सोमवार, 6 सितंबर 2010

कश्मीरी जिहादियों का असली चेहरा!


डॉ. महेश परिमल
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, यह उक्ति आज सारे समाज में प्रचलित है। पर इसका एक दूसरा ही रूप हम इन दिनों कश्मीर घाटी में देख रहे हैं। जहाँ लोगों को भड़काने वाले भाषण सुना-सुनाकर यह कहा जा रहा है कि आप अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता न करें, उन्हें आजादी की जंग में झोंक दें। बच्चे ही नहीं, बल्कि अपना बलिदान देने के लिए भी तैयार रहें। पर सच्चई इससे बिलकुल अलग है। आजादी के नाम पर भड़काऊ भाष्ण करने वालों की ही संतान शिक्षा के लिए विदेश जा रही है। अपने संतानों को विदेश भेजकर दूसरों की संतानों को आजादी की जंग में शामिल होने की अपील करने वाले जिहादियों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है।
शर्म आनी चाहिए, आप सब को, हम यहाँ हमारी सरजमीं की आजादी के लिए लड़ रहे है, तब आप अपने बच्चों की तालीम की फिक्र कर रहे हैं। क्या आपके बच्चों की तालीम आजादी से बढ़कर है..? अभी पिछले महीने ही जम्मू-कशमीर के अलगाववादी गुटों की एक महिला नेता आसिया इंद्राबी ने एक सभा को संबोधित करते हुए यह ऐलान किया था। ये महिला दुख्तरन-ए- मिल्लत यानी देश की बेटियों के लिए काम करती हैं। आसिया ने अपने ऐलान में कहा कि ये जमीं बलिदान माँग रही है, यदि थोड़े से टीन एजर इस लड़ाई के लिए तैयार हो जाएँ, रोज कमाने खाने वाले मजदूर इस लड़ाई में शामिल हो जाएँ, तो हम यह लड़ाई अवश्य जीतेंगे। इसके लिए भले ही हमें भूखे रहना पड़े, हमारी संपत्ति का नुकसान हो, इसकी चिंता न करें। आजादी के लिए कोई समझौता न करें। तभी हम अपनी आजादी को पा लेंगे। जंग-ए-आजादी के लिए हमें अपना सब-कुछ छोड़ना पड़े, तो भी हमें मंजूर है।
यह संवाद किसी हिंदी फिल्म के लगते होंगे, पर सच तो यही है कि कश्मीर में आसिया के यह उद्गार सुनकर लोगों ने तालियाँ बजाईं। इन तालियों से भला किसना सीना चौड़ा नहीं होगा। पर सच्चई इससे बिलकुल अलग है। अपने सम्प्रदाय के लोगों को वे आह्वान कर रहे हैं कि अपने बच्चों को आजादी की जंग में झोंक दें। अपने परिवार के एक-एक सदस्य को आजादी की जंग के लिए तैयार करें। अपने इस तरह के उत्तेजक भाषणों से आसिया बी भले ही क्रांतिकारी तेवर अपनाए हुए हो, पर सच तो यह है कि उनके सगे बेटे ने ही उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की तैयारी कर रखी है। उसने पासपोर्ट के लिए आवेदन कर रखा है।
इस वर्ष अप्रैल में आसिया के पुत्र मुहम्मद बिन कासिमवती कासिम के मामा यानी आसिया के भाई ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में आवेदन किया है कि कासिम को इंफ्रो टेक्नालॉजी और कानून की उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की अनुमति दी जाए। उन्होंने विदेश की यूनिवर्सिटी में आवेदन कर रखा है। यानी अब पासपोर्ट मिलने की देर है। अभी पिछले वर्ष ही हायर सेकंडरी बोर्ड की परीक्षा में कासिम ने 750 में 553 अंक हासिल किए। उसके बाद से वह विदेश जाने के लिए उतावले हैं। विदेश जाने की पहली शर्त पासपोर्ट है। लेकिन कासिम की माँ आसिया की जेहादी प्रवृत्ति को देखते हुए सरकार ने कासिम के पासपोर्ट पर अडंगा डाल दिया। आसिया को यह डर था कि कासिम अब 18 वर्ष का हो चुका है। कश्मीर में आजकल टीन एजरों पर आतंकवादी संगठन पैनी नजर रखे हुए है। ऐसे में उनकी नजर कहीं कासिम पर न पड़ जाए, इसलिए उसे जल्द से जल्द विदेश भेज दिया जाए। सोचो एक तरफ लोगों से अपने बच्चों के बलिदान का आह्वान करने वाली महिला अपने ही बच्चे को विदेश भेजने की ताक पर है। यही है आतंकवाद का असली चेहरा।
कासिम के पिता आशिक हुसैन जमियत उल मुजाहिदीन नामक आतंकवादी संस्था के सक्रिय सदस्य थे। 1992 में मानव अधिकार आयोग के सदस्य एच.एन. वांछु की हत्या के आरोप में वे अभी उम्र कैद की सजा भुगत रहे हैं। कासिम के मामा इनायतुल्लाह अंद्राबी जमात ऐ इस्लामी की छात्र इकाई इस्लामी जमात एक तुलाबा के संस्थापक हैं। कासिम जब मात्र तीन वर्ष का था, तब वह अपने माता-पिता, मामा और चाचा के साथ 13 महीने तक जेल में रह चुका है। अब आसिया घाटी की सभाओं में उत्तेजक भाषण करती है, हाल ही उसने अपने भाषण में कहा है कि कश्मीर आजाद हो जाएगा, तब हमारी सरकार से हिंदू लोग अपनी सुरक्षा की माँग कर सकते हैं।
सोचो, कितनी खतरनाक सोच के साथ ये संगठन देश में आतंक फैला रहे हैं? अपने बच्चों को सुरक्षित विदेश भेजकर दूसरों के बच्चों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए कह रहे हैं। पूरी तरह से फिरकापरस्त ऐसे लोग आज घाटी में बेखौफ घूम रहे हैं। इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। आज कश्मीर जल रहा है। लोग रोजमर्रा की चीजों के लिए तरस रहे हैं। लोगों का रोजगार खत्म हो रहा है। पर्यटन के बल पर जिंदा रहने वाला यह राज्य आज बदहाली के दौर से गुजर रहा है। लेकिन पड़ोसी देश के उकसावे में आकर घाटी को इंसानी खून से रँगने वाले इन जेहादियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये अपना काम कर रहे हैं। इन पर सख्ती होनी ही चाहिए। इनके चेहरे का नकाब निकालना ही होगा। तभी लोग समझ पाएँगे कि इन जेहादियों की कथनी और करनी में कितना अंतर है?
डॉ. महेश परिमल

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