मंगलवार, 31 अगस्त 2021

छत्तीसगढ़ी कहानी - कुछ करनी-कुछ करमगति



चित्र : गूगल से साभार

कहानीकार - बंधु राजेश्वर खरे
छत्तीसगढ़ की माटी की सुगंध ही अलग है। इसमें समाया है ग्रामीण जीवनशैली और संस्कृति का कभी न खत्म होनेवाला सौंधापन। इसी की एक झलक देखिए और सुनिए इस छत्तीसगढ़ी कहानी में...

मंगलवार, 17 अगस्त 2021

शोर की मार

 






16 अगस्त 2021 को जनसत्ता में प्रकाशित



17 अगस्त 2021 को दैनिक जागरण में प्रकाशित




मंगलवार, 10 अगस्त 2021

खुद की तलाश भी जरूरी है.....


अमर उजाला के रविवारीय संस्करण में 8 अगस्त 2021 को प्रकाशित



 

सोमवार, 2 अगस्त 2021

माँ के दूध पर बच्चे का अधिकार







 

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

बाघ हैं, तो हम हैं

 



विश्व बाघ दिवस पर 29 जुलाई 21 को सबेरा संकेत में प्रकाशित आलेख








आज की जनधारा रायपुर में 29.07.21 को प्रकाशित








एक चिंता बाघ की

डॉ. महेश परिमल

कुछ बरस पहले दिल्ली में बाघ पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें विश्व भर के पशुविद् एवं पर्यावरणविद् शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में विश्व में बाघ की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त की और विश्व की इस धरोहर की रक्षा के लिए जी-जान से जुट जाने का संकल्प लिया, पर इस तरह के संकल्पों से किसी क्रांति की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। बाघों की तेजी से कम होती संख्या अन्य देशों को कुछ करने के लिए अवश्य प्रेरित कर सकती है, पर हमारे देश में चिंता के नाम पर एक हल्की-सी जुंबिश भी हो जाए, तो बहुत है।

बाघों के महत्व पर प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जुगनू शारदेय का कहना था कि बाघ हमारी समूची जीवन प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज हम सांस ले रहे हैं, तो बाघ के कारण, बाघ न होते तो हम अच्छे एवं सुखद जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। पूरे विश्व के 60 प्रतिशत बाघ हमारे ही देश में हैं। इस पर भी इनकी संख्या में तेजी से कमी आ रही है। हमारे देश में बाघ कम हो रहे हैं, उसकी चिंता विदेशी कर रहे हैं, पर हमें फुरसत नहीं है कि इस दिशा में थोड़ी-सी भी चिंता करें।

कंक्रीट के जंगल ने वैसे भी जंगलों को हमसे बहुत दूर कर दिया है। जंगल तो अब स्वप्न हो गया है। आज के बच्चों से पूछा जाए तो वे जंगल का अर्थ नहीं समझेंगे। उन्हें जंगल केवल किताबों में या फिर माता-पिता द्वारा सुनाई जाने वाली कहानियों में ही मिलेंगे। जंगल वाली भूमि में रहकर आज हम भले ही शहरी कहलाने में गर्व करते हों, पर देखा जाए, तो कुछ जंगलीपन हममें आ गया है। शिकार और शिकारी ये दो पहलू हैं जीवन के। इंसान की दृष्टि से देखा जाए तो शिकार पहले शौक था, अब विशुद्ध व्यवसाय बन गया है। पहले शिकारी का निशाना छोटे-छोटे जंगली जानवर हुआ करते थे, पर अब बड़े जानवर ही उनकी आधुनिक बंदूकों को निशाना बनने लगे हैं, ताकि उनका मांस अपनों के बीच परोसा जाए और हड्डियां विदेश निर्यात की जा सकें। चीन जैसे देशों में हिंस्र पशुओं की हड्डियों से पौरुष बढ़ाने वाली दवाएँ बनाई जाती हैं। वहाँ इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इसलिए हमारे देश के हिंस्र पशुओं का मांस परोस कर हम अपनों को उपकृत करते हैं और नाखून-हड्डियाँ विदेश भेजकर अच्छी खासी रकम कमाते हैं। बाघों के शिकार के लिए अपने यहाँ भरपूर माहौल है। मात्र कुछ धन देकर जंगलों में सशस्त्र होकर प्रवेश पा जाते हैं और जी भरकर शिकार करते हैं। किसी ने प्रतिवाद किया तो उसे भी निशाना बनाने से नहीं चूकते। बरसों से सक्रिय जंगल माफिया ने इस देश में अपनी जड़ें फैलाई हैं और अरबों रुपए बटोरे हैं।

शिकार पर हमारे देश में भी प्रतिबंध है, पर आज तक किसी शिकार को कठोर सजा मिली हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। मात्र कुछ हजार रुपए और कुछ माह की सजा। जिसे भी धन देकर कम किया जा सकता है। इस दृष्टि से जंगली जानवर इन शिकारियों से कहीं बेहतर हैं, वे भूख लगने पर ही शिकार करते हैं। ऐसा करना उनकी विवशता नहीं अधिकार है। प्रकृति अपना संतुलन ऐसे ही रखती है, पर इंसान ऐसा केवल अपनी व्यावसायिकता के लिए करता है। 

हमारे देश से बाघ लुप्त हो जाएं या इंसान, किसी को कोई फर्क पड़े या न पड़े पर सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। राजनीति की बिसात में रोज ही हाथी, ऊंट के साथ-साथ राजा, वजीर और पैदल मारे जाते हैं। राजनीति की इन चालों के पीछे शह और मात ही नहीं होती। स्वार्थ में लिपटी वे धारणाएँ होती हैं। जिसमें आम आदमी की हैसियत किसी जानवर से कम नहीं होती। हम बाघों पर गंभीर मंत्रणा करते हैं। इस मंत्रणा में लाखों खर्च भी हो जाते हैं। फिर भी वन्यप्राणी संरक्षण के लिऐ धन की कमी बनी ही रहती है। तभी तो मेनका गाँधी को धन की व्यवस्था करने विदेश जाना पड़ रहा है। पर जरा पश्चिम बंगाल के उस गांव की तरफ भी देखें, जिसे विधवा गाँव के नाम से जाना जाता है। गांव से लगे अभयारण्य में बाघ इतनी अधिक संख्या में हो गऐ हैं कि अभयारण्य उन्हें छोटा पडऩे लगा है। वे गांवों पर हमला बोलने लगे हैं। एक-एक करके बाघ ने वहाँ के पुरुषों को अपना शिकार बना लिया है। गांव की औरतें विधवा होते जा रही हैं। सरकारी अमला विवश है। बाघों को मारना कानूनन जुर्म है, इसे तो वह अच्छी तरह से समझता है। पर गांव वालों की जिंदगी बचाना उसका कर्तव्य है, इसे शायद भुला दिया गया है। उस गाँव में अभी जो सधवा हैं वे इसी आशंका में जी रही हैं कि न जाने कब कहां बाघ का एक पंजा ही उनके माथे का सिंदूर पोंछ दे और वे एक अभिशापित जीवन जीने के लिए विवश हो जाएं।

बाघ पर ये हुए दो नजरिये। दोनों में एक बात सामान्य है, वह है सरकारी मशीनरी की नाकामयाबी। बहुत से कानून हैं, शायद कड़े भी हैं, पर वे इतने लचीले हैं कि क्षण भर में आरोपी कानून के लंबे हाथों से बहुत दूर चला जाता है, क्योंकि इस देश में अब औरत से लेकर बच्चों तक की तस्करी होने लगी है, जब इसे लेकर कड़े कानून नहीं बन पाए, आज तक किसी तस्कर को सजा हुई हो, ऐसा सुनने में नहीं आया, फिर भला जानवरों को मारकर उसकी खाल एवं हड्डियों की तस्करी करने वालों का भला कोई कानून क्या बिगाड़ लेगा? सलमान खान एवं उसकी टीम ने राजस्थान में काले हिरण का जो अवैध शिकार किया था, उसका मामला आज 22 साल से चल रहा है। कानून ने क्या बिगाड़ लिया सलमान खान का?

दूसरी ओर सरकार पर दोष मढक़र अपना पल्लू झाड़ना सभी को अच्छा लगता है, पर कभी हम अपने गरेबां में झांककर देखें तो पाएंगे कि हमने केवल बातें बनाने का ही काम किया है। एक छोटा-सा प्रयास भी नहीं किया, न पेड़-पौधे लगाने की दिशा में, न ही जानवरों के अवैध शिकार की दिशा में। हम ही अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं हैं, तो फिर दूसरे कैसे हो सकते हैं? एक पौधा रोपकर उसकी देखभाल कर यदि आप उसे पेड़ बनाते हैं तो सरकार का आप15 लाख रुपए बचाते हैं। इसे क्यों भूलते हैं आप। हमारे पूर्वजों ने न जाने कितने पौधे रोपे उसे बड़ा किया और करोड़ों की अघोषित संपत्ति इस देश को दे गए, क्या हम पूर्वजों के उस पराक्रम को सहेज कर नहीं रख सकते? पूर्वजों के कर्मों से हमने सुख भोगा, लहलहाती खुशियां बटोरीं तो क्या हम एक पौधा भी न लगाकर क्या बच्चों को देना चाहेंगे सपाट रेतीला रेगिस्तानी जीवन? बोलो...

डॉ. महेश परिमल




मंगलवार, 20 जुलाई 2021

महँगाई पर अंकुश जरूरी

19 जुलाई 2021 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय  संस्करण में प्रकाशित




 

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

अच्छे विचारों को प्रवाह देने का वक्त


12 जुलाई 2021 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित




 

रविवार, 11 जुलाई 2021

उपस्थिति और अनुपस्थिति के रिश्ते


अमर उजाला में 11 जुलाई 2021 को प्रकाशित



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हिमाचल प्रदेश से निकलने वाले गिरिराज में 24 नवम्बर 21 को प्रकाशित





नवभारत रायपुर में 11 जुलाई 2021 को प्रकाशित




 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

जीवन की नियति तय करती है प्रकृति


30 जून 2021 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित




 

बुधवार, 16 जून 2021

मानसून का दर्द

 

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 14 जून 2021 को प्रकाशित




दैनिक सबेरा संकेेत मेंं 13 जून को प्रकाशित

बुधवार, 9 जून 2021

कोरोना के साथ जीना सीखना होगा


आज की जनधारा में 09 जून 2021 को प्रकाशित



 

रविवार, 6 जून 2021

हवाओं को गुस्सा क्यों आता है?


अमर उजाला में 6 जून 2021 को प्रकाशित आलेख




सबेरा संकेत  में 6 जून 2021 को प्रकाशित आलेख



नवभारत में 6 जून 2021 को प्रकाशित आलेख




आज की जनधारा में 5  जून 2021 को प्रकाशित आलेख

 

गुरुवार, 3 जून 2021

थके पेड़ों से प्राणवायु की उम्मीद


01 जून को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित



 

सोमवार, 31 मई 2021

हर कश में होती हैं हमारी सांसें कम



आज की जनधारा में 31 मई 21 को प्रकाशित





लोकस्वर बिलासपुर में 31 मई 21 को प्रकाशित




 

शनिवार, 22 मई 2021

ताकि सलामत रहे जीवन


21 मई 2021 को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित

 



गुरुवार, 20 मई 2021

आलेख - दिन टंगे हैं रस्सी पर...

लेखक - नवनीत गुर्जर


लेखक भास्कर ग्रुप के नेशनल एडिटर हैं। जो समय-समय पर समसामयिक विषयों पर अपनी कलम चलाते हैं।  
दैनिक भास्कर में प्रकाशित आलेख का आनंद लीजिए, इस ऑडियो की मदद से...

रविवार, 16 मई 2021

नन्हें कदमों की लम्बी दूरियाँ



अमर उजाला में 16 मई 21 को प्रकाशित
लोकस्वर बिलासपुर में 15 मई 21 को प्रकाशित






आज की जनधारा रायपुर  में 15 मई 21 को प्रकाशित

 


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