शनिवार, 23 अप्रैल 2016

कविताएँ - डॉ. अम‍िता शर्मा

डॉ. अमिता मूल रूप से हिमाचल की है और वर्तमान में वॉशिंगटन डी.सी. में स्थायी रूप से निवास कर रही हैं। आपकी रचनाओं को अपने ऑडियो ब्लॉग में स्थान देते हुए हमें प्रसन्न्‍ता अनुभव हो रही है। कविता का कुछ अंश... आज फिर बाहर चाँदी बिछी है आज फिर बिखरी धवल सी हँसी है फिर से मुझे इस मफलर ने गर्माया है नज़ारा वो सारा नज़र फिर से आया है सब याद आया है माँ का लिहाफ में सिमट के आना फिर से वो ऊन के गोले बनाना फंदे की ऊपर फंदे ही फंदे सिलाईयाँ उलझाना सिलाईयाँ सुलझाना सब याद आया है हर सिलाई पर हाथों से मापते जाना हर सिलाई पर हल्के से खींचते जाना रजाई में सभी का लिपटते चले आना रजाई घटाना रजाई बढ़ाना कोने दबाना वो कोने उठाना सब याद आया है मूंगफली गज्जकी पंजीरी की महक तरानों फ़सानों की चहक चहक सब याद आया है अचानक छुटकू का खिल-खिल खिलाना शरारती हो ऊन उठा भाग जाना माँ का हाँफना पीछे पीछे पूरे घर का चककर लगाना कमरे का हँसी से गले तक नहाना सब याद आया है माँ, सभी कुछ याद है अच्छे से याद है फिर वही मफलर पहना आज है तुम नहीं हो तुम्हारे वो चार दिन चार पहर पास है मेरे तुम्हारा प्यार, तुम्हारा दुलार , गरमा रहा है सर्द उच्छ्वास मेरे आज फिर बाहर चाँदी बिछी है आज फिर बिखरी धवल सी हंसी है फिर मुझे इस मफलर ने गर्माया है माँ तेरा दुलार बहुत याद आया है बहुत बहुत बहुत याद आया है .… एेसी ही अन्य मर्मस्पर्शी कविताओं का आनंद सुनकर लीजिए...

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