शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

विरोध नहीं, उसकी जड़ की पड़ताल हो

डॉ. महेश परिमल
चिड़िया जैसी कद का एक खूबसूरत स्पेनिश पक्षी होता है, जिसका नाम है केनेरी। 300 वर्ष पहले जब कोयले की खानों में काम करने वाले खनिक मजदूर अपने काम के लिए जाते थे, तब अपने साथ इस केनेरी पक्षी को भी ले जाते थे। इस पक्षी की यह विशेषता हाेती है कि खदानों से निकलने वाली मिथेन जैसी जहरीली गैस को सबसे पहले यही पक्षी महसूस करता है, थोड़ी-सी गंध से ही इस पक्षी का दम घुटने लग जाता है। कुछ देर बाद इसकी मौत हो जाती थी। इससे मजदूर समझ जाते थे कि कहां पर मिथेन गैस की बहुतायत है। एक पक्षी की अकाल मृत्यु से कई मजदूरों की जान बच जाती थी। समाज में रहने वाले सर्जक, लेखक, कलाकार या फिर कवि ये सभी अपने आसपास के समाज के केनेरी पक्षी की तरह होते हैं। अपने समय या देशकाल के आंतरिक सत्य को ये सबसे पहले महसूस करते हैं। उसके बाद अपने विचार समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं। आम जनता अपने आसपास फैली जहरीली हवाओं को पहचान नहीं पाती, इसलिए ये समाज के संवेदनशील लोग केनेरी पक्षी की भूमिका अदा करते हैँ। अपने जान जोखिम में डालकर ये लोगों को सचेत करते हैं कि आने वाला समय काफी संवेदनशील है, जो खतरनाक भी हो सकता है। इसलिए सचेत हो जाएं। लोगों को सचेत करने वाले यही सर्जक, कवि, कलाकार, लेखक अपनी इसी ख्ूबी के कारण समाज के पहरुए का काम करते हैं। इसलिए इनका स्थान विशिष्ट होता है। इस समय ये काम नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने किया है। स्वयं को मिले सम्मान सरकार को लौटाते हुए इन्होंने अपनी तरफ से विरोध का स्वर मुखर किया है। इस स्वर में वह पीड़ा प्रस्फुटित होती है, जो उनकी पहचान है।
इस समय देश में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक संवेदनशील समाज के लिए घातक है। इससे बौद्धिक वर्ग कुछ अनमना-सा महसूस कर रहा है। विख्यात साहित्यकार नयनतारा सहगल ने कितनी ही समस्याओं को लेकर देश के प्रधानमंत्री और अन्य प्रबुद्ध वर्ग के मौन को लेकर अपना विरोध व्यक्त किया है। इस ओर सबका ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने की घोषणा भी कर दी है। उनका अनुसरण करते हुए अशोक वाजपेयी ने भी स्वयं को मिले पुरस्कार लौटा दिए हैं। स्वाभाविक है, कुछ लोग इसे भाजपाई खेमे के विरोध के रूप में देख रहे हों और इसे  राग कांग्रेसी’ बता रहे हों। पर क्या यह पूरा सच है? नयनतारा सहगल को कांग्रेसी कहकर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। भले ही वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी हों, पर केवल इसी कारण से उन्हें हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में भी है। पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान अपने उपन्यास ‘टाइम टू बी हेपी’ से खींचा। इसके बाद तो ‘स्टार्म इन चंडीगढ़’ ‘मिस्टेकन आईडेंटटिटी’ और ‘रिच लाइफ अस’ जैसे उपन्यासों के माध्यम ने साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। यही नहीं समय-समय पर उन्होंने सर्जनात्मक साहित्य के साथ-साथ अपने आसपास के राजनीतिक, सामाजिक अौर वैश्विक परिवेश पर भी अपने विचार व्यक्त करती रहीं हैं। नयनतारा जवाहर लाल नेहरू की भांजी है, इस आवरण से तो वे तभी मुक्त हो गई थीं, जब उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन में उनका विरोध किया था। अपनी किताब इंदिरा गांधी इमर्जेंसी एंड स्टाइल में उन्होंने व्यक्तिपूजा, एकाधिकार के कारण लोकतंत्र की छटपटाहट को व्यक्त किया था। उस समय उनका यह रूप भाजपा को बहुत भला लगा था। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने नयनतारा को एक ‘जाग्रत सर्जक’ ही एक जाग्रह प्रहरी हो सकता है, कहकर उनकी प्रशंसा की थी। वही नयनतारा अब भाजपा शासन की बुराई कर रहीं हैं, तो इसे कांग्रेसी राग कहा जा रहा है। किस तरह की दोहरी मानसिकता है लाेगों की? दूसरी ओर अशोक वाजपेयी को  हिंदी के ख्यातनाम कवि के रूप मे पहचाना जाता है। सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला है उन्होंने। गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के लिए उन्होंने काफी काम किया है। उनका कार्यकाल कांग्रेस शासन में अधिक रहा, इसलिए लोग उन्हें ‘कांग्रेस कवि’ कहते हैं। परंतु जिनकी कविता के प्रशंसक अटल बिहारी वाजपेयी हों और उन्होंने ही अशोक जी को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया हो, तो फिर वे किस तरह से कांग्रेसी कवि हो गए? इसका जवाब किसी भाजपाई के पास नहीं है।
इन दोनों बुद्धिजीवियों ने वर्तमान राजनीतिक वातावरण में बढ़ रही धर्मांधता, मानवीय मूल्यों के हनन और स्वेच्छाचारी विचारधारा के अतिक्रमण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। यह एक चुनौतीभरा काम है। नयनतारा ने साहित्य अकादमी द्वारा मिले सम्मान को वापस करते हुए यह मुद्दा उठाया हे कि देश में स्थापित हितों के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों की हत्या हो रही है,तब साहित्य अकादमी खामोश क्यों बैठी है? दादरी हत्या के मामले में प्रधानमंत्री अब तक मौन क्यों हैं? इस पर भी उन्होंने अपना विरोध मुखर किया है। नयनतारा ने इसके पहले कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी की हत्या, वामपंथी विचार गोविंद पानसरे की हत्या और सुधारवादी नेता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का उल्लेख किया है। ये तीनोें बुद्धिजीवी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी तरह का योगदान देते रहे हैं। तीनों की हत्या में समानता है। तीनों ही मामले में धर्मांध लोगों को इनकी सक्रियता फूटी आंख नहीं सुहा रही थी। ये उनके लिए आंख की किरकिरी बन गए थे। एम.एम. कलबुर्गी भी साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। अपने लेखन में उन्होंने समय-समय पर धार्मिक रूढ़ियों, उन्माद, क्रियाकांडों की निरर्थकता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर तीखा प्रहार भी किया था। मूर्ति में क्या कोई शक्ति है, इसकी जांच के लिए उन्होंने जो कुछ किया, उस पर विहिप और बजरंग दल वाले भड़क उठे, उनकी काफी आलोचना हुई। अंतत: 30 अगस्त को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। गोविंद पानसरे महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत के साम्यवादी विचारक थे। राजनीतिक विचारधारा वामपंथी होने के कारण वे समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाते रहते। शिवाजी पर केंद्रित उनकी किताब काफी विवादास्पद हुई थी। शिवाजी पर उनके दृष्टिकोण से शिवसेना एवं अन्य धार्मिक कट्‌टरवादी संस्थाएं उनके विरोध में आ खड़ी हुई थीं। उन पर तीन बार प्राणघातक हमला हुआ। ऐसे ही एक हमले में गत फरवरी में वे अपनी जान गवां बैठे। इसी तरह नरेंद्र दाभोलकर भी समाज में फैली कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधश्रद्धा, क्रियाकांडों, धार्मिक पाखंडों आदि पर जमकर प्रहार करते। अपनी इसी प्रहारक क्षमता के कारण वे धर्म के नाम पर ढोंग करने वाले कथित बाबाओं के लिए परेशानी का कारण  बन गए थे। कितनी बार उन्हें जान से मारने की धमकी मिली। उन पर हमले भी हुए। अंधश्रद्धा निर्मूलन संबंधी विधेयक लाने के लिए वे पूरे महाराष्ट्र में अभियान चला रहे थे। इसके कारण कितने ही सांप्रदायिक संगठनों के निशाने पर आ गए थे। अंतत: उन्हें भी अपनी जान खोनी पड़ी।
उपरोक्त तीनों मामलों से एक बात यही निकलकर आती है कि क्या गोविंद पानसरे ने शिवाजी के प्रति अपने विचार रखने का अधिकार नहीं है। क्या वे अपनी नई नजर, नए तर्क से अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते? मूर्ति में बसने वाले ईश्वर वास्तव में हमारे भीतर बसते हैं, ऐसा कहने वाले कलबुर्गी अपने ही बचपन में की गई नादानी का किस्सा बताते हैं, तो कुछ लोगों के सर पर आसमान क्यों टूट पड़ता है? यह ईश्वरीय तत्व का अपमान है या सत्य की तरफ ले जाने वाला एक नूतन अभिगम है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त है। यह लोकतंत्र का प्राण है। इसके अलावा यह हिंदू धर्म का मर्म भी है। प्राचीन वेदग्रंथों में भी ब्रह्म को व्याख्यायित करने के लिए मंथन करने वाले शिष्यों को गुरु सतत ‘नेति...नेति’ कहकर सत्य की तरफ ले जाते रहे हैं। क्या उस समय उनके शिष्यों ने अपने गुरु पर हमला किया था। ब्रह्म यह नहीं है, ऐसा लगातार कहने वाले गुरु को हम नास्तिक कहने में जरा भी संकोच नहीं करते। विचारों की ताजगी को खुले रूप में स्वीकारना ही हिंदू धर्म का लचीलापन है। इसी लचीलेपन के कारण ही हिंदू धर्म हजारों साल के बाद भी पूरी शिद्दत के साथ अडिग है। इतने सारे आक्रमणों के बाद भी उसमें जरा भी विचलन नहीं आया है। उसकी अविचलता ही उसकी पहचान है। तो क्या आज यदि कुछ लोग ज्वलंत मामलों में अपना नया विचार रखते हैं, तो सचमुच हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा? यदि वास्तव में ऐसा होता, तो यह धर्म कब का नेस्तनाबूत हो चुका होता। नयनतारा सहगल हो या अशोक वाजपेयी, यदि वे अपना विरोध दर्ज करते हैं, तो उन्हें गंभीरता से सुनना ही होगा। आखिर उन्हें एेसा कहने और करने की नौबत क्यों आई, इस पर गहराई से विचार आवश्यक है। न कि उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर किसी तरह की टिप्पणी की जाए। समाज में यदि विरोध नहीं होगा, तो नए विचार कैसे आएंगे। विरोध तो सामाजिक विकास का अभिन्न अंग है। इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यदि हमने विरोध को नहीं स्वीकारा, तो मंजीरों के शोर में हम भी क्रमश: तालिबानी मानसिकता के प्रभाव में आ जाएंगे। इसका हमें आभास भी नहीं होगा। विरोध को कुचलना समाधान नहीं है, बल्कि विरोधियों का हौसला बुलंद करना है।
डॉ. महेश परिमल

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