सोमवार, 30 अगस्त 2010

वेदांता के लिए लाल झंडी, पास्को के लिए लाल जाजम

डॉ. महेश परिमल
केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है, उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर बॉक्साइट की खदान को खोदने की अनुमति वेदांता को नहीं दी गई। इससेचेयरमेन अनिल अग्रवाल का वह सपना चकनाचूर हो गया, जिसमें वे भारत के बड़े उद्योगपति बनना चाहते थे। एक तरफ उड़ीसा में वेदांत का प्रोजेक्ट विवादास्पद बन गया है, तो दूसरी तरफ पास्को के लिए नरमी बरत रही है।
वेदांता के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि उसके प्रोजेक्ट को रिलायंस वाले मुकेश अंबानी की कंपनी को दिया जा रहा है। बात यह है कि मुकेश अंबानी को यह अच्छी तरह से पता है कि सरकार को कैसे पटाया जाए? वैसे यह गुण उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश वेदांत कंपनी के प्रोजेक्ट की जाँच के लिए एन.सी. सक्सेना समिति को जवाबदारी सौंपी थी। सक्सेना समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि नियामगिरी पर्वत पर जहाँ वेदांत कंपनी का माइनिंग प्रोजेक्ट की योजना है, वह स्थान वहाँ बसने वाले डोगरिया कौध जाति के लिए वरदान है। नियामगिरी की पहाड़ियों में इन आदिवासियों का दिल धड़कता है। इन्हीं पहाड़ियों से उनका जीवन चलता है। इस पर्वत को वे साक्षात ईश्वर का दर्जा देते हैं। इसे वे ‘नियाम राजा’ के नाम से पुकारते हैं। इस पर्वत के साथ उनकी धार्मिक भावनाएँ भी जुड़ी हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उड़ीसा सरकार ने संयंत्र के लिए भू-अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की मंजूरी लेने की आवश्यक औपचारिकता पूरी नहीं की। वेदांता रिसोर्सेस को उड़ीसा की नियामगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट की खुदाई के लिए पहले पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई थी. लेकिन जांच की रिपोर्ट के अनुसार वेदांता द्वारा किए जाने वाले खनन से लगभग 70 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद हो जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार इस तबाही से स्थानीय डोंगरिया कौंध जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। समिति के अनुसार यदि इस जंगल में बाक्साइट के खनन की अनुमति दी जाती है, तो करीब 125 लाख पेड़ों को काटना होगा। इतने वृक्षों का संहार करके वेदांता जितना खनिज निकालेगी, उसकी आयु मात्र 4 वर्ष ही होगी। जंगल अधिकार कानून के अनुसार यदि किसी जंगल की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है, तो उस जमीन पर रहने वालों की अनुमति लेना आवश्यक है। कौंध जाति के लोग अपनी जमीन वेदांता को देने के लिए तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने खनन के लिए आदिवासियों की अनुमति मिल गई है, इसके झूठे दस्तावेज तैयार किए गए। यह बात सक्सेना समिति की जाँच में सामने आई।
वेदांता कंपनी उड़ीसा में जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसमें कुल 17 अरब डॉलर यानी करीब 7650 करोड़ रुपए के जंगी निवेश की योजना थी। केवल पर्यावरण नियमों का पालन न करने के कारण प्रोजेक्ट को कैंसल कर देने का देश में यह पहला मामला है। केंद्रीय वन एव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश भर के 64 प्रोजेक्ट को इसी तरह पर्यावरण विभाग की अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसमें मुम्बई में वैकल्पिक एयरपोर्ट का मामला भी शामिल है।
वेदांता से सात गुना अधिक निवेश करने वाली पॉस्को कंपनी द्वारा लोहे का कारखाना स्थापित करने का प्रोजेक्ट भी पर्यावरणीय विवाद का शिकार हुआ है। दक्षिण कोरिया की पास्को कंपनी उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में लोहे का कारखाना स्थापित करना चाहती है। इसके माध्यम से करीब 52 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश भारत आएगा। अब तक का यह सबसे बड़ा विदेश निवेश है। पास्को कंपनी के खिलाफ भी पर्यावरण और जंगल अधिकार मामलों में नियम कायदों का उल्लंधन करने की जानकारी केंद्र सरकार को है। इसके बाद भी वेदांता कंपनी को काम बंद करने का आदेश देने वाली केंद्र सरकार पास्को के खिलाफ सख्त नहीं हो पाई है। सरकार वेदांता के बजाए पास्को कंपनी को प्राथमिकता दे रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पास्को का केंद्र और उड़ीसा सरकार के बीच समझौता हो चुका है। उड़ीसा सरकार ने 2005 में पास्को के साथ जगतसिंहपुर जिले के फुजंगा में 1.20 करोड टन स्टील के उत्पादन की क्षमता वाले कारखाना स्थापित करने का समझौता किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए पास्का को 4000 एकड़ उपजाऊ जमीन देने का वचन उड़ीसा सरकार ने दिया था। इसमें से 3500 एकड़ जमीन पर सरकार का ही अधिकार है। शेष 500 एकड़ जमीन निजी है। जिनकी निजी जमीन है, वे अपनी जमीन पास्को को किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार नहीं है। जमीन हस्तगत करने के लिए सरकार ने जमीन मालिकों पर बल का प्रयोग किया, किसानों पर कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। लाशें भी बिछ गई। पास्को को जो जमीन देनी है, उसमें 284 एकड़ जमीन धीकिया नामक गाँव की है। इस गाँव की पंचायत ने बैठक में सर्वसम्मति से पास्को को अपनी जमीन न देने का प्रस्ताव पारित किया था। बाजू के गाँव गोविंदपुर में भी इस तरह का प्रस्ताव पारित किया गया था। ये गाँव पूरी तरह से पास्को के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि पास्को के किसी भी अधिकारी के इन गाँवों में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। उड़ीसा सरकार पास्को पर पूरी तरह से मेहरबान है। उस कंपनी के लिए सुंदरगढ़ की खान भी उसे समर्पित कर दी है। यही नहीं महानदी और ब्राrाणी नदी का पानी भी उसे देने का वचन सरकार दे चुकी है। उड़ीसा सरकार ने पारादीप बंदरगाह के बाजू में स्थित जटाधारी नामक निजी बंदरगाह भी पास्को को देने की अनुमति दे चुकी है। इस बंदरगाह का उपयोग पास्को उच्च गुणवत्ता का स्टील निर्यात करने और हल्की गुणवत्ता का खनिज आयात करने के लिए करेगा।
पास्को प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों पर सरकार बुरी तरह से पेश आई। पास्को के सामने उड़ीसा सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। लेकिन वेदांता के लिए कठोर। आखिर ऐसा क्यों? यह समझ से परे है। पास्को ने भी वही सब किया है, जिसके आधार पर वेदांता को उड़ीसा से खारिज कर दिया गया है। वहाँ की जनता भी वेदांता के उतनी ही खिलाफ है, जितनी पास्को के। लेकिन सरकार पास्को की तरफदारी कर रही है। पास्को के खिलाफ पर्यावरण मंत्री न तो कुछ सुनना चाहते हैं और न ही कुछ बोलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि पास्को कंपनी के प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करेंगे। यदि पास्को से भी पर्यावरण की हानि हो रही है, तो फिर उस पर सरकार कठोर क्यों नहीं हो रही है? आखिर पास्को से ऐसा क्या मिला, जो वेदांता से नहीं मिल पाया?
डॉ. महेश परिमल

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