएं तोड़ने लगी हैं। एक सख्त कदम उठाने की ओर संकेत देने वाली यह संस्कृति कुछ लोगों को भा रही है, तो कुछ लोगों के लिए आंख की किरकिरी बन गई है। बरसों से अवैध रूप से बनी आलीशान इमारतों को देखते हुए ईर्ष्या होती थी, उसे ही जमींदोज होते देखना बड़ा सुकूनभरा लम्हा रहा। कई स्थानों पर इस बुलडोजर ने इमारतें जमींदोज कर वहां बागीचे बना दिए। अब उस बागीचे में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं। अच्छा लगता है यह सब देखकर। दूसरी ओर अवैध रूप से शान से इमारतें खड़ी करने वाले अब दहशत में हैं। बरसों तक उनका राज चलता रहा, एक पल में ही उनकी दुनिया ही बदल गई। लोगों तक यह संदेश पहुंचा कि बुरे दिन की शुरुआत ऐसे ही होती है। इसलिए कभी किसी का बुरा मत करो। बुलडोजर संस्कृति पनपने का एक कारण देश के नेता ही हैं, जो अपनी काली कमाई को इस तरह से सफेद करने में लगे हुए हैं। अवैध काम करने वालों पर हमेशा नेताओं का वरदहस्त होता है, तभी वे अवैध कामों को अंजाम दे पाते हेैं।

हमारे देश में बहुत की कम ऐसे नेता हैं, जिन्हें लोग सम्मान की दूष्टि से देखते हैं। कई नेता तो अपनी आदतों के कारण विभिन्न नामों से याद किए जाते हैं। लोगों ने नेताओं को कई नाम दे रखे हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि अब नेता भी कुछ विशेष नामों से बुलाए जाने लगे हैं। बुलडोजर बाबा, बुलडोजर मामा, बुलडोजर दादा। इस तरह से कुछ नेताओं के नए नाम उभरे हैं। बुलडोजर होने को तो एक मशीन ही है, पर आज यह विपक्ष के नेताओं की किरकिरी बना हुआ है। संभव है इस बार यह बुलडोजर किसी न किसी दल का चुनाव चिह्न बन जाए। अब तो किसी नेता के मुंह से बुलडोजर शब्द का निकलना ही विवाद को जन्म देने लगा है। यहां तक कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अपनी भारत यात्रा के दौरान गुजरात के दाहोद में जेसीबी बुलडोजर में क्या बैठ गए, लोगों ने उन्हें भी लपेट लिया। वे भी ट्रोल का शिकार हो गए। उधर दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ कि बुलडोजर की कार्यवाही को रोकने के लिए अदालत को दो बार स्टे ऑर्डर देना पड़ा। भारतीय राजनीति में पहली बार बुलडोजर इतना हावी दिखाई दिया। विपक्ष के लिए यह बुलडोजर आंख की किरकिरी बन गया है। क्योंकि जिसके भी खिलाफ बुलडोजेर का इस्तेमाल किया गया है, वह किसी न किसी रूप से विपक्षी दलों से सम्बद्ध है। ऐसे में कुछ भी कहना यानी एक नए विवाद को जन्म देना है। एक तरह से यह एक टॉकिंग पाइंट बन गया है।

बुलडोजर का इस्तेमाल पहले समृद्ध किसान किया करते थे। अब यह अवैध निर्माण को ढहाने के काम में आने लगा है। अब तो जो नेता जितना अधिक बुलडोजर का इस्तेमाल करता है, वह उतना ही अधिक लोकप्रिय भी होने लगा है। नेताओं के लिए यह एक तरह से ब्रह्मास्त्र के रूप में जाने जाना लगा है। सबसे पहले बुलडोजर का उपयोग रेत और पत्थरों को रास्ते से हटाने के लिए किया गया। उसके बाद इसका विस्तार होने लगा। अब यह निर्माण कार्यों, खनिज कार्यों, तालाब गहरीकरण, नहर निर्माण के लिए इस्तेमाल में आने लगा है। लेकिन अब इसका दावानल रूप सामने आने लगा है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने इसका इस्तेमाल अवैध रूप से बनी हुई इमारतों के लिए किया। तब से पूरे देश में असामाजिक तत्वों में हाहाकार मच गया है। इसके बाद मध्यप्रदेश और बिहार में इसका इस्तेमाल पूरी सूझबूझ के साथ किया जाने लगा। यहां भी पहले तो सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप लगे, उसके बाद बुलडोजर के अस्तित्व को सभी ने स्वीकार कर लिया। अब यह अवैध निर्माण एवं सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले रसूखदारों के खिलाफ  एक रामबाण साबित हो रहा है।

अब लगे हाथ बुलडोजर का इतिहास भी जान लें। जेम्स कमिंग्स और जे अर्ले ने 1923 में सबसे पहले केन्सास में इसका उपयोग पहली बार किया था। उन्होंने एक ट्रेक्टर के आगे बड़ी-सी आरीनुमा ब्लेड लगा दी। इससे मिट्टी को एक तरफ किया जाता था। तब उसके इस पेटेंट का नाम अटैचमेंट फॉर ट्रेक्टर्स दिया गया। उस समय बुलडोजर के लिए टायर व्हील का उपयोग किया गया। अब तो बुलडोजर युद्धक टैंक की तरह आने लगे हैं, जो चेन की सहायता से आगे बढ़ते हैं। सन 1800 में पिस्तौल में इस्तेमाल की जाने वाली लम्बी केलिबर को भी बुलडोजर्स कहा जाता था। इससे लोगों को धमकाने का काम किया जाता था। अब तो आधुनिक खेती का पर्याय बन गया है बुलडोजर। इसी का दूसरा रूप थ्रेशर है, जो खेतों से फसलों को कुछ ही देर में काट देता है। उसके बाद फसल के दाने-दाने अलग हो जाते हैं। ट्रेक्टर की तरह अब बुलडोजर को किराए पर लिया जा सकता है। इससे मानव रोजगार भी प्रभावित हुआ है। संभव है ताकत के प्रतीक इस बुलडोजर को अब कोई भी दल अपना चुनाव चिह्न बना सकता है।

अवैध निर्माण कार्यों को तोड़े जाने पर लोग अब भले ही योगी जी को याद किया जाने लगा है, पर लोग गोविंद खैरनार को नहीं भूले होंगे, जिसने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार के खिलाफ अपना परचम लहराया था। उसने पवार के बेटे की होटल पर बुलडोजर चला दिया था। तब उसके काफी प्रशंसा हुई थी। किरण बेदी को भी हम नहीं भूल सकते, जिसने दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पार्क किए हुए वाहन को टो कर दिया था। लेकिन इस बार हमें बुलडोजर के जिस रूप का दर्शन योगी जी ने करवाया है, वह सबसे अलग है। यह बुलडोजर जीपीएस टेक्नालॉजी से सुसज्जित है। सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बने निर्माण कार्यों पर बुलडोजर चलाकर योगी जी एक सख्त मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं। एक तरह से उन्होंने सभी असामाजिक तत्वों को हिलाकर रख दिया है। इस बुलडोजर शब्द ने इतनी अधिक लोकप्रियता बटोरी है कि निकट भविष्य में बनने वाले किसी राजनीतिक दल का नाम ही बुलडोजर हो सकता है।

अब लोगों की आस ही यह बुलडोजर है। इससे अपेक्षाएं भी बढ़ने लगी हैं। लोग चाहते हैं कि अब यह बुलडोजर हमारे नेताओं को मिलने वाली तमाम सुविधाओं पर भी चले। कुछ भी काम न करने वाले ये नेता देशभक्ति की आड़ में जिस तरह से मुफ्त का माल खा रहे हैं, उस पर इस बुलडोजर को चलना ही चाहिए। अब देशभक्ति की परिभाषा बदल गई है। सीमा पर तैनात सैनिक ही देशभक्त नहीं होता। एक किसान फसल ऊगाकर, एक सब्जी वाला सब्जी बेचकर, एक मोची जूते सिलकर, एक डॉक्टर इलाज कर, एक नौकरीपेशा अपनी नौकरी कर, एक अधिकारी अपने अधिकार का उपयोग कर जिस तरह से देश की सेवा कर रहा है, ठीक उसी तरह से ये नेता भी देश सेवा ही कर रहे हैं। फिर इन्हें इतनी अधिक सुविधाएं क्यों मिल रही हैं? जब इन नेताओं की पेंशन सुविधाओं पर बुलडोजर चलेगा, तब वास्तव में यह बुलडोजर हम सबके लिए हितकारी होगा। तब हम इसे एक विध्वंसकारी के रूप में नहीं देखेंगे। तब यह हमारा अपना साथी होगा। इन्हीं शुभ भावनाओं के साथ......

डॉ. महेश परिमल


शनिवार, 7 मई 2022

ध्वनि प्रदूषण की अनदेखी के खतरे



 

..जब शब्द साथ छोड़ देंगे

डॉ. महेश परिमल

शोर एक विचलन है। यह मानसिक स्थिति को बुरी तरह से प्रभावित करता है। अधिक शोर के बीच रहने वाले लोग चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। ऐसे लोग आक्रामक भी हो सकते हैं। शोर से कभी शांति नहीं मिल सकती, इसे गांठ बांधकर रख लें। शोर हमें व्यथित कर सकता है, विचलित कर सकता है, पर कभी भीतर की शांति प्रदान नहीं कर सकता। शोर का मुद्दा धार्मिक कतई नहीं है, यह एक सामाजिक मुद्दा है। शोर के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए। तेज आवाज वाले यंत्रों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देना चाहिए। डीजे और प्रेशर हार्न का उत्पादन ही बंद कर देना चाहिए। यदि अभी नहीं संभले, तो भावी पीढ़ी न तो अपने बच्चों की आवाज सुन पाएगी, न ही परिंदों की चहचहात को महसूस कर पाएगी। एक अंधेरी दुनिया में होंगे, हम सब, जहां सभी खामोश होंगे।

आजकल पूरे देश में लाउडस्पीकर को लेकर राजनीति हावी हो गई है। वास्तव में यह मामला शोर को होना था, पर इसे राजनीति का रंग दे दिया गया है। यदि शोर के खिलाफ आंदोलन चलाया गया होता, तो यह देश को एक नई दिशा देता। पर राजनीति के कारण भले ही यह मामला तूल पकड़ ले, पर मूल मुद्दे से भटक जाएगा। हम यदि शोर के खिलाफ शोर करते हैं, तो यह अनुचित होगा। पर शोर के खिलाफ अपनी खामोश मुहिम चलाएंगे, तो शायद यह बेहतर होगा। पर देश में खामोश मुहिम का कोई अर्थ ही नहीं है। इसलिए शोर के खिलाफ किया गया आंदोलन भी एक शोर में बदल जाता है। ऐसा ही इस मामले में हुआ है। महाराष्ट्र में लाउडस्पीकर विवाद को लेकर मामला उलझ गया है। राज ठाकरे ने एक बार फिर एक पत्र जारी कर लोगों से कहा है कि जिन स्थानों से अजान की आवाज लाउडस्पीकरों से आएगी, उसके खिलाफ वे हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। वे इसे एक सामाजिक मुद्दा बता रहे हैं। उन्होंने कहा है कि हम देश की शांति भंग नहीं करना चाहते, पर लाउडस्पीकर के मामले पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हम अपने बयान पर अडिग रहेंगे।

अब हम यदि पूरे विश्व में लगातार बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण की तरफ नजर डालें, तो स्पष्ट होगा कि ध्वनि प्रदूषण का असर केवल इंसानों ही नहीं, बल्कि जानवरों एवं पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है। बड़े शहरों से लेकर सुदूर गांव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इससे इकोसिस्टम तक प्रभावित हो रहा है। अधिक शोर के कारण मेटाबालिज्म से संबंधित रोग, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का खतरा बढ़ गया है। इससे हृदयाघात का भी खतरा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार तेज और लगातार होने वाले शोर से यूरोप में हर साल 48 हजार लोग हृदय रोग के शिकार हो रहे हैं। इससे करीब 12 हजार लोग असमय ही मौत का शिकार हुए हैं।

जर्मन संघीय पर्यावरणए एजेंसी के शोर विशेषज्ञ थॉमस माइक कहते हैं कि अगर कोई फ्लैट या घर मुख्य सड़क पर हे, तो कम किराया देना पड़ता है। इसका मतलब यह है कि जिन लोगों की आय कम है, उनके शोर-शराबे वाली जगहों पर रहने की संभावना अधिक है। शोर के केवल इंसान ही नहीं, बल्कि जानवर भी प्रभावित हो रहे हैं। ध्वनि प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा पक्षी प्रभावित हो रहे हैं। वे अब ऊंचे स्वर में अपनी आवाज निकाल रहे हैं। सड़क किनारों के कीड़ों, टिड्डों और मेढकों की आवाज में भी बदलाव देखा गया है। इसके अलावा अनिद्रा, अति तनाव, उच्च रक्तचाप, चिन्ता तथा अन्य बहुत से स्वास्थ्य संबंधी विकार शोर-प्रदूषण से उत्पन्न हो सकते हैं। लगातार प्रबल ध्वनि के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति की सुनने की क्षमता अस्थायी अथवा स्थायी रूप से कम हो जाती है। अधिक शोर में रहने वाले लोगों में कुछ नए रोगों का भी पता चला है। इसमें प्रमुख है रात में देखने की क्षमता में कमी आना, रंगों की पहचानने में दिक्कत, नींद का नियमित न होना, जल्दी थकान आना और मानसिक विक्षोम का उत्पन्न होना।

आजकल युवा जिस तरह से डीजे की आवाज के साथ थिरक रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि भविष्य में वे थिरकने के काबिल ही नहीं होंगे। क्योंकि उन्हें कुछ भी सुनाई ही नहीं देगा। ध्वनि प्रदूषण को नजरअंदाज करने वाले युवाओं का भविष्य बहुत ही अंधकारमय है। वे न केवल बहरे हो सकते हैं, बल्कि उनकी याददाश्त एवं एकाग्रता में भी कमी आ सकती है। यही नहीं चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, नपुंसकता, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के भी शिकार हो सकते हैं। यही हाल रहा, तो भावी पीढ़ी एक ऐसी अंधेरी दुनिया में होगी, जहां संवेदनाएं नहीं होंगी। लोग बहरे होंगे, संवेदनाएं केवल आंखों में ही दिखाई देगी। उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होंगे। यदि कोई कुछ कहेगा, तो सामने वाला उसे सुन नहीं पाएगा। सोचो कैसा होगा वह पल?

डॉ. महेश परिमल


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