मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

सुलगते सवालों के मुहाने पर हम!

डॉ. महेश परिमल
 इस समय देश का माहौल कुछ बदला-बदला-सा लग रहा है। नेताओं की जुबानें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। जुबानी-जंग तेज से तेजतर होती जा रही हैं। लोग स्वयं को असुरक्षित समझने लगे हैं। कोई मकान बदल रहा है, तो कोई शहर। कोई अपने घर में राशन भर रहा है, तो कोई बच्चों को विदेश भेज रहा है। ये सारे ताम-झाम केवल स्वयं और परिवार की सुरक्षा को लेकर हो रहा है। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर दोनों को अलग करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जा रही है। ऐसा लगता है कि भीतर ही भीतर कुछ पक रहा है। कुछ ऐसी तैयािरयां हो रही हैं, जो इसके पहले कभी नहीं हुई। लोग परस्पर संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। सब अपने में ही मस्त हैं। टीवी पर चीखते लोग ऐसे लगते हैं, मानों पूरे देश में आग लगा देंगे। अखबार भी कम नहीं हैं। एक छोटी-सी खबर को भी बहुत बड़ा स्थान देकर उसे तूल दिया जा रहा है। कोई किसी का सरमायादार नहीं बनना चाहता। विश्वास नाम की चीज तो रह ही नहीं गई है। ऐसा माहौल पहले कभी देखने को नहीं मिला। अभी कुछ ही दिन पहले एक मित्र ने अपने प्रावीडेंस फंड से कुछ राशि निकाली। उस राशि से उसने घर में दो महीने का राशन भर लिया। मुझे आश्चर्य हुआ। इसका कारण जानना चाहा, तो उसने साफ-साफ कहा-इस देश में अब कभी-भी कुछ भी हो सकता है। हो सकता है, लंबा कर्फ्यू ही लग जाए। इसलिए बच्चों के लिए कुछ तो रखना ही होगा। मुझे समझ में नहीं आया कि आखिर माजरा क्या है। इस देश को काफी लंबे समय बाद बहुमत वाली सरकार मिली है। सरकार का वादा है कि वह जाति,धर्म आदि से उठकर काम करेगी। सबका विकास करेगी। ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है, तो फिर अराजकता का माहौल क्यों दिखाई दे रहा है? कहीं तो ऐसा कुछ है, जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा है, पर भीतर ही भीतर सुलग रहा है। इस बीच नेताओं के बयान पर कोई अंकुश नहीं है। वे कुछ भी बोल रहे हैं, तो मीडिया को मसाला मिल रहा है। कहीं किसी के मुंह से कुछ गलत निकला कि वह मुद्दा बन जाता है। कहने वाला तो एक ही बार कहता है, फिर मीडिया उसे दिन में करीब 100 बार कहलवा देता है। इससे माहौल बिगड़ते देर नहीं लगती। देखा जाए, तो संयम तो कहीं किसी में दिखाई नहीं दे रहा है। अंकुश के अभाव में लोग एक-दूसरे को भड़काने में ही लगे हैं। सोशल मीडिया तो इस दिशा में एक कदम आगे जाकर काम करने लगा है। अफवाहें फैलाने में इससे बड़ा कोई माध्यम ही नहीं है। यूं तो सोशल मीडिया ज्ञान का खजाना है, पर इस खजाने का दुरुपयाेग ही अधिक हो रहा है। आपसी सद्भाव अब दुर्लभ हो गया है। इक्का-दुक्का कुछ खबरें आ जरूर रही हैं, पर वह समुद्र में एक बूंद की तरह है। बच्चों में प्रतिस्पर्धा के नाम पर कुछ ऐसे संस्कार डाल दिए गए हैं कि दूसरे नम्बर पर आने पर वह यही कहता पाया जाता है कि टीचर नेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे पक्षपात किया। काेई भी किसी के निर्णय से संतुष्ट ही नहीं है। हर कोई अपना मुकाम खुद ही बनाना चाहता है। बच्चों में यह सब कुछ आ रहा है, बड़ों के माध्यम से। बच्चे जो देख-सुन रहे हैं, उसे ही अपने जीवन में उतार रहे हैं। संस्कार के साधन अब माता-पिता ही नहीं, बल्कि मोबाइल-टीवी हो गए हैं। आकाशीय मार्ग से मिलने वाले इस ज्ञान से बच्चे कुछ अलग ही तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं। स्कूलों में हर बच्चा आक्रामक ही दिखाई दे रहा है। सभी की नसें तनी हुई होती हैं। इसकी वजह होम वर्क तो कतई नहीं है। पर वे भी स्वयं पर काबू नहीं रख पा रहे हैं। घर में कोई भी इलेक्ट्राॅनिक चीज बच्चों की सहमति के बिना आ ही नहीं सकती। बच्चे बड़ों के काम में दखल देने लगे हैं, पर उन्हें अपने काम में बड़ों का दखल कतई मंजूर नहीं। हर कोई अपने ही आस्मां में कैद रहकर अपना रास्ता खोज रहा है। न तो उसे अपनी मंजिल का पता है और न ही उसे यह पता है कि उसे जाना कहां है? यदि जाना है, तो उसके पास जो संसाधन है, उससे वह अपनी मंजिल तक पहंुच सकता है? रही बात गांव, मोहल्ले, शहरों की, तो सभी जगह राजनीति ने ऐसी पैठ जमा ली है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। एक-दूसरे को नीचा दिखाना मानो राष्ट्रधर्म बन गया है। अपने को कोई कम आंकना ही नहीं चाहता। किसी भी किसी अपराध में पकड़ लिया जाए, तो उसकी पहंुच इतनी दूर तक होती है कि वह पुलिस हिरासत में पहुंचने के पहले ही रिहा हो जाता है। मामला थाने तक भी नहीं पहुंच पाता। ऐसा तो गांव, मोहल्ले में हो रहा है। पर जो राजधानी स्तर पर हो रहा है, उसकी तस्वीर बहुत ही भयानक है। छोटी से छोटी संस्थाओं के तार राजनेताओं से जुड़े हुए हैं। इन नेताओं के तेवर इतने अधिक सख्त हैं कि अपनी जीत के लिए वे कुछ भी कर सकने के लिए दल-बल के साथ तैयार हैं। हर नेता की अपनी तैयारी है। उनके अपने कार्यकर्ता हैं, जो एक आवाज पर लड़ने-मरने को उतारू हैं। मानों यह संकल्प ही ले लिया है कि अब की बार तो कोई बच ही नहीं पाएगा। बिहार चुनाव को लेकर इस समय काफी गर्मा-गर्मी भी दिखाई दे रही है। अभद्र भाषा का चलन ऐसा बढ़ गया है कि कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करना चाहता। माहौल ऐसा बन गया है कि दुश्मन को जीवित देखना भी पसंद नहीं है। दुश्मन का जिंदा रहना उनकी कायरता है। अपनी इस कायरता को कम करने के लिए वे कुछ ऐसा करने के लिए तैयार हैं, जिससे दुश्मन नेस्तनाबूत हो जाएं। देश की स्थायी सरकार में ही कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी का कहना नहीं मान रहे हैं। आपत्तिजनक बयानों के बाढ़ आ गई है। मुद्दा कोई भी हो, उसका तुरंत राजनीतिकरण हो जाता है। उसके बाद बयान दर बयान का सिलसिला चल निकलता है। उनके बयान इतने अधिक आक्रामक होते हैं कि लोग अपने वश में नहीं रह पाते। कुछ कर गुजरने की छटपटाहट बढ़ जाती है। अब साधू-संत भी इसमें पीछे नहीं रहे। उनके अंधभक्त भी इतने अधिक हिंसावादी हैं कि वे और कोई दूसरी भाषा न तो समझते हैं और न ही उन्हें शांति की भाषा आती है। हर दल का अपना एक अलग ही आक्रामक शाखा है, जो बस आदेश की प्रतीक्षा में है। उलझन भरे इस माहौल में आम आदमी का सांस लेना मुश्किल हो गया है। बदलते माहौल को लेकर हर कोई अपने तईं तैयारी कर ही रहा है। पर यह तय है कि कुछ हुआ, तो सबसे अधिक प्रभावित आम आदमी ही होगा। वही मारा जाएगा, उसके बच्चे मारे जाएंगे, उसका परिवार तबाह हो जाएगा। उच्च और मध्यम वर्ग तो अपनी तैयारी कर चुका है, अब निम्न वर्ग क्या करे? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सुलगते सवालों के मुहानों पर बैठा आज इंसान यह तय नहीं कर पा रहा है कि क्या किया जाए? संकीर्ण मानसिकता, ओछी राजनीति, तीखी हवाओं के बीच आम आदमी अपने वजूद को तलाश रहा है। इससे बचने की कोई राह दूर-दूर नहीं दिखाई नहीं दे रही है। क्या होगा इस देश का, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
 डॉ. महेश परिमल

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