मंगलवार, 5 अप्रैल 2016
कहानी - श्यामली - उत्कर्ष रॉय
शायद कक्षाध्यापिका की कही बात ही सबसे पुरानी होगी। जब उसे अहसास हुआ कि वह गोरी नहीं है। चिड़चिड़ाती हुई वह घर पहुँचकर अपनी माँ के आगे रोने लगी। माँ ने उसको चुप तो करा दिया पर उसके जन्म के समय से उठी इस समस्या की चिंता में खुद डूबने उतरने लगी। समय बीतने के साथ श्यामली का आत्मविश्वास घर मोहल्ले एवं विद्यालय में रंगरूप से संबंधित कड़वी बातें कहे जाने के कारण टूटता गया। कभी कभी तो उसकी माँ भी गुस्सा आने पर यह बात याद दिलाने से नहीं चूकती थी। केवल पिताजी हर समय उसके समर्थन के लिये तैयार रहते थे। वे हमेशा कहते थे कि रंगरूप अपनी जगह है जिसे बदला नहीं जा सकता। परंतु पढ़ना लिखना और लायक बनना अपने हाथ में है। उनकी ये बातें श्यामली का मनोबल बढ़ाती थीं। देखते ही देखते श्यामली ने जीव विज्ञान में बैचलर की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर ली। अभी से लड़का देखना शुरू कर देना चाहिये। रंग के कारण समय काफी लग जाएगा। फिर हमारे पास इतना धन भी तो नहीं कि दहेज से यह अवगुण ढँक दिया जाय। दूसरी की भी तो शादी करनी है। माँ की यह बात कंठस्थ हो गई थी। पिताजी उसकी पढ़ाई पूरी हो जाने की बात कह कर शादी की बात टाल जाते। परंतु प्रतिदिन के क्लेश से तंग आकर उन्होंने श्यामली का बायोडेटा बना डाला। यह क्या लिख दिया काम्प्लेक्शन डार्क अरे इसे पढ़कर तो कोई आगे बात ही नहीं करेगा लिखिये फेयर
माँ के दबाव में पिताजी ने बायोडेटा बदल दिया। रिश्ते भी आने लगे। फिर लड़के वालों मे श्यामली को देखने की बात की। श्यामली एक ओर तो आशावान थी तो दूसरी ओर आशंकित भी। हर लड़की को इस घड़ी से गुजरना होता है। सलवार कुर्ते से लेकर साड़ियाँ तक चुनी जाने लगीं कि किस कपड़े में श्यामली का रंग खिला सा दिखेगा। अंत में हल्के नीले रंग की एक साड़ी चुनी गई।
उस दिन कामवाली बाई को छुट्टी दे दी गई। क्योंकि यही लोग सबसे अधिक बातें फैलाती हैं। छोटी बहन को उसकी सहेली के घर भेज दिया गया था। कि कहीं श्यामली की जगह उसे न पसंद कर लिया जाय।
हाथों में चाय की ट्रे लेकर श्यामली ने कमरे में कदम रखा। आँखें न उठाते हुए भी उसने यह महसूस किया कि सारी नज़रें उस पर टिक गई हैं। ट्रे रखकर वह एक कोने में बैठ गई।
जाओ तुम अंदर ही बैठ जाओ। चंद मिनटों में ही लड़के की माँ ने कड़े शब्दों में उससे कहा। श्यामली उठकर भीतर चली गई।
अरे वाह खूब झूठ बोला आपने। लड़की तो एकदम काली है। बायोडेटा में फेयर लिखा था। यहाँ तो मैं रिश्ता बिलकुल नहीं कर सकती। लड़के की माँ ने उठते हुए कहा।
श्यामली ने अंदर बैठे बैठे सारा वार्तालाप सुन लिया। उसका दिल चाहा कि बाहर जाकर चिल्ला चिल्ला कर सबको भलाबुरा कहे पर अपमान का घूँट पीकर रह गई।
श्यामली को घर में घुटन सी होने लगी थी। अधिक समय कालेज में बिताती थी। घर लौटते ही अपने कमरे में बंद हो जाती थी। कभी कभार शीशे के आगे भी खड़ी हो जाती थी। शायद ही ऐसी कोई क्रीम या लेप बचा था जो नहीं आजमाया गया हो। आगे क्या हुआ यह जानने के लिए सुनिए कहानी श्यामली...
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